होमतफ़सीरAl-Ahzaab (33)

तफ़सीर Al-Ahzaab (33) — الأحزاب

मदनी · 73 आयतें

पढ़ें · सुनेंPDF फ़ाइल

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّبِىُّ ٱتَّقِ ٱللَّهَ وَلَا تُطِعِ ٱلْكَـٰفِرِينَ وَٱلْمُنَـٰفِقِينَ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ عَلِيمًا حَكِيمًۭا ﴿١﴾

ऐ नबी! आप और आपके साथी, अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से दूर रहकर अल्लाह के तक़्वा पर जमे रहें और अकेले उसी से डरें, तथा काफ़िरों और मुनाफ़िक़ों का उनकी इच्छाओं में पालन न करें। निश्चित रूप से अल्लाह काफ़िरों और मुनाफ़िक़ों की चालों की ख़बर रखने वाला है, अपनी रचना और प्रबंधन में हिकमत वाला है।

وَٱتَّبِعْ مَا يُوحَىٰٓ إِلَيْكَ مِن رَّبِّكَ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرًۭا ﴿٢﴾

आप उस वह़्य (प्रकाशना) का अनुसरण करें, जो आपका पालनहार आपपर अवतरित करता है। निश्चय अल्लाह तुम्हारे कर्मों से पूरी तरह अवगत है, उनमें से कु छ भी उससे नहीं छू टता। और वह तुम्हें तुम्हारे कर्मों का बदला देगा।

وَتَوَكَّلْ عَلَى ٱللَّهِ ۚ وَكَفَىٰ بِٱللَّهِ وَكِيلًۭا ﴿٣﴾

अपने सभी मामलों में अके ले अल्लाह पर भरोसा करें। तथा अल्लाह अपने बंदों में से उसव्यक्ति के लिए संरक्षक के रूप में काफ़ी है, जो उसपर भरोसा करता है।

مَّا جَعَلَ ٱللَّهُ لِرَجُلٍۢ مِّن قَلْبَيْنِ فِى جَوْفِهِۦ ۚ وَمَا جَعَلَ أَزْوَٰجَكُمُ ٱلَّـٰٓـِٔى تُظَـٰهِرُونَ مِنْهُنَّ أُمَّهَـٰتِكُمْ ۚ وَمَا جَعَلَ أَدْعِيَآءَكُمْ أَبْنَآءَكُمْ ۚ ذَٰلِكُمْ قَوْلُكُم بِأَفْوَٰهِكُمْ ۖ وَٱللَّهُ يَقُولُ ٱلْحَقَّ وَهُوَ يَهْدِى ٱلسَّبِيلَ ﴿٤﴾

अल्लाह ने एक आदमी के सीने में दो दिल नहीं बनाए, न ही उसने पत्नियों को निषेध (हराम होने) में माताओं के समान बनाया, और न ही उसने मुँह बोले बेटों (गोद लिए हुए पुत्रों) को सगे बेटों के समान बनाया। क्योंकि "ज़िहार" (अर्थात् किसी व्यक्ति का अपनी पत्नी को अपने ऊपर अपनी माँ और बहन के समान हराम कर लेना) और इसी तरह "मुँह बोला बेटा बनाना" (गोद लेना): पूर्व-इस्लामिक रीति-रिवाजों में से हैं, जिन्हें इस्लाम ने अमान्य कर दिया है। यह 'ज़िहार' और 'मुँह बोला बेटा बनाना' एक कथन है, जिसे तुम अपने मुँह से दोहराते हो, इसमें कोई सच्चाई नहीं है। क्योंकि पत्नी न तो माँ है, और न ही मुँह बोला बेटा उस व्यक्ति का बेटा है, जिसने उसे बेटा बनाया है। अल्लाह तआला सत्य कहता है, ताकि उसके बंदे उस पर अमल करें, और वही सत्य के मार्ग की ओर रहनुमाई करता है।

ٱدْعُوهُمْ لِـَٔابَآئِهِمْ هُوَ أَقْسَطُ عِندَ ٱللَّهِ ۚ فَإِن لَّمْ تَعْلَمُوٓا۟ ءَابَآءَهُمْ فَإِخْوَٰنُكُمْ فِى ٱلدِّينِ وَمَوَٰلِيكُمْ ۚ وَلَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌۭ فِيمَآ أَخْطَأْتُم بِهِۦ وَلَـٰكِن مَّا تَعَمَّدَتْ قُلُوبُكُمْ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ غَفُورًۭا رَّحِيمًا ﴿٥﴾

जिन्हें तुम अपना बेटा होने का दावा करते हो, उन्हें उनके असली बापों की ओर मनसूब करो। क्योंकि उन्हें उनकी ओर मनसूब करना ही अल्लाह के निकट न्यायसंगत है। यदि तुम्हें उनके पिता मालूमन हों, जिनकी ओर उन्हें मनसूब करो, तो वे तुम्हारे धार्मिक भाई और तुम्हारे गुलामी से आज़ाद किए हुए लोग हैं। तो उन्हें 'ऐ मेरे भाई' और 'ऐ मेरे भतीजे' कहकर पुकारो। यदि कोई व्यक्ति भूल से किसी मुँह बोले बेटे को उसके मुँह बोले बाप की ओर मनसूब करके बुला ले, तो कोई गुनाह नहीं है। बल्कि गुनाह उस समय है, जब जान-बूझकर बोला जाए। और अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों को माफ़ करने वाला, उनपर दया करने वाला है कि भूल-चूक पर उनकी पकड़ नहीं करता।

ٱلنَّبِىُّ أَوْلَىٰ بِٱلْمُؤْمِنِينَ مِنْ أَنفُسِهِمْ ۖ وَأَزْوَٰجُهُۥٓ أُمَّهَـٰتُهُمْ ۗ وَأُو۟لُوا۟ ٱلْأَرْحَامِ بَعْضُهُمْ أَوْلَىٰ بِبَعْضٍۢ فِى كِتَـٰبِ ٱللَّهِ مِنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ وَٱلْمُهَـٰجِرِينَ إِلَّآ أَن تَفْعَلُوٓا۟ إِلَىٰٓ أَوْلِيَآئِكُم مَّعْرُوفًۭا ۚ كَانَ ذَٰلِكَ فِى ٱلْكِتَـٰبِ مَسْطُورًۭا ﴿٦﴾

पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, हर उस चीज़ के मामले में जिसकी ओर वह ईमान वालों को बुलाएँ, उन पर स्वयं उनके अपने प्राणों से भी अधिक हक़ रखने वाले हैं, भले ही उनके दिलदूसरों के प्रति झुकाव रखते हों। और आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लमकी पत्नियाँ सभी ईमान वालों की माताओं के दर्जे में हैं। इसलिए किसी भी मोमिन के लिए आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मृत्यु के बाद उनमें से किसी से शादी करना हराम (निषिद्ध) है। और रिश्तेदार, अल्लाह के आदेश के अनुसार, विरासत के मामले में अन्य ईमान वालों और मुहाजिरों से आपसमें एक-दूसरे पर अधिक हक़ रखने वाले हैं, जो इस्लामकी शुरुआत में आपसमें एक-दूसरे का वारिस بلغ क़ुरआन · तफ़सीर हुआ करते थे, फिर इस तरह से आपस में वारिस होने के नियम को निरस्त कर दिया गया। परंतु (ऐ ईमान वालो!) अगर तुम वारिसों के अलावा अपने अन्य दोस्तों के लिए कु छ धन की वसीयत करना तथा उनपर उपकार करना चाहो, तो तुम ऐसा कर सकते हो। यह आदेश लौह़े मह़फू ज़ में अंकित है। इसलिए इसपर अमल करना ज़रूरी है।

وَإِذْ أَخَذْنَا مِنَ ٱلنَّبِيِّـۧنَ مِيثَـٰقَهُمْ وَمِنكَ وَمِن نُّوحٍۢ وَإِبْرَٰهِيمَ وَمُوسَىٰ وَعِيسَى ٱبْنِ مَرْيَمَ ۖ وَأَخَذْنَا مِنْهُم مِّيثَـٰقًا غَلِيظًۭا ﴿٧﴾

और (ऐ रसूल!) आप उस समय को याद करें, जब हमने नबियों से के वल एक अल्लाह की इबादत करने, उसके साथ किसी को साझी न बनाने और उनकी ओर जो वह़्य (प्रकाशना) की गई है, उसे लोगों तक पहुँचाने का दृढ़ वचन लिया। तथा हमने विशेष रूप से आपसे और नूह, इबराहीम, मूसा और ईसा बिन मरयम से वचन लिया। तथा हमने उनसे दृढ़ संकल्प लिया कि जो कु छ उन्हें अल्लाह का संदेश पहुँचाने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है, उसे पूरा करेंगे।

لِّيَسْـَٔلَ ٱلصَّـٰدِقِينَ عَن صِدْقِهِمْ ۚ وَأَعَدَّ لِلْكَـٰفِرِينَ عَذَابًا أَلِيمًۭا ﴿٨﴾

अल्लाह ने नबियों से यह दृढ़ प्रतिज्ञा ली, ताकि काफ़िरों की भर्त्सना करते हुए सच्चे रसूलों से उनकी सच्चाई के बारे में पूछे, और अल्लाह ने अपने तथा अपने रसूलों का इनकार करने वालों के लिए क़ियामत के दिन दर्दनाक यातना तैयार कर रखी है, जो जहन्नम की आग है।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱذْكُرُوا۟ نِعْمَةَ ٱللَّهِ عَلَيْكُمْ إِذْ جَآءَتْكُمْ جُنُودٌۭ فَأَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ رِيحًۭا وَجُنُودًۭا لَّمْ تَرَوْهَا ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرًا ﴿٩﴾

بما تعملون بصيرا ऐ अल्लाह पर ईमान रखने वालो और उसकी शरीयत का पालन करने वालो! तुम अपने ऊपर अल्लाह के उस उपकार को याद करो, जब काफ़िरों की सेनाएँ तुमसे लड़ने के लिए जत्थाबंद होकर मदीना पर चढ़ आईं, तथा मुनाफ़िक़ों एवं यहूदियों ने उनका समर्थन किया। तो हमने उनपर पूर्वी हवा भेज दी, जिसके द्वारा अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लमकी मदद की गई, तथा हमने फ़रिश्तों की सेनाएँ भेजीं, जिन्हें तुमने नहीं देखा। अतः काफ़िर भाग खड़े हुए, वे कु छ भी करने में सक्षमनहीं थे। और जो कु छ तुमकर रहे थे, अल्लाह उसे खूब देखने वाला था, उसमें से कु छ भी उससे छिपा नहीं है। और वह तुम्हें तुम्हारे कर्मों का बदला देगा।

