होमतफ़सीरAl-Baqara (2)

तफ़सीर Al-Baqara (2) — البقرة

मदनी · 286 आयतें

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الٓمٓ ﴿١﴾

{अलिफ़, लाम, मीम} ये उन अक्षरों में से हैं, जिनसे कु छ सूरतों (सूरत का बहुवचन) का आरंभ किया गया है। यह अरबी भाषा की वर्णमाला है जिसका अपने आप में कोई अर्थ नहीं है यदि वे इस तरह (अलिफ, बा, ता) अलग-अलग आएँ। लेकिन इनकी एक हिकमत और मतलब है; क्योंकि क़ु रआन में कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जिसकी कोई ह़िकमत न हो। इनकी सबसे महत्वपूर्ण हिक़मतों में से एक: क़ुरआन के द्वारा चुनौती की ओर संकेत है, जो उन्हीं अक्षरों से बना है, जिन्हें वे जानते और बोलते हैं; यही कारण है कि अक्सर इन अक्षरों के बाद क़ु रआन पाक का उल्लेख होता है, जैसा कि इस सूरत में है।

ذَٰلِكَ ٱلْكِتَـٰبُ لَا رَيْبَ ۛ فِيهِ ۛ هُدًۭى لِّلْمُتَّقِينَ ﴿٢﴾

इस महान क़ु रआन में कोई संदेह नहीं। न इसके अल्लाह की ओर से उतरने के संदर्भ में, और न ही इसके शब्द और अर्थ के संदर्भ में। चुनाँचे यह क़ु रआन अल्लाह की वाणी है, जो परहेज़गारों का अल्लाह तक पहुँचाने वाले रास्ते का मार्गदर्शन करता है।

ٱلَّذِينَ يُؤْمِنُونَ بِٱلْغَيْبِ وَيُقِيمُونَ ٱلصَّلَوٰةَ وَمِمَّا رَزَقْنَـٰهُمْ يُنفِقُونَ ﴿٣﴾

وَٱلَّذِينَ يُؤْمِنُونَ بِمَآ أُنزِلَ إِلَيْكَ وَمَآ أُنزِلَ مِن قَبْلِكَ وَبِٱلْـَٔاخِرَةِ هُمْ يُوقِنُونَ ﴿٤﴾

जो लोग ग़ैब (परोक्ष, अनदेखी) पर ईमान लाते हैं। ग़ैब से अभिप्राय हर वह चीज़ है, जिसका बोध ज्ञानेंद्रियों द्वारा नहीं होता है और वह हमसे ओझल है, जिसके बारे में अल्लाह ने या उसके रसूल ने सूचना दी है, जैसे कि आख़िरत का दिन। तथा वही लोग नमाज़ की स्थापना करते हैं इस प्रकार कि अल्लाह द्वारा निर्धारित की गई शर्तों, अर्कान, वाजिबात और सुन्नतों के अनुसार उसकी अदायगी करते हैं। तथा वही लोग हैं, जो उसमें से खर्च करते हैं जो अल्लाह ने उन्हें प्रदान किया है, अर्थात् अल्लाह के सवाब की आशा में, अनिवार्य दान जैसे कि ज़कात अथवा ग़ैर-वाजिब जैसे कि स्वैच्छिक दान देते हैं। तथा वही हैं जो उस वह़्य पर जो अल्लाह ने - ऐ नबी! - आपपर उतारी है तथा आपसे पूर्व अन्य सभी नबियों पर उतारी है, बिना भेदभाव के ईमान लाते हैं। तथा वही लोग आख़िरत तथा उसके पुण्य एवं दंड पर दृढ़ विश्वास रखते हैं।

أُو۟لَـٰٓئِكَ عَلَىٰ هُدًۭى مِّن رَّبِّهِمْ ۖ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْمُفْلِحُونَ ﴿٥﴾