إِذْ جَآءُوكُم مِّن فَوْقِكُمْ وَمِنْ أَسْفَلَ مِنكُمْ وَإِذْ زَاغَتِ ٱلْأَبْصَـٰرُ وَبَلَغَتِ ٱلْقُلُوبُ ٱلْحَنَاجِرَ وَتَظُنُّونَ بِٱللَّهِ ٱلظُّنُونَا۠ ﴿١٠﴾

और यह उस समय हुआ जब काफ़िर घाटी के ऊपर से और उसके नीचे से पूर्व और पश्चिम की दिशा से तुमपर चढ़ आए, उस समय निगाहें सारी चीज़ों से हटकर के वल दुश्मनों पर टिक गईं और गहन भय के कारण कलेजे मुँह को आने लगे और तुमअल्लाह के बारे में तरह-तरह के गुमान करने लगे; चुनाँचे कभी तुमजीत के बारे में सोचते, और कभी उससे निराशा का गुमान करने लगते।

هُنَالِكَ ٱبْتُلِىَ ٱلْمُؤْمِنُونَ وَزُلْزِلُوا۟ زِلْزَالًۭا شَدِيدًۭا ﴿١١﴾

खंदक़ की लड़ाई के दौरान उस अवसर पर, ईमान वालों का इस तरह परीक्षण किया गया कि उनके दुश्मन उनपर टूट पड़े और वे डर की तीव्रता से बुरी तरह हिला दिए गए। और इसपरीक्षण से यह स्पष्ट हो गया कि कौन मोमिन है और कौन मुनाफ़िक़।

وَإِذْ يَقُولُ ٱلْمُنَـٰفِقُونَ وَٱلَّذِينَ فِى قُلُوبِهِم مَّرَضٌۭ مَّا وَعَدَنَا ٱللَّهُ وَرَسُولُهُۥٓ إِلَّا غُرُورًۭا ﴿١٢﴾

उस दिन मुनाफ़िकों और कमज़ोर ईमान वाले लोगों ने, जिनके दिलों में संदेह है, कहा: अल्लाह और उसके रसूलने हमसे हमारे दुश्मन पर विजय और धरती में हमें प्रभुत्व प्रदान करने का जो वादा किया था, वह असत्य और निराधार था।

وَإِذْ قَالَت طَّآئِفَةٌۭ مِّنْهُمْ يَـٰٓأَهْلَ يَثْرِبَ لَا مُقَامَ لَكُمْ فَٱرْجِعُوا۟ ۚ وَيَسْتَـْٔذِنُ فَرِيقٌۭ مِّنْهُمُ ٱلنَّبِىَّ يَقُولُونَ إِنَّ بُيُوتَنَا عَوْرَةٌۭ وَمَا هِىَ بِعَوْرَةٍ ۖ إِن يُرِيدُونَ إِلَّا فِرَارًۭا ﴿١٣﴾

और (ऐ रसूल!) उस समय को याद करें, जब मुनाफ़िक़ों के एक समूह ने मदीना के लोगों से कहा: ऐ यसरिब (इस्लाम से पहले मदीना का नाम) वालो! तुम्हारे लिए ख़ंदक़ के पास, 'सल्अ' पहाड़ी के दामन में ठहरने का कोई स्थान नहीं है। इसलिए अपने घरों को लौट चलो। और उनमें से एक समूह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लमसे घर بلغ क़ुरआन · तफ़सीर वापसी की अनुमित माँग रहा था। उनका दावा था कि उनके घर दुश्मन की ज़द में हैं, जबकि मामला ऐसा नहीं है जैसा कि उन्होंने दावा किया है। बल्कि वे इस झूठे बहाने के द्वारा दुश्मन से भागना चाहते हैं।

وَلَوْ دُخِلَتْ عَلَيْهِم مِّنْ أَقْطَارِهَا ثُمَّ سُئِلُوا۟ ٱلْفِتْنَةَ لَـَٔاتَوْهَا وَمَا تَلَبَّثُوا۟ بِهَآ إِلَّا يَسِيرًۭا ﴿١٤﴾

और अगर दुश्मन उनपर मदीना में उसकी सभी दिशाओं से प्रवेश कर जाता, और उनसे अल्लाह का इनकार करने और उसके साथ साझी ठहराने की ओर लौटने के लिए कहता, तो निश्चय वे अपने दुश्मन की यह बात मान लेते, और वे इस्लाम धर्म त्यागने और कु फ़्र की ओर पलटने में के वल थोड़ी ही देर संकोच करते।

وَلَقَدْ كَانُوا۟ عَـٰهَدُوا۟ ٱللَّهَ مِن قَبْلُ لَا يُوَلُّونَ ٱلْأَدْبَـٰرَ ۚ وَكَانَ عَهْدُ ٱللَّهِ مَسْـُٔولًۭا ﴿١٥﴾

जबकि इन मुनाफ़िक़ों (पाखंडियों) ने उहुद के दिन युद्ध से भागने के बाद अल्लाह से प्रतिज्ञा की थी कि अगर अल्लाह ने उन्हें किसी और लड़ाई में शामिलहोने का अवसर दिया, तो वे अपने दुश्मन से ज़रूर लड़ाई करेंगे और उनके डर से नहीं भागेंगे। लेकिन उन्होंने वादा तोड़ दिया। हालाँकि बंदे ने अल्लाह से जो वादा किया है, उसके प्रति वह ज़िम्मेदार है और उससे उसका हिसाब लिया जाएगा।

قُل لَّن يَنفَعَكُمُ ٱلْفِرَارُ إِن فَرَرْتُم مِّنَ ٱلْمَوْتِ أَوِ ٱلْقَتْلِ وَإِذًۭا لَّا تُمَتَّعُونَ إِلَّا قَلِيلًۭا ﴿١٦﴾

(ऐ रसूल) आप इन लोगों से कह दें: यदि तुम मरने या क़त्ल होने के भय से लड़ाई से भागते हो, तो (यह) भागना तुम्हें हरगिज़ लाभ नहीं देगा। क्योंकि मौत का समय निर्धारितي है। और अगर तुम भागते हो और तुम्हारी मौत का समय नहीं आया है, तब भी तुम जीवन में के वल थोड़े समय का आनंद ले सकोगे।

قُلْ مَن ذَا ٱلَّذِى يَعْصِمُكُم مِّنَ ٱللَّهِ إِنْ أَرَادَ بِكُمْ سُوٓءًا أَوْ أَرَادَ بِكُمْ رَحْمَةًۭ ۚ وَلَا يَجِدُونَ لَهُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ وَلِيًّۭا وَلَا نَصِيرًۭا ﴿١٧﴾

ولا نص يرا (ऐ रसूल) आप उनसे कह दें: अगर अल्लाह तुम्हारे साथ उसी मौत और क़त्ल का इरादा करे, जिस तुम नापसंद करते हो, या तुम्हारे साथ सलामती और भलाई का इरादा करे, जिसकी तुम आशा करते हो, तो वह कौन है जो तुम्हें अल्लाह से बचा सकता है?! कोई भी तुम्हें इससे बचा नहीं सकता। और ये मुनाफ़िक़ लोग अपने लिए अल्लाह के सिवा कोई संरक्षक नहीं पाएँगे, जो उनके मामले की देखभाल करे और न ही कोई सहायक पाएँगे, जो उन्हें अल्लाह की सज़ा से बचा सके ।

۞ قَدْ يَعْلَمُ ٱللَّهُ ٱلْمُعَوِّقِينَ مِنكُمْ وَٱلْقَآئِلِينَ لِإِخْوَٰنِهِمْ هَلُمَّ إِلَيْنَا ۖ وَلَا يَأْتُونَ ٱلْبَأْسَ إِلَّا قَلِيلًا ﴿١٨﴾

अल्लाह तुममें से उन लोगों को जानता है, जो दूसरे लोगों को अल्लाह के रसूलसल्लल्लाहु अलैहि व सल्लमके साथ मिलकर लड़ने से हतोत्साहित करते हैं, और जो अपने भाइयों से कहते हैं: हमारे पास आओ और उनके साथ युद्ध में शामिल न हो ताकि तुम मारे न जाओ। क्योंकि हमें तुम्हारे मारे जाने का भय है। और ये हतोत्साहित करने वाले युद्ध में नहीं आते हैं और शायद ही कभी उसमें भाग लेते हैं; ताकि अपने आप से अपमान को दूर कर सकें , इसलिए नहीं कि वे अल्लाह और उसके रसूल की मदद करें।

أَشِحَّةً عَلَيْكُمْ ۖ فَإِذَا جَآءَ ٱلْخَوْفُ رَأَيْتَهُمْ يَنظُرُونَ إِلَيْكَ تَدُورُ أَعْيُنُهُمْ كَٱلَّذِى يُغْشَىٰ عَلَيْهِ مِنَ ٱلْمَوْتِ ۖ فَإِذَا ذَهَبَ ٱلْخَوْفُ سَلَقُوكُم بِأَلْسِنَةٍ حِدَادٍ أَشِحَّةً عَلَى ٱلْخَيْرِ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ لَمْ يُؤْمِنُوا۟ فَأَحْبَطَ ٱللَّهُ أَعْمَـٰلَهُمْ ۚ وَكَانَ ذَٰلِكَ عَلَى ٱللَّهِ يَسِيرًۭا ﴿١٩﴾