इन विशेषताओं से परिपूर्ण लोग ही हिदायत के पथ पर चलने वाले हैं तथा यही लोग दुनिया एवं आख़िरत में, जिसकी वे आशा करते हैं उसे प्राप्त करके और जिस चीज़ से वे डरते हैं उससे मुक्ति पाकर, कामयाब हैं।

إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ سَوَآءٌ عَلَيْهِمْ ءَأَنذَرْتَهُمْ أَمْ لَمْ تُنذِرْهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ ﴿٦﴾

जिन लोगों पर ईमान न लाने की अल्लाह की बात सिद्ध हो चुकी है, वे अपनी पथभ्रष्टता और हठ पर क़ायम रहने वाले हैं। इसलिए आपका उन्हें डराना और न डराना बराबर है।

خَتَمَ ٱللَّهُ عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ وَعَلَىٰ سَمْعِهِمْ ۖ وَعَلَىٰٓ أَبْصَـٰرِهِمْ غِشَـٰوَةٌۭ ۖ وَلَهُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌۭ ﴿٧﴾

क्योंकि अल्लाह ने उनके दिलों पर मुहर लगा दी है और उनमें मौजूद कुफ़्र सहित उन्हें बंद कर दिया है। तथा उनके कानों पर मुहर लगा दी है, अतः वे सत्य को उसे स्वीकारने और उसका अनुसरण करने की नीयत से नहीं सुनते हैं। तथा उनकी आँखों पर पर्दा डाल दिया है, अतः वे सत्य के स्पष्ट होने के बावजूद उसे नहीं देखते हैं, और उनके लिए आख़िरत में बहुत बड़ी यातना है। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

وَمِنَ ٱلنَّاسِ مَن يَقُولُ ءَامَنَّا بِٱللَّهِ وَبِٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ وَمَا هُم بِمُؤْمِنِينَ ﴿٨﴾

लोगों का एक समूह ऐसा है, जो यह दावा करता है कि वे ईमान वाले हैं। वे अपनी जान और अपने मालके डर से के वलअपनी ज़बान से ऐसा कहते हैं। जबकि अंदर से वे काफ़िर हैं।

يُخَـٰدِعُونَ ٱللَّهَ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَمَا يَخْدَعُونَ إِلَّآ أَنفُسَهُمْ وَمَا يَشْعُرُونَ ﴿٩﴾

वे अपनी अज्ञानतावश यह समझते हैं कि वे ईमान का प्रदर्शन करके और कु फ़्र को छिपाकर अल्लाह और मोमिनों को धोखा दे रहे हैं। लेकिन उन्हें इसका एहसास नहीं है; क्योंकि अल्लाह रहस्य और छिपी बातों को जानता है और उसने ईमान वालों को उनकी विशेषताओं और स्थितियों के बारे में सूचित कर दिया है।

فِى قُلُوبِهِم مَّرَضٌۭ فَزَادَهُمُ ٱللَّهُ مَرَضًۭا ۖ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌۢ بِمَا كَانُوا۟ يَكْذِبُونَ ﴿١٠﴾

कारण यह है कि उनके दिलों में संदेह है। इसलिए अल्लाह ने उनके संदेह में संदेह को और बढ़ा दिया; क्योंकि बदला कार्य ही के समान दिया जाता है। तथा उनके लिए जहन्नम के सबसे निचले गढ़े में दर्दनाक यातना है। इसलिए कि उन्होंने अल्लाह पर और लोगों पर झूठ कहा और मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के लाए हुए धर्म को झुठलाया।

وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ لَا تُفْسِدُوا۟ فِى ٱلْأَرْضِ قَالُوٓا۟ إِنَّمَا نَحْنُ مُصْلِحُونَ ﴿١١﴾

जब उन्हें कु फ़्र, पापों और अन्य चीजों के द्वारा धरती पर उपद्रव करने से मना किया जाता है, तो वे इनकार करते हैं और दावा करते हैं कि वे तो सदाचार और सुधार वाले हैं।

أَلَآ إِنَّهُمْ هُمُ ٱلْمُفْسِدُونَ وَلَـٰكِن لَّا يَشْعُرُونَ ﴿١٢﴾

जबकि वास्तविकता यह है कि वही उपद्रव करने वाले और उत्पात मचाने वाले हैं, लेकिन उन्हें इसका एहसास नहीं है, और न ही वे यह समझते हैं कि उनका यह कृ त्यही असल उपद्रव है।

وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ ءَامِنُوا۟ كَمَآ ءَامَنَ ٱلنَّاسُ قَالُوٓا۟ أَنُؤْمِنُ كَمَآ ءَامَنَ ٱلسُّفَهَآءُ ۗ أَلَآ إِنَّهُمْ هُمُ ٱلسُّفَهَآءُ وَلَـٰكِن لَّا يَعْلَمُونَ ﴿١٣﴾

जब उन्हें मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथियों के ईमान लाने की तरह ईमान लाने का आदेश दिया जाता है, तो वे अस्वीकृ ति और उपहास के रूप में उसका उत्तर देते हुए कहते हैं: क्या हमअल्पबुद्धि वालों के ईमान लाने की तरह ईमान ले आएँ?! सच तो यह है कि वे स्वयं मूर्ख हैं, लेकिन वे इससे अनजान हैं।

وَإِذَا لَقُوا۟ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ قَالُوٓا۟ ءَامَنَّا وَإِذَا خَلَوْا۟ إِلَىٰ شَيَـٰطِينِهِمْ قَالُوٓا۟ إِنَّا مَعَكُمْ إِنَّمَا نَحْنُ مُسْتَهْزِءُونَ ﴿١٤﴾

जब वे मोमिनों से मिलते हैं, तो उनके डर से कहते हैं: हम उसपर ईमान लाते हैं जिसपर तुम ईमान लाते हो। और जब वे ईमान वालों के पास से अपने सरदारों की ओर वापस लौटते हैं और उनके साथ एकांत में होते हैं, तो उनके साथ होने का विश्वास दिलाते हुए कहते हैं: निश्चय हम तुम्हारे साथ तुम्हारे मार्ग ही पर हैं। लेकिन हम ईमान वालों से ज़ाहिरी तौर पर, उनका मज़ाक़ उड़ाने और उपहास करने के लिए, सहमत हैं।

ٱللَّهُ يَسْتَهْزِئُ بِهِمْ وَيَمُدُّهُمْ فِى طُغْيَـٰنِهِمْ يَعْمَهُونَ ﴿١٥﴾

उनके ईमान वालों का उपहास करने के मुक़ाबिले में, अल्लाह उनका मज़ाक़ उड़ाता है, उन्हें उनके कार्य ही के समान बदला देने के तौर पर। यही कारण है कि उनके लिए इस दुनिया में मुसलमानों के नियम लागू किए हैं, लेकिन आख़िरत में उन्हें उनके कुफ़्र तथा निफ़ाक़ का बदला देगा। तथा अल्लाह उन्हें ढील देता है, ताकि वे अपनी गुमराही और सरकशी में बने रहें। इसतरह वे अचंभे तथा असमंजस(दुविधा), में पड़े रहें। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ ٱشْتَرَوُا۟ ٱلضَّلَـٰلَةَ بِٱلْهُدَىٰ فَمَا رَبِحَت تِّجَـٰرَتُهُمْ وَمَا كَانُوا۟ مُهْتَدِينَ ﴿١٦﴾

वे मुनाफ़िक़ जिन्हें इन विशेषताओं के साथ वर्णित किया गया है, वही लोग हैं जिन्होंने ईमान के बदले कुफ़्र को चुना। इसलिए उनके व्यापार से कोई लाभ नहीं हुआ; क्योंकि वे अल्लाह पर ईमान से हाथ धो बैठे और उन्हें सत्य मार्ग भी प्राप्त नहीं हुआ।