ه يسيرا वे तुमपर (ऐ ईमान वालो) अपने धन के साथ बड़े कं जूस हैं, इसलिए वे उसे खर्च करके तुम्हारी मदद नहीं करते हैं। तथा वे अपनी जानों के संबंध में भी कं जूस हैं, इसलिए वे तुम्हारे साथ लड़ाई नहीं करते। तथा वे अपनी दोस्ती के संबंध में भी कं जूस हैं, इसलिए वे तुमसे मित्रता नहीं करते। चुनाँचे जब दुश्मन से मुठभेड़ के समय भय का सामना होता है, तो आप उन्हें देखेंगे कि वे (ऐ रसूल) आपकी ओर ऐसे देखते हैं कि उनकी आँखें कायरता के कारण उस आदमी की आँखों के घूमने की तरह घूम रही हैं, जो मौत की पीड़ा से जूझ रहा हो। फिर जब उनका भय जाता रहता है और वे निश्चिंत हो जाते हैं, तो वे अपनी तेज़ ज़बानों के साथ तुम्हें कष्ट पहुँचाते हैं। वे ग़नीमत के माल के बड़े लोभी होते हैं और उसकी ताक में रहते हैं। ये लोग जो इन विशेषताओं से विशिष्ट हैं, वास्तव में ईमान ही नहीं लाए हैं। इसलिए अल्लाह ने इनके कर्मों के सवाब को व्यर्थ कर दिया। और यह व्यर्थ करना अल्लाह के लिए अति सरलहै। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

يَحْسَبُونَ ٱلْأَحْزَابَ لَمْ يَذْهَبُوا۟ ۖ وَإِن يَأْتِ ٱلْأَحْزَابُ يَوَدُّوا۟ لَوْ أَنَّهُم بَادُونَ فِى ٱلْأَعْرَابِ يَسْـَٔلُونَ عَنْ أَنۢبَآئِكُمْ ۖ وَلَوْ كَانُوا۟ فِيكُم مَّا قَـٰتَلُوٓا۟ إِلَّا قَلِيلًۭا ﴿٢٠﴾

ये कायर लोग समझते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और ईमान वालों से लड़ाई के लिए एकजुट होने वाली सेनाएँ मुसलमानों का सफ़ाया किए बिना कभी वापस नहीं जाएँगी। और अगर ऐसा हो कि ये सेनाएँ दोबारा आ जाएँ, तो ये मुनाफ़िक़ लोग पसंद करेंगे कि वे देहातियों के साथ मदीना के बाहर निकल जाते, जहाँ से वे तुम्हारी खबर के बारे में पूछते कि: तुम्हारे दुश्मन के तुमसे लड़ने के बाद तुम्हारे साथ क्या हुआ? और अगर वे (ऐ मोमिनो!) तुम्हारे बीच में होते, तो वे तुम्हारे साथ बहुत कम ही लड़ते। इसलिए उनकी परवाह न करो और न ही उनपर अफ़सोस करो।

لَّقَدْ كَانَ لَكُمْ فِى رَسُولِ ٱللَّهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌۭ لِّمَن كَانَ يَرْجُوا۟ ٱللَّهَ وَٱلْيَوْمَ ٱلْـَٔاخِرَ وَذَكَرَ ٱللَّهَ كَثِيرًۭا ﴿٢١﴾

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जो कु छ कहा, जो कु छ अंजाम दिया और जो कु छ किया, उसमें तुम्हारे लिए उत्तम आदर्श है। चुनाँचे आप स्वंय उपस्थित हुए और युद्ध किया, तो फिर तुम उसके बाद आपकी जान से बेपरवाह होकर अपनी जानों को निछावर करने में कंजूसी करते हो? और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आदर्श को वही अपनाएगा, जो अल्लाह के प्रतिफल और दया की आशा रखता हो और आख़िरत के दिन की आशा रखता हो, और उसके लिए कार्य करता हो और अल्लाह को बहुत ज़्यादा याद करता हो। लेकिन जो व्यक्ति आख़िरत के दिन की आशा नहीं रखता है और अल्लाह को बहुत ज़्यादा याद नहीं करता है, तो वह अल्लाह के रसूलसल्लल्लाहु अलैहि व सल्लमके आदर्श कोनहींअपनाएगा।

وَلَمَّا رَءَا ٱلْمُؤْمِنُونَ ٱلْأَحْزَابَ قَالُوا۟ هَـٰذَا مَا وَعَدَنَا ٱللَّهُ وَرَسُولُهُۥ وَصَدَقَ ٱللَّهُ وَرَسُولُهُۥ ۚ وَمَا زَادَهُمْ إِلَّآ إِيمَـٰنًۭا وَتَسْلِيمًۭا ﴿٢٢﴾

وتسليما और जब ईमान वालों ने उनसे लड़ने के लिए एकत्रित सेनाओं को अपनी आँखों से देख लिया तो कहा: यही वह परीक्षण, विपत्ति और मदद (विजय) है, जिसका अल्लाह और उसके रसूल ने हमसे वादा किया था और अल्लाह और उसके रसूल इसमें सच्चे थे, चुनाँचे वह पूरा हो गया। तथा सेनाओं को देखने से उनका अल्लाह पर ईमान और उसके प्रति समर्पण और बढ़ गया।

مِّنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ رِجَالٌۭ صَدَقُوا۟ مَا عَـٰهَدُوا۟ ٱللَّهَ عَلَيْهِ ۖ فَمِنْهُم مَّن قَضَىٰ نَحْبَهُۥ وَمِنْهُم مَّن يَنتَظِرُ ۖ وَمَا بَدَّلُوا۟ تَبْدِيلًۭا ﴿٢٣﴾

ईमान वालों में से कु छ लोग ऐसे हैं, जिन्होंने अल्लाह से किया हुआ वादा सच कर दिखाया। चुनाँचे उन्होंने अल्लाह के रास्ते में जिहाद में दृढ़ता और धैर्य का जो वादा किया था, उसे पूरा किया। तो उनमें से कु छ लोग मर गए या अल्लाह की राह में शहीद हो गए और कु छ लोग असके रास्ते में शहीद होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। और इन ईमान वालों ने अल्लाह से कि हुए अपने वादे को नहीं बदला, जैसा कि मुनाफ़िक़ों ने अपने वादों के साथ किया।

لِّيَجْزِىَ ٱللَّهُ ٱلصَّـٰدِقِينَ بِصِدْقِهِمْ وَيُعَذِّبَ ٱلْمُنَـٰفِقِينَ إِن شَآءَ أَوْ يَتُوبَ عَلَيْهِمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ غَفُورًۭا رَّحِيمًۭا ﴿٢٤﴾

ताकि अल्लाह उन सच्चे लोगों को, जिन्होंने अल्लाह से किए हुए वादे को पूरा किया, उनकी सच्चाई और वादा निभाने का बदला दे, और प्रतिज्ञा को तोड़ने वाले मुनाफ़िक़ों को यदि चाहे तो यातना दे, इस प्रकार कि उन्हें उनके कु फ़्र से तौबा करने से पहले ही मौत दे दे, या उनकी तौबा क़बूल करते हुए उन्हें तौबा करने की तौफ़ीक़ प्रदान कर दे। और अल्लाह अपने गुनाहों से तौबा करने वाले को क्षमा करने वाला, उसपर दया करने वाला है।

وَرَدَّ ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ بِغَيْظِهِمْ لَمْ يَنَالُوا۟ خَيْرًۭا ۚ وَكَفَى ٱللَّهُ ٱلْمُؤْمِنِينَ ٱلْقِتَالَ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ قَوِيًّا عَزِيزًۭا ﴿٢٥﴾

और अल्लाह ने क़ुरैश, ग़तफ़ान और उन लोगों को जो उनके साथ थे, उनकी उम्मीदों पर पानी फिर जाने के कारण उनकी पीड़ा और शोक के साथ लौटा दिया, वे मुसलमानों का सफाया करने के इरादे में कामयाब न हुए। और अल्लाह आँधी भेजकर और फ़रिश्तों को उतारकर उनसे युद्ध करने के लिए ईमान वालों को काफी हो गया। और अल्लाह बड़ा शक्तिशाली, अत्यंत प्रभुत्वशाली है, जो भी उससे मुक़ाबला करने की कोशिश करेगा, वह उसे पराजित और असहाय कर देगा। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

وَأَنزَلَ ٱلَّذِينَ ظَـٰهَرُوهُم مِّنْ أَهْلِ ٱلْكِتَـٰبِ مِن صَيَاصِيهِمْ وَقَذَفَ فِى قُلُوبِهِمُ ٱلرُّعْبَ فَرِيقًۭا تَقْتُلُونَ وَتَأْسِرُونَ فَرِيقًۭا ﴿٢٦﴾

فر يقا अल्लाह ने यहूदियों में से उन लोगों को, जिन्होंने काफ़िरों की सहायता की थी, उनके उन क़िलों से उतार दिया, जहाँ वे अपने दुश्मनों से बचने के लिए शरण लेते थे। और उनके दिलों में भय डालदिया। चुनाँचे तुम(ऐ ईमान वालो) उनके एक गिरोह को क़त्लकर रहे थे और एक गिरोह को बंदी बना रहे थे।

وَأَوْرَثَكُمْ أَرْضَهُمْ وَدِيَـٰرَهُمْ وَأَمْوَٰلَهُمْ وَأَرْضًۭا لَّمْ تَطَـُٔوهَا ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرًۭا ﴿٢٧﴾

और अल्लाह ने उनके विनाश के बाद, उनकी भूमि को खेतियों और ख़जूर के बाग़ों समेत तुम्हारे क़ब्ज़े में कर दिया। तथा तुम्हें उनके घरों और उनके अन्य धनों का मालिक बना दिया। और तुम्हें ख़ैबर की भूमि का मालिक बना दिया, जिसपर तुमने अभी तक अपने पाँव भी नहीं रखे थे। लेकिन अब उस पर तुम्हारे क़दम पड़ेंगे। यह ईमान वालों के लिए एक वादा और खुशख़बरी है। और अल्लाह हर चीज़ पर सर्वशक्तिमान है, उसे कोई चीज़ विवश नहीं कर सकती।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّبِىُّ قُل لِّأَزْوَٰجِكَ إِن كُنتُنَّ تُرِدْنَ ٱلْحَيَوٰةَ ٱلدُّنْيَا وَزِينَتَهَا فَتَعَالَيْنَ أُمَتِّعْكُنَّ وَأُسَرِّحْكُنَّ سَرَاحًۭا جَمِيلًۭا ﴿٢٨﴾