مَثَلُهُمْ كَمَثَلِ ٱلَّذِى ٱسْتَوْقَدَ نَارًۭا فَلَمَّآ أَضَآءَتْ مَا حَوْلَهُۥ ذَهَبَ ٱللَّهُ بِنُورِهِمْ وَتَرَكَهُمْ فِى ظُلُمَـٰتٍۢ لَّا يُبْصِرُونَ ﴿١٧﴾

अल्लाह तआला ने इन मुनाफ़िक़ों (पाखंडियों) के दो उदाहरण पेश किए हैं: एक आग का उदाहरण, और दूसरा पानी का उदाहरण। उनका आग का उदाहरण यह है कि: वे (मुनाफ़िक़) उस आदमी की तरह हैं, जिसने रोशनी प्राप्त करने के लिए आग जलाई। जब उसकी रोशनी चमकी और उसने सोचा कि अब उससे लाभान्वित होगा, तो वह बुझ गई। चुनाँचे उसमें जो चमकने वाला तत्व था, वह समाप्त हो गया तथा जो कु छ उसमें जलाने का तत्व था, वह रह गया। इसलिए वे आग जलाने वाले अंधकार में पड़े रह गए। उन्हें कु छ दिखाई नहीं देता और न वे कोई रास्ता ही पाते हैं। صم بكمعمى فهم لا يرجعون

صُمٌّۢ بُكْمٌ عُمْىٌۭ فَهُمْ لَا يَرْجِعُونَ ﴿١٨﴾

वे बहरे हैं, सत्य को स्वीकार करने की नीयत से नहीं सुनते। वे गूँगे हैं, सत्य नहीं बोलते हैं। (वे) सत्य को देखने से अंधे हैं। इसलिए वे अपनी पथभ्रष्टता से वापस नहीं लौटते।

أَوْ كَصَيِّبٍۢ مِّنَ ٱلسَّمَآءِ فِيهِ ظُلُمَـٰتٌۭ وَرَعْدٌۭ وَبَرْقٌۭ يَجْعَلُونَ أَصَـٰبِعَهُمْ فِىٓ ءَاذَانِهِم مِّنَ ٱلصَّوَٰعِقِ حَذَرَ ٱلْمَوْتِ ۚ وَٱللَّهُ مُحِيطٌۢ بِٱلْكَـٰفِرِينَ ﴿١٩﴾

जहाँ तक उनके पानी के उदाहरण का संबंध है: तो वे संचित अंधकार, गरज और बिजली (चमक) वाले बादलों से होने वाली बहुत अधिक बारिश के समान हैं, जो कु छ लोगों पर उतरती है, तो वे सख़्त घबराहट से ग्रस्त हो जाते हैं, और कड़कने वाले वज्र की तीव्रता के कारण मृत्यु के भय से अपनी उंगलियों से अपने कानों को बंद कर लेते हैं। हालाँकि अल्लाह काफ़िरों को घेरे हुए है, वे उसे विवश नहीं कर सकते।

يَكَادُ ٱلْبَرْقُ يَخْطَفُ أَبْصَـٰرَهُمْ ۖ كُلَّمَآ أَضَآءَ لَهُم مَّشَوْا۟ فِيهِ وَإِذَآ أَظْلَمَ عَلَيْهِمْ قَامُوا۟ ۚ وَلَوْ شَآءَ ٱللَّهُ لَذَهَبَ بِسَمْعِهِمْ وَأَبْصَـٰرِهِمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرٌۭ ﴿٢٠﴾

ى निकट है कि बिजली अपनी चमक और रोशनी की तीव्रता के कारण उनकी आँखों को उचक ले जाए। जब भी बिजली चमकती और उनके लिए रोशनी करती है, तो वे आगे बढ़ते हैं और जब वह रोशनी नहीं करती है, तो वे अंधेरे ही में बने रहते हैं, अपनी जगह से हिल नहीं सकते। हालाँकि यदि अल्लाह चाहता, तो उनके सत्य से मुँह मोड़ने के कारण अपनी सर्वसमावेशी शक्ति के द्वारा उनके कान और उनकी दृष्टियों को छीन लेता, फिर वे उनके पास वापस नहीं लौटतीं। यहाँ बारिश क़ुरआन का उदाहरण है, बिजली की कड़क क़ु रआन की चेतावनियों का उदाहरण है, बिजली की रोशनी कभी-कभी उनके सामने सत्य के स्पष्ट होने का उदाहरण है, तथा बिजली की कड़क की तीव्रता से कानों को बंद कर लेने को उनके सत्य से मुँह मोड़ने और उसे स्वीकार न करने का उदाहरण बनाया गया है। मुनाफ़िक़ों और दोनों उदाहरणों वाले लोगों के बीच सादृश्य का बिंदु: लाभ न उठाना है। चुनाँचे आग के उदाहरण में: आग जलाने वाले को अंधेरे और जलने के सिवा कोई लाभ न हुआ, और पानी के उदाहरण में: बारिश में घिरे हुए लोगों ने भयंकर गरज और चमक के अलावा कोई लाभ नहीं उठाया। यही हाल मुनाफ़िक़ों का है, उन्हें इस्लाम के अंदर सख़्ती एवं कठोरता के सिवा कु छ नज़र नहीं आता।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ ٱعْبُدُوا۟ رَبَّكُمُ ٱلَّذِى خَلَقَكُمْ وَٱلَّذِينَ مِن قَبْلِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ ﴿٢١﴾

ऐ लोगो! अकेले अपने पालनहार की इबादत करो, उसके अतिरिक्त किसी और की नहीं; क्योंकि वही है जिसने तुम्हें पैदा किया और उन समुदायों को पैदा किया जो तुमसे पहले थे। इसआशा में कि तुमउसके आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर, उसकी यातना से बचने का उपाय कर सको। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

ٱلَّذِى جَعَلَ لَكُمُ ٱلْأَرْضَ فِرَٰشًۭا وَٱلسَّمَآءَ بِنَآءًۭ وَأَنزَلَ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءًۭ فَأَخْرَجَ بِهِۦ مِنَ ٱلثَّمَرَٰتِ رِزْقًۭا لَّكُمْ ۖ فَلَا تَجْعَلُوا۟ لِلَّهِ أَندَادًۭا وَأَنتُمْ تَعْلَمُونَ ﴿٢٢﴾

تجعلوا لله أندادا وأنتم تعلمون वही है जिसने तुम्हारे लिए ज़मीन को समतल बिछौना बनाया तथा उसके ऊपर आकाश को एक दृढ़ संरचना बनाया। तथा वही बारिश उतारकर उपकार करने वाला है। चुनाँचे उसने उसके द्वारा धरती से विभिन्न प्रकार के फल उगाए, ताकि वह तुम्हारी जीविका बन सके। अतः अल्लाह के लिए किसी तरह के साझीदार और उदाहरण न बनाओ, जबकि तुमजानते हो कि अल्लाह सर्वशक्तिमान के सिवा कोई स्रष्टा नहीं है।

وَإِن كُنتُمْ فِى رَيْبٍۢ مِّمَّا نَزَّلْنَا عَلَىٰ عَبْدِنَا فَأْتُوا۟ بِسُورَةٍۢ مِّن مِّثْلِهِۦ وَٱدْعُوا۟ شُهَدَآءَكُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ ﴿٢٣﴾

صدقين ऐ लोगो! यदि तुम्हें हमारे बंदे मुह़म्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर उतारे गए क़ुरआन के बारे में किसी प्रकार का संदेह है, तो हम तुम्हें चुनौती देते हैं कि उस जैसी एक सूरत ही लाकर उसका विरोध करो, भले ही वह उसकी छोटी से छोटी सूरत के बराबर ही क्यों न हो। तथा अपने समर्थकों में से जिसे भी बुला सकते हो, बुला लो, यदि तुमअपने दावे में सच्चे हो।