ऐ नबी! अपनी पत्नियों से कह दें, जबकि उन्होंने आपसे नफ़क़ा (भरण-पोषण) में विस्तार करने की माँग की है और आपके पास उन पर विस्तार करने के लिए कु छ भी नहीं है: अगर तुम दुनिया का जीवन और उसकी शोभा चाहती हो, तो मेरे पास आओ, मैं तुम्हें कु छ सामान दे दूँ, जो तलाक़शुदा महिलाओं को दिया जाता है और तुम्हें बिना कोई नुक़सान पहुँचाए या कष्ट दिए तलाक़ दे दूँ।

وَإِن كُنتُنَّ تُرِدْنَ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ وَٱلدَّارَ ٱلْـَٔاخِرَةَ فَإِنَّ ٱللَّهَ أَعَدَّ لِلْمُحْسِنَـٰتِ مِنكُنَّ أَجْرًا عَظِيمًۭا ﴿٢٩﴾

और अगर तुम अल्लाह की प्रसन्नता और उसके रसूल की प्रसन्नता चाहती हो, और आखिरत के घर में जन्नत चाहती हो, तो अपनी हालत पर सब्र करो। क्योंकि तुममें से जो सब्र और अच्छे रहन-सहन के साथ जीवन यापन करेगी, उसके लिए अल्लाह ने बहुत बड़ा बदला तैयार कर रखा है।

يَـٰنِسَآءَ ٱلنَّبِىِّ مَن يَأْتِ مِنكُنَّ بِفَـٰحِشَةٍۢ مُّبَيِّنَةٍۢ يُضَـٰعَفْ لَهَا ٱلْعَذَابُ ضِعْفَيْنِ ۚ وَكَانَ ذَٰلِكَ عَلَى ٱللَّهِ يَسِيرًۭا ﴿٣٠﴾

ऐ नबी की स्त्रियो! तुममें से जो भी कोई स्पष्ट पाप करेगी, क़ियामत के दिन उसकी यातना दोगुनी कर दी जाएगी। ऐसा उसकी स्थिति और पद के कारण तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लमके मान-सम्मान की रक्षा के लिए होगा। और यह दोगुनी यातना देना अल्लाह के लिए बहुत आसान है।

۞ وَمَن يَقْنُتْ مِنكُنَّ لِلَّهِ وَرَسُولِهِۦ وَتَعْمَلْ صَـٰلِحًۭا نُّؤْتِهَآ أَجْرَهَا مَرَّتَيْنِ وَأَعْتَدْنَا لَهَا رِزْقًۭا كَرِيمًۭا ﴿٣١﴾

और तुममें से जो कोई निरंतर अल्लाह और उसके रसूल का आज्ञापालन करे और अल्लाह के निकट पसंदीदा नेक कार्य करे, हम उसे दूसरी महिलाओं की तुलना में दोगुना सवाब देंगे। तथा हमने उसके लिए आखिरत में उत्तम (सम्मानजनक) बदला तैयार कर रखा है, जो कि जन्नत है।

يَـٰنِسَآءَ ٱلنَّبِىِّ لَسْتُنَّ كَأَحَدٍۢ مِّنَ ٱلنِّسَآءِ ۚ إِنِ ٱتَّقَيْتُنَّ فَلَا تَخْضَعْنَ بِٱلْقَوْلِ فَيَطْمَعَ ٱلَّذِى فِى قَلْبِهِۦ مَرَضٌۭ وَقُلْنَ قَوْلًۭا مَّعْرُوفًۭا ﴿٣٢﴾

م عروفا ऐ नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पत्नियो! तुम प्रतिष्ठा और सम्मान में अन्य स्त्रियों के समान नहीं हो। बल्कि तुम प्रतिष्ठा एवं सम्मान में उस स्थान पर विराजमान हो, जहाँ तुम्हारे अलावा अन्य महिलाएँ नहीं पहुँच सकतीं, यदि तुम अल्लाह के आदेशों का पालन करती रहो और उसकी मना की हुई चीज़ों से बचती रहो। अतः जब तुम गैर-मह्रम पुरुषों से बात करो, तो बात को लचकदार और आवाज़ को कोमल न रखो कि जिसके दिल में निफ़ाक़ का रोग और हराम की वासना है, वह इसके कारण लालच कर बैठे। तथा संदेह से परे बात करो इस प्रकार कि वह ज़रूरत भर एक गंभीर बात हो, उपहास व मज़ाक न हो। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

وَقَرْنَ فِى بُيُوتِكُنَّ وَلَا تَبَرَّجْنَ تَبَرُّجَ ٱلْجَـٰهِلِيَّةِ ٱلْأُولَىٰ ۖ وَأَقِمْنَ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتِينَ ٱلزَّكَوٰةَ وَأَطِعْنَ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥٓ ۚ إِنَّمَا يُرِيدُ ٱللَّهُ لِيُذْهِبَ عَنكُمُ ٱلرِّجْسَ أَهْلَ ٱلْبَيْتِ وَيُطَهِّرَكُمْ تَطْهِيرًۭا ﴿٣٣﴾

और तुम अपने घरों में ठहरी रहो। इसलिए ज़रूरत के बिना घर से बाहर न निकलो और इस्लाम से पूर्व की महिलाओं की तरह अपने सौन्दर्य का प्रदर्शन न करो, जो पुरुषों को रिझाने के लिए अपने सौन्दर्य का प्रदर्शन किया करती थीं। और नमाज़ को सबसे पूर्ण रूप से अदा करो और अपने धन की ज़कात दो और अल्लाह तथा उसके रसूल का आज्ञापालन करो। ऐ अल्लाह के रसूल की पत्नियो और ऐ आपके घर वालो, अल्लाह तो चाहता है कि तुमसे कष्ट और बुराई दूर कर दे। तथा वह चाहता है कि तुम्हारी आत्माओं को; शिष्टाचार से सुसज्जित एवं दुष्ट आचरण से रहित कर, इस तरह पूर्ण रूप से शुद्ध व पवित्र कर दे कि उसके पश्चात कोई गंदगी बाकी न रहे।

وَٱذْكُرْنَ مَا يُتْلَىٰ فِى بُيُوتِكُنَّ مِنْ ءَايَـٰتِ ٱللَّهِ وَٱلْحِكْمَةِ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ لَطِيفًا خَبِيرًا ﴿٣٤﴾

तुम्हारे घरों में जो अल्लाह के रसूल पर उतरने वाली आयतें और उसके रसूल की पवित्र सुन्नत पढ़ी जाती हैं, उन्हें याद रखो। निश्चय ही अल्लाह तुमपर बड़ा कृ पालु है जब उसने तुमपर यह उपकार किया कि तुम्हें अपने रसूलके घरों में रखा, तथा वह तुमसे पूरी तरह अवगत है जब उसने तुम्हें अपने रसूलके लिए पत्नियों के रूप में चयन किया और तुम्हें आपकी उम्मत के समस्त मोमिनों की माओं के रूप में चुन लिया।

إِنَّ ٱلْمُسْلِمِينَ وَٱلْمُسْلِمَـٰتِ وَٱلْمُؤْمِنِينَ وَٱلْمُؤْمِنَـٰتِ وَٱلْقَـٰنِتِينَ وَٱلْقَـٰنِتَـٰتِ وَٱلصَّـٰدِقِينَ وَٱلصَّـٰدِقَـٰتِ وَٱلصَّـٰبِرِينَ وَٱلصَّـٰبِرَٰتِ وَٱلْخَـٰشِعِينَ وَٱلْخَـٰشِعَـٰتِ وَٱلْمُتَصَدِّقِينَ وَٱلْمُتَصَدِّقَـٰتِ وَٱلصَّـٰٓئِمِينَ وَٱلصَّـٰٓئِمَـٰتِ وَٱلْحَـٰفِظِينَ فُرُوجَهُمْ وَٱلْحَـٰفِظَـٰتِ وَٱلذَّٰكِرِينَ ٱللَّهَ كَثِيرًۭا وَٱلذَّٰكِرَٰتِ أَعَدَّ ٱللَّهُ لَهُم مَّغْفِرَةًۭ وَأَجْرًا عَظِيمًۭا ﴿٣٥﴾

ه ه आज्ञाकारिता के साथ अल्लाह के अधीन होने वाले पुरुष और अधीन होने वाली स्त्रियाँ, अल्लाह को सच्चा मानने वाले पुरुष और सच्चा मानने वाली स्त्रियाँ, अल्लाह का आज्ञापालन करने वाले पुरुष और आज्ञापालन करने वाली स्त्रियाँ, अपने ईमान और कथन में सच्चे पुरुष और सच्ची स्त्रियाँ, आज्ञाकारिता के कामों पर और गुनाहों से दूर रहने में और विपत्ति पर धैर्य से काम लेने वाले पुरुष और धैर्य से काम लेने वाली स्त्रियाँ, अनिवार्य और स्वैच्छिक दान करने वाले पुरुष और दान करने वाली स्त्रियाँ, अल्लाह के लिए अनिवार्य और स्वैच्छिक रोज़ा रखने वाले पुरुष और रोज़ा रखने वाली स्त्रियाँ, अपने गुप्तांगों की रक्षा करने वाले पुरुष और अपने गुप्तांगों की रक्षा करने वाली स्त्रियाँ; उन्हें ऐसे व्यक्ति के सामने प्रकट करने से ढककर, जिसके लिए उन्हें देखना जायज़ नहीं है तथा व्यभिचार के दुष्कर्म और उसकी प्रारंभिक चीज़ों से दूर रहकर, तथा अपने दिलों और अपनी ज़बानों से गुप्त और खुले तौर पर अल्लाह को बहुत अधिक याद करने वाले पुरुष और याद करने वाली स्त्रियाँ - अल्लाह ने उनके लिए अपनी ओर से उनके पापों के लिए क्षमा, तथा क़ियामत के दिन उनके लिए बहुत बड़ा बदला तैयार कर रखा है और वह जन्नत है।

وَمَا كَانَ لِمُؤْمِنٍۢ وَلَا مُؤْمِنَةٍ إِذَا قَضَى ٱللَّهُ وَرَسُولُهُۥٓ أَمْرًا أَن يَكُونَ لَهُمُ ٱلْخِيَرَةُ مِنْ أَمْرِهِمْ ۗ وَمَن يَعْصِ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ فَقَدْ ضَلَّ ضَلَـٰلًۭا مُّبِينًۭا ﴿٣٦﴾

ورسوله فقد ضل ضللا مبينا किसी ईमान वाले पुरुष और ईमान वाली स्त्री के लिए यह ठीक नहीं है कि जब अल्लाह और उसका रसूल किसी बात का निर्णय कर दें, तो उनके लिए उसे स्वीकार करने या अस्वीकार करने का विकल्प बाक़ी रहे। और जो अल्लाह और उसके रसूल की अवज्ञा करे, तो वह स्पष्ट रूप से सीधे रास्ते से भटक गया।

وَإِذْ تَقُولُ لِلَّذِىٓ أَنْعَمَ ٱللَّهُ عَلَيْهِ وَأَنْعَمْتَ عَلَيْهِ أَمْسِكْ عَلَيْكَ زَوْجَكَ وَٱتَّقِ ٱللَّهَ وَتُخْفِى فِى نَفْسِكَ مَا ٱللَّهُ مُبْدِيهِ وَتَخْشَى ٱلنَّاسَ وَٱللَّهُ أَحَقُّ أَن تَخْشَىٰهُ ۖ فَلَمَّا قَضَىٰ زَيْدٌۭ مِّنْهَا وَطَرًۭا زَوَّجْنَـٰكَهَا لِكَىْ لَا يَكُونَ عَلَى ٱلْمُؤْمِنِينَ حَرَجٌۭ فِىٓ أَزْوَٰجِ أَدْعِيَآئِهِمْ إِذَا قَضَوْا۟ مِنْهُنَّ وَطَرًۭا ۚ وَكَانَ أَمْرُ ٱللَّهِ مَفْعُولًۭا ﴿٣٧﴾

ى और जब आप (ऐ रसूल) उस व्यक्ति से, जिसपर अल्लाह ने इस्लाम के द्वारा उपकार किया और आपने उसे आज़ाद करके उसपर उपकार किया - इससे अभिप्राय ज़ैद बिन हारिसा रज़ियल्लाहु अन्हुमा हैं, जब वह आपके पास अपनी पत्नी ज़ैनब बिन्ते जहश को तलाक़ देने के संबंध में परामर्श करने आए - आप उससे कह रहे थे: अपनी पत्नी को अपने पास रोके रखो और उसे तलाक़ न दो। और अल्लाह के आदेशों का पालन करके एवं उसके निषेधों से बचकर उससे डरो। तथा (ऐ रसूल) आप अपने दिल में ज़ैनब से अपनी शादी की बात, जिसकी अल्लाह ने आपकी ओर वह़्य उतारी थी, लोगों के भय से छिपा रहे थे। जबकि अल्लाह ज़ैद के उसे तलाक़ देने फिर आपके उससे विवाह का मामला प्रकट करने वाला था। हालाँकि अल्लाह इस बात का अधिक योग्य है कि आप इस मामले में उससे डरें। फिर जब ज़ैद का मन ज़ैनब से अलग होने पर संतुष्ट हो गया और उसे तलाक़ दे दी, तो हमने आपका उससे विवाह कर दिया, ताकि ईमान वालों पर अपने मुँह बोले बेटों की पत्नियों से विवाह करने में कोई पाप न بلغ क़ुरआन · तफ़सीर रहे, यदि वे उन्हें तलाक दे दें और उनकी इद्दत समाप्त हो जाए। और अल्लाह का आदेश पूरा होकर ही रहता है, उसे कोई रोकने वाला और उसके आगे कोई बाधक नहीं है।

مَّا كَانَ عَلَى ٱلنَّبِىِّ مِنْ حَرَجٍۢ فِيمَا فَرَضَ ٱللَّهُ لَهُۥ ۖ سُنَّةَ ٱللَّهِ فِى ٱلَّذِينَ خَلَوْا۟ مِن قَبْلُ ۚ وَكَانَ أَمْرُ ٱللَّهِ قَدَرًۭا مَّقْدُورًا ﴿٣٨﴾

م قدورا नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उस चीज़ में कोई गुनाह या तंगी नहीं है, जो अल्लाह ने उनके लिए अपने दत्तक पुत्र की पत्नी से विवाह करना वैध कर दिया है। वह इस विषय में अपने पूर्व नबियों की सुन्नत (तरीक़े ) का पालन कर रहे हैं। इसलिए वह इस मामले में कोई अनोखे रसूल नहीं हैं। तथा अल्लाह जो निर्णय कर देता है (जैसे कि इस शादी के पूरा होने और गोद लेने की प्रथा को अमान्य घोषित करने और इसमें नबी की कोई राय या पसंद न होने का) वह पूरा होकर रहता है, उसे कोई टाल नहीं सकता।

ٱلَّذِينَ يُبَلِّغُونَ رِسَـٰلَـٰتِ ٱللَّهِ وَيَخْشَوْنَهُۥ وَلَا يَخْشَوْنَ أَحَدًا إِلَّا ٱللَّهَ ۗ وَكَفَىٰ بِٱللَّهِ حَسِيبًۭا ﴿٣٩﴾

ये नबीगण, जो अपने ऊपर उतरने वाले अल्लाह के संदेशों को अपने समुदायों तक पहुँचाते हैं, और सर्वशक्तिमान व महिमावान अल्लाह के अलावा किसी से भी नहीं डरते।इसलिए वे इस बात पर ध्यान नहीं देते कि दूसरे क्या कहते हैं जब वे उस चीज़ को करते हैं जिसकी अल्लाह ने उन्हें अनुमति दी है। और अल्लाह अपने बंदों के कृ त्यों को संरक्षित रखने के लिए पर्याप्त है, ताकि उनका हिसाब ले और उन्हें उनका बदला दे; अच्छे कर्म का अच्छा बदला और बुरे कर्म का बुरा बदला।

مَّا كَانَ مُحَمَّدٌ أَبَآ أَحَدٍۢ مِّن رِّجَالِكُمْ وَلَـٰكِن رَّسُولَ ٱللَّهِ وَخَاتَمَ ٱلنَّبِيِّـۧنَ ۗ وَكَانَ ٱللَّهُ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمًۭا ﴿٤٠﴾

मुहम्मद तुम्हारे पुरुषों में से किसी के पिता नहीं हैं। अतः वह ज़ैद के भी पिता नहीं हैं कि उनपर ज़ैद की तलाक़ दी हुई पत्नी से विवाह करना हराम(वर्जित) हो। बल्कि वह लोगों की ओर अल्लाह के भेजे हुए रसूल हैं और नबियों की श्रृंखला को समाप्त करने वाले हैं।इसलिए उनके बाद कोई और नबी नहीं है। और अल्लाह हर चीज़ का पूर्ण ज्ञान रखने वाला है, उसके बंदों की कोई चीज़ उससे छिपी नहीं है।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱذْكُرُوا۟ ٱللَّهَ ذِكْرًۭا كَثِيرًۭا ﴿٤١﴾

ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसकी शरीयत पर अमलकरने वालो, तुमअपने दिलों, ज़ुबानों और शारीरिक अंगों से अल्लाह को बहुत याद करते रहो। وسبحوه بكرة وأصيلا

وَسَبِّحُوهُ بُكْرَةًۭ وَأَصِيلًا ﴿٤٢﴾

तथा दिन की शुरुआत और उसके अंत में 'तस्बीह' (सुब्हानल्लाह) और 'तहलील' (ला इलाहा इल्लल्लाह) के द्वारा उसकी पवित्रता बयान करते रहो, क्योंकि ये दोनों प्रतिष्ठा वाले समय हैं।

هُوَ ٱلَّذِى يُصَلِّى عَلَيْكُمْ وَمَلَـٰٓئِكَتُهُۥ لِيُخْرِجَكُم مِّنَ ٱلظُّلُمَـٰتِ إِلَى ٱلنُّورِ ۚ وَكَانَ بِٱلْمُؤْمِنِينَ رَحِيمًۭا ﴿٤٣﴾

वही है, जो तुमपर दया करता है और तुम्हारी प्रशंसा करता है, तथा उसके फ़रिश्ते भी तुम्हारे लिए दुआ करते हैं, ताकि वह तुम्हें कु फ़्र के अँधेरों से निकाल कर ईमान के प्रकाश की ओर लाए। और वह ईमान वालों पर बहुत दयालु है। अतः यदि वे उसकी बात मानते हुए, उसके आदेश का पालन करें और उसके निषेध से बचें, तो वह उन्हें यातना नहीं देता है।

تَحِيَّتُهُمْ يَوْمَ يَلْقَوْنَهُۥ سَلَـٰمٌۭ ۚ وَأَعَدَّ لَهُمْ أَجْرًۭا كَرِيمًۭا ﴿٤٤﴾

ईमान वाले जिस दिन अपने पालनहार से मिलेंगे, उस दिन उनका अभिवादन सलाम (शांति) और हर प्रकार की बुराई से सुरक्षा होगी। और अल्लाह ने उनके लिए सम्मानजनक (व उदार) बदला - अपना स्वर्ग - तैयार कर रखा है। यह उनके उसका आज्ञापालन करने और उसकी अवज्ञा से दूर रहने का बदला है। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّبِىُّ إِنَّآ أَرْسَلْنَـٰكَ شَـٰهِدًۭا وَمُبَشِّرًۭا وَنَذِيرًۭا ﴿٤٥﴾

ऐ नबी! हमने आपको लोगों की ओर, उनपर इस बात का गवाह बनाकर भेजा है कि आपने उन्हें वह संदेश पहुँचा दिया जिसके साथ आप उनकी ओर भेजे गए थे, तथा उनमें से ईमान वालों को उस जन्नत की शुभ सूचना देने वाला जो अल्लाह ने उनके लिए तैयार कर रखी है तथा काफिरों को उसकी यातना से डराने वाला बनाकर भेजा है।

وَدَاعِيًا إِلَى ٱللَّهِ بِإِذْنِهِۦ وَسِرَاجًۭا مُّنِيرًۭا ﴿٤٦﴾

हमने आपको अल्लाह के आदेश से उसके एके श्वरवाद और उसकी आज्ञाकारिता की ओर बुलाने वाला बनाकर भेजा है। तथा हमने आपको एक प्रकाशमान् दीप बनाकर भेजा है, जिससे हर मार्गदर्शन चाहने वाला प्रकाश प्राप्त करता है।