فَإِن لَّمْ تَفْعَلُوا۟ وَلَن تَفْعَلُوا۟ فَٱتَّقُوا۟ ٱلنَّارَ ٱلَّتِى وَقُودُهَا ٱلنَّاسُ وَٱلْحِجَارَةُ ۖ أُعِدَّتْ لِلْكَـٰفِرِينَ ﴿٢٤﴾

अगर तुमने ऐसा नहीं किया - और तुम ऐसा कभी नहीं कर पाओगे - तो उस आग से बचो, जो यातना के हक़दार लोगों और उन सभी प्रकार के पत्थरों से भड़काई जाएगी, जिन्हें वे पूजा करते थे। इसआग को अल्लाह तआला ने काफ़िरों के लिए तैयार किया है।

وَبَشِّرِ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ أَنَّ لَهُمْ جَنَّـٰتٍۢ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ ۖ كُلَّمَا رُزِقُوا۟ مِنْهَا مِن ثَمَرَةٍۢ رِّزْقًۭا ۙ قَالُوا۟ هَـٰذَا ٱلَّذِى رُزِقْنَا مِن قَبْلُ ۖ وَأُتُوا۟ بِهِۦ مُتَشَـٰبِهًۭا ۖ وَلَهُمْ فِيهَآ أَزْوَٰجٌۭ مُّطَهَّرَةٌۭ ۖ وَهُمْ فِيهَا خَـٰلِدُونَ ﴿٢٥﴾

अगर पिछली धमकी काफ़िरों के लिए थी; तो - ऐ नबी - आप सत्कर्म करने वाले मोमिनों को ऐसे बाग़ों की शुभ सूचना दे दें, जिनके महलों और पेड़ों के नीचे नहरें बहती हैं। जब भी उन्हें उन बाग़ों के स्वादिष्ट फलों में से कोई फल दिया जाएगा, तो दुनिया के फलों से बिलकु ल मिलता-जुलता होने के कारण वे कहेंगे: ये तो बिलकु ल वैसे ही फल हैं, जो हमें पहले दिए गए थे। दरअसल उन्हें आकार तथा नाम में समरूप फल इसलिए दिए जाएँगे, ताकि जाने पहचाने फल होने के कारण, दिल उन्हें स्वीकार कर लें। लेकिन वे अपने स्वाद और ज़ायक़े में भिन्न होंगे। उनके लिए जन्नत में ऐसी पत्नियाँ होंगी, जो दुनिया के लोगों में कल्पना की जाने वाली हर उस चीज़ से पवित्र होंगी, जिससे मन भागता है और मानव स्वभाव घृणा करता है। वे दुनिया की बाधित होने वाली नेमतों के विपरीत, हमेशा बाक़ी रहने वाली नेमतों में होंगे, जो कभी ख़त्म नहीं होंगी।

۞ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَسْتَحْىِۦٓ أَن يَضْرِبَ مَثَلًۭا مَّا بَعُوضَةًۭ فَمَا فَوْقَهَا ۚ فَأَمَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ فَيَعْلَمُونَ أَنَّهُ ٱلْحَقُّ مِن رَّبِّهِمْ ۖ وَأَمَّا ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ فَيَقُولُونَ مَاذَآ أَرَادَ ٱللَّهُ بِهَـٰذَا مَثَلًۭا ۘ يُضِلُّ بِهِۦ كَثِيرًۭا وَيَهْدِى بِهِۦ كَثِيرًۭا ۚ وَمَا يُضِلُّ بِهِۦٓ إِلَّا ٱلْفَـٰسِقِينَ ﴿٢٦﴾