وَبَشِّرِ ٱلْمُؤْمِنِينَ بِأَنَّ لَهُم مِّنَ ٱللَّهِ فَضْلًۭا كَبِيرًۭا ﴿٤٧﴾

तथा आप अल्लाह पर ईमान रखने वाले उन लोगों को, जो उसकी शरीयत पर अमल करते हैं, शुभ सूचना दे दें कि उनके लिए अल्लाह की ओर से बहुत बड़ा अनुग्रह है, जिसमें इस दुनिया में उनकी मदद तथा आखिरत में जन्नत में प्रवेश करने की सफलता शामिल है।

وَلَا تُطِعِ ٱلْكَـٰفِرِينَ وَٱلْمُنَـٰفِقِينَ وَدَعْ أَذَىٰهُمْ وَتَوَكَّلْ عَلَى ٱللَّهِ ۚ وَكَفَىٰ بِٱللَّهِ وَكِيلًۭا ﴿٤٨﴾

आप काफ़िरों और मुनाफ़िक़ों का उस चीज़ में पालन न करें, जो वे अल्लाह के धर्म से रोकने की ओर बुलाते हैं। तथा उनसे उपेक्षा करें। शायद यह इस बात का अधिक प्रेरक हो कि वे उस चीज़ पर ईमान ले आएँ जिसे लेकर आप उनके पास आए हैं। आप अपने सभी मामलों में अल्लाह पर भरोसा करें; जिनमें अपने दुश्मनों पर जीत भी शामिल है। तथा अल्लाह कारसाज़ (काम बनानेवाले) के रूप में पर्याप्त है, जिसपर बंदे अपने दुनिया और आख़िरत के सभी मामलों में भरोसा करते हैं।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ إِذَا نَكَحْتُمُ ٱلْمُؤْمِنَـٰتِ ثُمَّ طَلَّقْتُمُوهُنَّ مِن قَبْلِ أَن تَمَسُّوهُنَّ فَمَا لَكُمْ عَلَيْهِنَّ مِنْ عِدَّةٍۢ تَعْتَدُّونَهَا ۖ فَمَتِّعُوهُنَّ وَسَرِّحُوهُنَّ سَرَاحًۭا جَمِيلًۭا ﴿٤٩﴾

فمتعوهن وسرحوهن سراحاجميلا ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसकी शरीयत पर अमलकरने वालो! जब ईमान वाली महिलाओं से विवाह करो, फिर उनके साथ सहवास करने से पूर्व ही उन्हें तलाक़ दे दो, तो ऐसे में तुम्हारे लिए उनपर 'इद्दत' नहीं है, चाहे वह मासिक धर्म के द्वारा हो या महीनों के द्वारा। क्योंकि उनके साथ सहवास न होने के कारण यह ज्ञात है कि उनका गर्भ खाली है। तथा तलाक़ के कारण उनके टूटे हुए दिलों की सांत्वना के लिए, अपनी क्षमता के अनुसार उन्हें कु छ धन दे दो। और उन्हें कष्ट पहुँचाए बिना, भलाई के साथ उनका रास्ता छोड़ दो।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّبِىُّ إِنَّآ أَحْلَلْنَا لَكَ أَزْوَٰجَكَ ٱلَّـٰتِىٓ ءَاتَيْتَ أُجُورَهُنَّ وَمَا مَلَكَتْ يَمِينُكَ مِمَّآ أَفَآءَ ٱللَّهُ عَلَيْكَ وَبَنَاتِ عَمِّكَ وَبَنَاتِ عَمَّـٰتِكَ وَبَنَاتِ خَالِكَ وَبَنَاتِ خَـٰلَـٰتِكَ ٱلَّـٰتِى هَاجَرْنَ مَعَكَ وَٱمْرَأَةًۭ مُّؤْمِنَةً إِن وَهَبَتْ نَفْسَهَا لِلنَّبِىِّ إِنْ أَرَادَ ٱلنَّبِىُّ أَن يَسْتَنكِحَهَا خَالِصَةًۭ لَّكَ مِن دُونِ ٱلْمُؤْمِنِينَ ۗ قَدْ عَلِمْنَا مَا فَرَضْنَا عَلَيْهِمْ فِىٓ أَزْوَٰجِهِمْ وَمَا مَلَكَتْ أَيْمَـٰنُهُمْ لِكَيْلَا يَكُونَ عَلَيْكَ حَرَجٌۭ ۗ وَكَانَ ٱللَّهُ غَفُورًۭا رَّحِيمًۭا ﴿٥٠﴾

ऐ नबी! हमने आपके लिए आपकी उन पत्नियों को वैध कर दिया है, जिन्हें आपने उनका महर चुका दिया है। तथा हमने आपके लिए उन दासियों को भी हलालकिया है, जो आपके स्वामित्व में हैं, जो अल्लाह ने आपको बंदी औरतों में से प्रदान की हैं। और हमने आपके लिए हलालकिया है आपके चाचा की बेटियों के साथ विवाह, आपकी फू फियों की बेटियों के साथ विवाह, आपके मामा की बेटियों के साथ विवाह और आपकी मौसियों की बेटियों के साथ विवाह, जो आपके साथ मक्का से मदीना की ओर हिजरत करके आई हैं। तथा हमने आपके लिए उस ईमान वाली महिला से भी विवाह करना हलाल किया है जो बिना महर के स्वयं को आपको भेंट कर दे, यदि आप उससे निकाह करना चाहें। और हिबा (अनुदान) का विवाह के वल आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के लिए विशिष्ट है, आपके अलावा उम्मत के किसी अन्य व्यक्ति के लिए जायज़ नहीं है। हमें जानते हैं जो कु छ हमने ईमान वालों पर उनकी पत्नियों के संबंध में अनिवार्य किया है कि उनके लिए चार स्त्रियों की सीमा पार करना वैध नहीं है। तथा हम वह भी जानते हैं जो हमने उनकी दासियों के संबंध में उनके लिए धर्मसंगत किया है कि उनके लिए किसी संख्या के प्रतिबंध के बिना उनमें से जितनी से चाहें, लाभ उठाने का अधिकार हैं। हमने उल्लिखित चीज़ों में से आपके लिए जो कु छ वैध किया है, जो हमने आपके अलावा के लिए अनुमेय नहीं किया; यह इसलिए है ताकि بلغ क़ुरआन · तफ़सीर आपपर कोई तंगी और कष्ट न रहे। और अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों को बहुत क्षमा करने वाला, उनपर अत्यंत दयालु है।

۞ تُرْجِى مَن تَشَآءُ مِنْهُنَّ وَتُـْٔوِىٓ إِلَيْكَ مَن تَشَآءُ ۖ وَمَنِ ٱبْتَغَيْتَ مِمَّنْ عَزَلْتَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكَ ۚ ذَٰلِكَ أَدْنَىٰٓ أَن تَقَرَّ أَعْيُنُهُنَّ وَلَا يَحْزَنَّ وَيَرْضَيْنَ بِمَآ ءَاتَيْتَهُنَّ كُلُّهُنَّ ۚ وَٱللَّهُ يَعْلَمُ مَا فِى قُلُوبِكُمْ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ عَلِيمًا حَلِيمًۭا ﴿٥١﴾

(ऐ रसूल!) आप अपनी पत्नियों में से जिसकी बारी विलंबित करना चाहें, विलंबित कर दें और उसके साथ रात न गुजारें। तथा उनमे से जिसे चाहें, अपने पास रखें और उसके साथ रात बिताएँ। और जिनकी बारी को आपने विलंबित कर दिया है, उनमें से किसी को (फिर से) अपने साथ रखना चाहें, तो इसमें आपपर कोई गुनाह नहीं है। आपके लिए यह विकल्प और विस्तार इस बात के अधिक निकट है कि इससे आपकी स्त्रियों की आँखें ठंडी रहें और यह कि आपने उन्हें जो कु छ दिया है, उससे वे संतुष्ट रहें। क्योंकि उन्हें मालूम है कि आपने कोई कर्तव्य नहीं छोड़ा है और न किसी हक़ की अदायगी में कंजूसी की है। और (ऐ पुरुषो!) तुम्हारे दिलों में जो कुछ स्त्रियों को छोड़कर कु छ की ओर झुकाव पाया जाता है, अल्लाह उससे अवगत है। अल्लाह अपने बंदों के कार्यों को भली-भाँति जानने वाला है, उससे उनमें से कु छ भी छिपा नहीं है, तथा वह सहनशील है, उन्हें सज़ा देने में जल्दी नहीं करता, ताकि वे तौबा कर लें।

لَّا يَحِلُّ لَكَ ٱلنِّسَآءُ مِنۢ بَعْدُ وَلَآ أَن تَبَدَّلَ بِهِنَّ مِنْ أَزْوَٰجٍۢ وَلَوْ أَعْجَبَكَ حُسْنُهُنَّ إِلَّا مَا مَلَكَتْ يَمِينُكَ ۗ وَكَانَ ٱللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ رَّقِيبًۭا ﴿٥٢﴾

عل كل شىء رقيبا ى आपके लिए (ऐ रसूल) अपनी उन पत्नियों के अलावा जो आपके निकाह में हैं, अन्य महिलाओं से शादी करना जायज़ नहीं है। तथा आपके लिए उन्हें तलाक़ देना, या उनमें से कुछ को तलाक़ देना वैध नहीं है ताकि उनके अलावा अन्य महिलाओं को ले आएँ, यद्यपि उनके अलावा जिन महिलाओं से आप शादी करना चाहते हैं, उनका सौंदर्य आपको कितना ही अच्छा क्यों न लगे। लेकिन आपके लिए उन दासियों से, जो आपके स्वामित्व में हैं, किसी विशिष्ट संख्या की सीमा के बिना लाभ उठाना जायज़ है। और अल्लाह प्रत्येक वस्तु का संरक्षक है। यह आदेश मोमिनों की माताओं (रसूलकी पत्नियों) की प्रतिष्ठा को इंगित करता है। क्योंकि उन्हें तलाक़ देने और उनके रहते अन्य स्त्रियों से विवाह करने से मना किया गया है।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تَدْخُلُوا۟ بُيُوتَ ٱلنَّبِىِّ إِلَّآ أَن يُؤْذَنَ لَكُمْ إِلَىٰ طَعَامٍ غَيْرَ نَـٰظِرِينَ إِنَىٰهُ وَلَـٰكِنْ إِذَا دُعِيتُمْ فَٱدْخُلُوا۟ فَإِذَا طَعِمْتُمْ فَٱنتَشِرُوا۟ وَلَا مُسْتَـْٔنِسِينَ لِحَدِيثٍ ۚ إِنَّ ذَٰلِكُمْ كَانَ يُؤْذِى ٱلنَّبِىَّ فَيَسْتَحْىِۦ مِنكُمْ ۖ وَٱللَّهُ لَا يَسْتَحْىِۦ مِنَ ٱلْحَقِّ ۚ وَإِذَا سَأَلْتُمُوهُنَّ مَتَـٰعًۭا فَسْـَٔلُوهُنَّ مِن وَرَآءِ حِجَابٍۢ ۚ ذَٰلِكُمْ أَطْهَرُ لِقُلُوبِكُمْ وَقُلُوبِهِنَّ ۚ وَمَا كَانَ لَكُمْ أَن تُؤْذُوا۟ رَسُولَ ٱللَّهِ وَلَآ أَن تَنكِحُوٓا۟ أَزْوَٰجَهُۥ مِنۢ بَعْدِهِۦٓ أَبَدًا ۚ إِنَّ ذَٰلِكُمْ كَانَ عِندَ ٱللَّهِ عَظِيمًا ﴿٥٣﴾

إ ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसकी शरीयत पर अमल करने वालो! नबी के घरों में प्रवेश न करो, सिवाय इसके कि उन्होंने तुम्हें भोजन करने के लिए आमंत्रित करके अंदर आने की अनुमति प्रदान कर दी हो। लेकिन (वहाँ जाकर) खाना पकने की प्रतीक्षा में देर तक न बैठे रहो। बल्कि जब तुम्हें भोजन करने के लिए बुलाया जाए तो प्रवेश करो। फिर जब खाना खा चुको, तो उठकर चले जाओ। खाने के बाद आपस में बात करते हुए बैठे न रहो। तुम्हारा इस तरह ठहरना नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कष्ट देता है, लेकिन उन्हें तुम्हें उठकर जाने के लिए कहने में शर्म आती है। परंतु अल्लाह सत्य बात का आदेश देने से नहीं शरमाता। इसलिए उसने तुम्हें वहाँ से उठकर चले जाने का आदेश दिया है, ताकि तुम वहाँ ठहरकर आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कष्ट न पहुँचाओ। इसी तरह जब तुम नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पत्नियों से ज़रूरत का कोई सामान, जैसे बर्तन आदि माँगो, तो उसे पर्दे के पीछे से माँगो। तुम उसे उनके सामने होकर न माँगो ताकि उनपर तुम्हारी नज़र न पड़े। यह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की स्थिति को ध्यान में रखते हुए आपकी पत्नियों की सुरक्षा के लिए है। साथ ही तुम्हारा पर्दे के पीछे से माँगना तुम्हारे दिलों तथा उनके दिलों के लिए अधिक पवित्रता व शुद्धता की बात है। ताकि शैतान तुम्हारे दिलों तथा उनके दिलों में वसवसा (भ्रम) न डाले और बुराई को शोभित न करे। तथा (ऐ ईमान वालो!) तुम्हारे लिए उचित नहीं है कि तुम(खाना खाने के बाद) बात करने के लिए ठहरकर अल्लाह के रसूलको कष्ट पहुँचाओ। और न यह कि तुमआपकी मृत्यु के बाद आपकी पत्नियों से शादी करो। क्योंकि वे मोमिनों की माएँ हैं और किसी के लिए वैध नहीं कि अपनी माँ से विवाह करे। तुम्हारा इस तरह कष्ट पहुँचाना - जिसका एक रूप आपकी मृत्यु के बाद आपकी पत्नियों से विवाह करना है - हराम (निषिद्ध) है और अल्लाह के निकट एक बहुत बड़ा पाप माना जाता है। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

إِن تُبْدُوا۟ شَيْـًٔا أَوْ تُخْفُوهُ فَإِنَّ ٱللَّهَ كَانَ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمًۭا ﴿٥٤﴾

तुम अपने किसी कार्य को प्रकट करो या उसे अपने मन में छिपाकर रखो, वह अल्लाह से हरगिज़ नहीं छिप सकता। निःसंदेह अल्लाह प्रत्येक वस्तु का ज्ञान रखता है। उससे तुम्हारा कोई काम या कोई अन्य चीज़ छिपी नहीं रह सकती। और वह तुम्हें तुम्हारे कर्मों का बदला देगा; यदि अच्छा कर्म है तो अच्छा बदला और यदि बुरा कर्म है तो बुरा बदला।

لَّا جُنَاحَ عَلَيْهِنَّ فِىٓ ءَابَآئِهِنَّ وَلَآ أَبْنَآئِهِنَّ وَلَآ إِخْوَٰنِهِنَّ وَلَآ أَبْنَآءِ إِخْوَٰنِهِنَّ وَلَآ أَبْنَآءِ أَخَوَٰتِهِنَّ وَلَا نِسَآئِهِنَّ وَلَا مَا مَلَكَتْ أَيْمَـٰنُهُنَّ ۗ وَٱتَّقِينَ ٱللَّهَ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ شَهِيدًا ﴿٥٥﴾

ى महिलाओं पर इसमें कोई गुनाह नहीं है कि उनके पिता, उनके बच्चे, उनके भाई, उनके भतीजे और उनके भांजे, चाहे वे वंश से हों या स्तनपान से, उन्हें देखें और बिना पर्दे के उनसे बात करें। तथा उनपर इसमें कोई पाप नहीं है कि मोमिन स्त्रियाँ और उनके दास एवं दासी उनसे बिना पर्दे के बात करें। और (ऐ मोमिन स्त्रियो) अल्लाह के आदेशों और निषेधों के बारे में अल्लाह से डरती रहो। क्योंकि वह तुम्हारे सभी कथनों और कर्मों को देखने वाला है।

إِنَّ ٱللَّهَ وَمَلَـٰٓئِكَتَهُۥ يُصَلُّونَ عَلَى ٱلنَّبِىِّ ۚ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ صَلُّوا۟ عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا۟ تَسْلِيمًا ﴿٥٦﴾

निःसंदेह अल्लाह अपने फरिश्तों के निकट रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की प्रशंसा करता है और फ़रिश्ते उनके लिए दुआ करते हैं। ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसकी अपने बंदों के लिए निर्धारित की हुई शरीयत पर अमल करने वालो! तुम (भी) रसूल पर दुरूद और खूब सलाम भेजो।

إِنَّ ٱلَّذِينَ يُؤْذُونَ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ لَعَنَهُمُ ٱللَّهُ فِى ٱلدُّنْيَا وَٱلْـَٔاخِرَةِ وَأَعَدَّ لَهُمْ عَذَابًۭا مُّهِينًۭا ﴿٥٧﴾

निःसंदेह जो लोग अल्लाह और उसके रसूल को अपने शब्द या कर्म से कष्ट पहुँचाते हैं, अल्लाह ने उन्हें लोक एवं परलोक में अपनी दया की विशालता से निष्कासित कर दिया है और उनके अपने रसूल को कष्ट पहुँचाने की सज़ा के तौर पर आख़िरत में उनके लिए अपमानजनक यातना तैयार कर रखी है।

وَٱلَّذِينَ يُؤْذُونَ ٱلْمُؤْمِنِينَ وَٱلْمُؤْمِنَـٰتِ بِغَيْرِ مَا ٱكْتَسَبُوا۟ فَقَدِ ٱحْتَمَلُوا۟ بُهْتَـٰنًۭا وَإِثْمًۭا مُّبِينًۭا ﴿٥٨﴾

जो लोग अपने शब्द या कर्म से ईमान वाले पुरुषों और ईमान वाली स्त्रियों को कष्ट पहुँचाते हैं, बिना किसी पाप के जो उन्होंने कोई अपराध करके कमाया हो जो उस कष्ट के पहुँचाने का कारण हो, तो उन्होंने अपने ऊपर झूठ और स्पष्ट गुनाह का बोझ उठाया।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّبِىُّ قُل لِّأَزْوَٰجِكَ وَبَنَاتِكَ وَنِسَآءِ ٱلْمُؤْمِنِينَ يُدْنِينَ عَلَيْهِنَّ مِن جَلَـٰبِيبِهِنَّ ۚ ذَٰلِكَ أَدْنَىٰٓ أَن يُعْرَفْنَ فَلَا يُؤْذَيْنَ ۗ وَكَانَ ٱللَّهُ غَفُورًۭا رَّحِيمًۭا ﴿٥٩﴾

ऐ नबी! आप अपनी पत्नियों से कह दें, तथा अपनी बेटियों से कह दें और ईमान वालों की स्त्रियों से कह दें कि: वे अपने ऊपर उन चादरों का कु छ हिस्सा डाल लिया करें जो वे पहनती हैं, ताकि पराए (ग़ैर मह़-रम) पुरुषों के सामने उनके शरीर का कोई अंग खुलने न पाए। यह इसके अधिक निकट है कि उन्हें पहचान लिया जाएगा कि वे आज़ाद (व शरीफ़) औरतें हैं, तो कोई उन्हें कष्ट नहीं पहुँचाएगा, जिस तरह कि वह दासियों के साथ छेड़छाड़ करता है। और अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदे के पापों को क्षमा करने वाला, उसपर दयालु है।

۞ لَّئِن لَّمْ يَنتَهِ ٱلْمُنَـٰفِقُونَ وَٱلَّذِينَ فِى قُلُوبِهِم مَّرَضٌۭ وَٱلْمُرْجِفُونَ فِى ٱلْمَدِينَةِ لَنُغْرِيَنَّكَ بِهِمْ ثُمَّ لَا يُجَاوِرُونَكَ فِيهَآ إِلَّا قَلِيلًۭا ﴿٦٠﴾

إ ل اقليلا यदि मुनाफ़िक़ों (पाखंडियों) ने दिल में कु फ़्र छिपाकर और इस्लाम का ढोंग करके अपने पाखंड को समाप्त नहीं किया, तथा वे लोग जिनके दिलों में अपनी वासनाओं के प्रति लगाव का रोग है और वे लोग जो मदीना में मोमिनों के बीच फू ट डालने के उद्देश्य से झूठी खबरें फै लाते रहते हैं, (यदि ये लोग अपनी करतूतों से बाज़ नहीं आए) - तो हम आपको (ऐ रसूल!) उन्हें दंडित करने के लिए आदेश दे देंगे और आपको उनपर हावी कर देंगे। फिर वे आपके साथ मदीना में थोड़े ही समय के लिए रह सकेंगे। क्योंकि उनके ज़मीन पर भ्रष्टाचार करने के कारण, उन्हें नष्ट कर दिया जाएगा या मदीना से निष्कासित कर दिया जाएगा। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