अल्लाह तआला किसी भी चीज़ के साथ उदाहरण देने से नहीं शरमाता है। चुनाँचे वह मच्छर तथा उससे भी छोटी या उससे भी बड़ी वस्तु के साथ उदाहरण देता है। जबकि इन उदाहरणों के प्रति लोगों के दो प्रकार हैं: मोमिन और काफ़िर। मोमिन लोग उनकी पुष्टि करते हैं और इसबात पर विश्वासरखते हैं कि उनके द्वारा उदाहरण देने के पीछे एक हिकमत है। परंतु काफ़िर लोग मज़ाक़ उड़ाते हुए एक-दूसरे से पूछते हैं कि अल्लाह ने मच्छर, मक्खी एवं मकड़ी जैसी इन तुच्छ प्राणियों के साथ उदाहरण क्यों दिया है? तो अल्लाह की तरफ से उसका उत्तर यह आता है: इन उदाहरणों में लोगों के लिए कई प्रकार के मार्गदर्शन, निर्देश और परीक्षण हैं। उनमें से कुछ को अल्लाह, उनके इन पर विचार करने से मुँह फे रने के कारण, गुमराह कर देता है। और ऐसे लोगों की संख्या बहुत है। तथा उनमें से कु छ का मार्गदर्शन करता है क्योंकि वे उनसे उपदेश ग्रहण करते हैं, और ये भी बहुत हैं। वह के वल उसी को गुमराह करता है, जो गुमराही का हक़दार हो। और वे उसकी आज्ञाकारिता से निकल जाने वाले लोग हैं,जैसे कि मुनाफ़िक़ लोग। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

ٱلَّذِينَ يَنقُضُونَ عَهْدَ ٱللَّهِ مِنۢ بَعْدِ مِيثَـٰقِهِۦ وَيَقْطَعُونَ مَآ أَمَرَ ٱللَّهُ بِهِۦٓ أَن يُوصَلَ وَيُفْسِدُونَ فِى ٱلْأَرْضِ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْخَـٰسِرُونَ ﴿٢٧﴾

जो लोग अल्लाह के उस वचन को तोड़ देते हैं, जो उसने उनसे लिया था कि वे के वल उसी की इबादत करेंगे तथा उसके उस रसूल का अनुसरण करेंगे, जिसके बारे में आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लमके पहले के रसूलों ने सूचना दी थी। तथा वे उन रिश्तों-नातों को काटते हैं, जिन्हें अल्लाह ने जोड़ने का आदेश दिया है और पापों के माध्यमसे पृथ्वी में भ्रष्टाचार फै लाने की कोशिश करते हैं, तो यही लोग दुनिया एवं आख़िरत में बहुत कम हिस्से वाले हैं।

كَيْفَ تَكْفُرُونَ بِٱللَّهِ وَكُنتُمْ أَمْوَٰتًۭا فَأَحْيَـٰكُمْ ۖ ثُمَّ يُمِيتُكُمْ ثُمَّ يُحْيِيكُمْ ثُمَّ إِلَيْهِ تُرْجَعُونَ ﴿٢٨﴾

ऐ काफ़िरो! तुम्हारा मामला बड़ा अद्भुत है! तुम अल्लाह का इनकार कै से करते हो, जबकि तुम उसके सामर्थ्य की निशानियाँ खुद अपने अंदर देखते हो; क्योंकि तुम कु छ भी नहीं थे, तो उसने तुम्हें बनाया और जीवन दिया, फिर वह तुम्हें दूसरी मौत देगा, फिर तुम्हें दूसरा जीवन प्रदान करेगा, फिर वह तुम्हें अपनी ओर लौटाएगा, ताकि जो कु छ तुमने किया है उसका तुमसे हिसाब ले।

هُوَ ٱلَّذِى خَلَقَ لَكُم مَّا فِى ٱلْأَرْضِ جَمِيعًۭا ثُمَّ ٱسْتَوَىٰٓ إِلَى ٱلسَّمَآءِ فَسَوَّىٰهُنَّ سَبْعَ سَمَـٰوَٰتٍۢ ۚ وَهُوَ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمٌۭ ﴿٢٩﴾