مَّلْعُونِينَ ۖ أَيْنَمَا ثُقِفُوٓا۟ أُخِذُوا۟ وَقُتِّلُوا۟ تَقْتِيلًۭا ﴿٦١﴾

वे अल्लाह की दया से निष्कासित हैं। वे जहाँ भी मिलें, पकड़े जाएँगे और अपने पाखंड और धरती पर भ्रष्टाचार फै लाने के कारण बुरी तरह वध कर दिए जाएँगे।

سُنَّةَ ٱللَّهِ فِى ٱلَّذِينَ خَلَوْا۟ مِن قَبْلُ ۖ وَلَن تَجِدَ لِسُنَّةِ ٱللَّهِ تَبْدِيلًۭا ﴿٦٢﴾

यही मुनाफिक़ों (पाखंडियों) के बारे में अल्लाह का निरंतर चलने वाला नियम है, यदि वे पाखंड दिखाते हैं। और अल्लाह का नियम अटल है, उसमें आपको कदापि कोई बदलाव नहीं मिलेगा।

يَسْـَٔلُكَ ٱلنَّاسُ عَنِ ٱلسَّاعَةِ ۖ قُلْ إِنَّمَا عِلْمُهَا عِندَ ٱللَّهِ ۚ وَمَا يُدْرِيكَ لَعَلَّ ٱلسَّاعَةَ تَكُونُ قَرِيبًا ﴿٦٣﴾

(ऐ रसूल!) मुश्रिक लोग आपसे इनकार करने और झुठलाने के तौर पर, तथा यहूदी भी आपसे क़ियामत के बारे में पूछते हैं कि: उसका समय कब है? आप इन लोगों से कह दें: क़ियामत का ज्ञान अल्लाह के पास है, मेरे पास उसकी कोई जानकारी नहीं है। और (ऐ रसूल!) आपको क्या पता शायद क़ियामत निकट ही हो?

إِنَّ ٱللَّهَ لَعَنَ ٱلْكَـٰفِرِينَ وَأَعَدَّ لَهُمْ سَعِيرًا ﴿٦٤﴾

निःसंदेह महिमावान अल्लाह ने काफिरों को अपनी दया से निष्कासित कर दिया है और उनके लिए क़ियामत के दिन धधकती आग तैयार कर रखी है, जो उनकी प्रतीक्षा कर रही है। ي

خَـٰلِدِينَ فِيهَآ أَبَدًۭا ۖ لَّا يَجِدُونَ وَلِيًّۭا وَلَا نَصِيرًۭا ﴿٦٥﴾

वे उस आग की यातना में जो उनके लिए तैयार की गई है सदैव रहेंगे। जिसमें उन्हें न कोई दोस्त मिलेगा, जो उन्हें लाभ पहुँचा सके और न कोई सहायक मिलेगा, जो उनसे यातना को दूर कर सके ।

يَوْمَ تُقَلَّبُ وُجُوهُهُمْ فِى ٱلنَّارِ يَقُولُونَ يَـٰلَيْتَنَآ أَطَعْنَا ٱللَّهَ وَأَطَعْنَا ٱلرَّسُولَا۠ ﴿٦٦﴾

क़ियामत के दिन उनके चेहरे जहन्नम की आग में उलटे-पलटे जाएँगे। वे अफ़सोस और पछतावा की तीव्रता से कहेंगे: ऐ काश! हमने अपने दुनिया के जीवन में अल्लाह का आज्ञापालन किया होता उस चीज़ का पालन करके जिसका उसने हमें आदेश दिया था और उस चीज़ से बचकर जिससे उसने हमें रोका था। तथा हमने उस चीज़ में रसूल का आज्ञापालन किया होता जो कु छ वह अपने पालनहार की ओर ओर से लाए थे।

وَقَالُوا۟ رَبَّنَآ إِنَّآ أَطَعْنَا سَادَتَنَا وَكُبَرَآءَنَا فَأَضَلُّونَا ٱلسَّبِيلَا۠ ﴿٦٧﴾

वे एक अनर्गल और झूठा तर्क प्रस्तुत करेंगे। चुनाँचे वे कहेंगे: ऐ हमारे पालनहार, हमने अपने सरदारों और अपनी जाति के बड़े लोगों का कहा माना, तो उन्होंने हमें सीधे मार्ग से भटका दिया।

رَبَّنَآ ءَاتِهِمْ ضِعْفَيْنِ مِنَ ٱلْعَذَابِ وَٱلْعَنْهُمْ لَعْنًۭا كَبِيرًۭا ﴿٦٨﴾

ऐ हमारे पालनहार! इन सरदारों और बड़े लोगों को, जिन्होंने हमें सीधे मार्ग से भटका दिया, उसका दोगुना अज़ाब दे, जितना तूने हमें दिया है। क्योंकि इन्होंने हमें गुमराह किया था। और इन्हें अपनी दया से बहुत दूर कर दे।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تَكُونُوا۟ كَٱلَّذِينَ ءَاذَوْا۟ مُوسَىٰ فَبَرَّأَهُ ٱللَّهُ مِمَّا قَالُوا۟ ۚ وَكَانَ عِندَ ٱللَّهِ وَجِيهًۭا ﴿٦٩﴾

ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसकी शरीयत पर अमल करने वालो! तुम अपने रसूल को कष्ट न पहुँचाओ। अन्यथा, तुम उन लोगों के समान हो जाओगे, जिन्होंने मूसा अलैहिस्सलाम को कष्ट पहुँचाया था, जैसे कि उन्होंने उनके शरीर में दोष होने का आरोप लगाया था, परंतु अल्लाह ने उन्हें उनके मिथ्यारोप से बरी कर दिया। चुनाँचे उन بلغ क़ुरआन · तफ़सीर लोगों के लिए यह स्पष्ट हो गया कि मूसा अलैहिस्सलाम उस दोष से पवित्र हैं जो उन्होंने उनके बारे में मढ़ा था। दरअसल, मूसा अलैहिस्सलाम अल्लाह के निकट बड़े प्रतिष्ठावान थे, जिसका अनुरोध अस्वीकार नहीं किया जाता, और उसका प्रयास विफल नहीं होता।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَقُولُوا۟ قَوْلًۭا سَدِيدًۭا ﴿٧٠﴾

ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसकी शरीयत पर अमल करने वालो! अल्लाह से डरो, उसके आदेशों का पालन करके और उसकी मना की हुई बातों से बचकर। तथा ठीक और सच्ची बात कहो।

يُصْلِحْ لَكُمْ أَعْمَـٰلَكُمْ وَيَغْفِرْ لَكُمْ ذُنُوبَكُمْ ۗ وَمَن يُطِعِ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ فَقَدْ فَازَ فَوْزًا عَظِيمًا ﴿٧١﴾

यदि तुमअल्लाह से डरते रहे तथा ठीक और सच्ची बात करते रहे, तो वह तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्मों को सुधार देगा, उन्हें तुमसे स्वीकार कर लेगा तथा तुम्हारे गुनाहों को इस तरह मिटा देगा कि उनपर तुम्हारी पकड़ नहीं करेगा। और जो अल्लाह और उसके रसूल का आज्ञापालन करे, उसने बहुत बड़ी सफलता प्राप्त कर ली, जिसके समान कोई अन्य सफलता नहीं है और वह अल्लाह की प्रसन्नता की प्राप्ति और जन्नत में प्रवेश है।

إِنَّا عَرَضْنَا ٱلْأَمَانَةَ عَلَى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَٱلْجِبَالِ فَأَبَيْنَ أَن يَحْمِلْنَهَا وَأَشْفَقْنَ مِنْهَا وَحَمَلَهَا ٱلْإِنسَـٰنُ ۖ إِنَّهُۥ كَانَ ظَلُومًۭا جَهُولًۭا ﴿٧٢﴾

ظلوما جهولا हमने शरई जिम्मेदारियों और संरक्षित किए जाने वाले धनों और रहस्यों को आकाशों पर, धरती पर तथा पर्वतों पर पेश किए, तो उन्होंने उसे उठाने से इनकार कर दिया और उसके परिणामसे डर गए। परंतु इनसान ने उसे उठा लिया। निश्चय ही वह स्वंय पर अत्याचार करने वाला और उसे उठाने के परिणामसे अनभिज्ञ है।

لِّيُعَذِّبَ ٱللَّهُ ٱلْمُنَـٰفِقِينَ وَٱلْمُنَـٰفِقَـٰتِ وَٱلْمُشْرِكِينَ وَٱلْمُشْرِكَـٰتِ وَيَتُوبَ ٱللَّهُ عَلَى ٱلْمُؤْمِنِينَ وَٱلْمُؤْمِنَـٰتِ ۗ وَكَانَ ٱللَّهُ غَفُورًۭا رَّحِيمًۢا ﴿٧٣﴾

غفورا ر حيما मनुष्य ने अल्लाह की निर्धारित तक़दीर के अनुसार उस अमानत को उठा लिया; ताकि अल्लाह मुनाफ़िक़ (पाखंडी) पुरुषों और मुनाफ़िक़ (पाखंडी) स्त्रियों तथा मुश्रिक (अनेके श्वरवादी) पुरुषों और मुश्रिक (अनेके श्वरवादी) स्त्रियों को उनके निफ़ाक़ (पाखंड) और अल्लाह के साथ शिर्क (यानी उसका साझी बनाने) की सज़ा दे। और ताकि अल्लाह ऐसे मोमिन पुरुषों और मोमिन स्त्रियों की तौबा स्वीकार करे, जिन्होंने शरई ज़िम्मेदारियों की अमानत अच्छे ढंग से उठाई। और अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों को क्षमा प्रदान करनेवाला और उनपर दया करनेवाला है। स्रोत:अल-मुख़्तसर फ़ी तफ़सीरिल क़ु रआनिल करीम

सीखें · Al-Ahzaab — الأحزاب

साथ पढ़ें · दोहराएँ · सुनाएँ · बिना पंजीकरण

तफ़सीर · 31 भाषाएँ