अकेला अल्लाह ही है, जिसने धरती पर जो कुछ भी है, जैसे- नदियाँ, पेड़ और अन्य चीज़ें जिनकी गिनती नहीं की जा सकती, तुम्हारे लिए पैदा किया, तथा तुम उससे लाभान्वित होते और उसका आनंद लेते हो जो उसने तुम्हारे अधीन किया है। फिर वह आसमान की रचना करने की ओर मुतवज्जेह हुआ और उन्हें ठीक-ठाक सात आसमान बना दिया। तथा उसके ज्ञान ने हर वस्तु को अपने घेरे में ले रखा है।

وَإِذْ قَالَ رَبُّكَ لِلْمَلَـٰٓئِكَةِ إِنِّى جَاعِلٌۭ فِى ٱلْأَرْضِ خَلِيفَةًۭ ۖ قَالُوٓا۟ أَتَجْعَلُ فِيهَا مَن يُفْسِدُ فِيهَا وَيَسْفِكُ ٱلدِّمَآءَ وَنَحْنُ نُسَبِّحُ بِحَمْدِكَ وَنُقَدِّسُ لَكَ ۖ قَالَ إِنِّىٓ أَعْلَمُ مَا لَا تَعْلَمُونَ ﴿٣٠﴾

अल्लाह तआला सूचना दे रहा है कि उसने फ़रिश्तों से कहा कि वह धरती पर मनुष्य को पैदा करेगा, जो अल्लाह की आज्ञाकारिता पर धरती को आबाद करने के लिए एक-दूसरे के उत्तराधिकारी होंगे। तो फ़रिश्तों ने अपने पालनहार से - मार्गदर्शन और पूछताछ के तौर पर - आदम के बेटों को पृथ्वी पर उत्तराधिकारी बनाने की हिकमत के बारे में पूछा, जबकि वे धरती में बिगाड़ पैदा करेंगे और अन्यायपूर्वक खून बहाएँगे, यह कहते हुए: हालाँकि हमतेरे आज्ञाकारी हैं, तेरी प्रशंसा करते हुए तथा तेरे प्रताप एवं पूर्णता का महिमामंडन करते हुए हम तेरी पवित्रता बयान करते हैं, हम इसमें कोई सुस्ती नहीं करते। तो अल्लाह तआला ने उनके प्रश्न का उत्तर दिया: मैं उन्हें पैदा करने की शानदार हिकमतों तथा उनके उत्तराधिकार के महान उद्देश्यों के बारे में जो जानता हूँ, तुम नहीं जानते।

وَعَلَّمَ ءَادَمَ ٱلْأَسْمَآءَ كُلَّهَا ثُمَّ عَرَضَهُمْ عَلَى ٱلْمَلَـٰٓئِكَةِ فَقَالَ أَنۢبِـُٔونِى بِأَسْمَآءِ هَـٰٓؤُلَآءِ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ ﴿٣١﴾

आदमअलैहिस्सलामके स्थान (रुतबा) को स्पष्ट करने के लिए, अल्लाह तआला ने उन्हें सभी सजीव एवं निर्जीव वस्तुओं आदि के नामअर्थात् उनके शब्द एवं अर्थ सिखा दिए। फिर उन वस्तुओं को फ़रिश्तों के सामने रखते हुए कहा: मुझे इनके नाम बताओ, यदि तुम अपने इस दावे में सच्चे हो कि तुम इस प्राणी से अधिक प्रतिष्ठित और उससे बेहतर हो!!

قَالُوا۟ سُبْحَـٰنَكَ لَا عِلْمَ لَنَآ إِلَّا مَا عَلَّمْتَنَآ ۖ إِنَّكَ أَنتَ ٱلْعَلِيمُ ٱلْحَكِيمُ ﴿٣٢﴾

उन्होंने - अपनी कमी को स्वीकार करते हुए, अल्लाह को श्रेय देते हुए - कहा: ऐ हमारे पालनहार! हम तेरे फ़ैसले और विधान के बारे में तुझपर आपत्ति करने से तुझे पवित्र ठहराते और तेरा महिमामंडन करते हैं। क्योंकि तूने हमें जो ज्ञान दिया है, उसके सिवा हमऔर कु छ नहीं जानते। निःसंदेह तू सर्वज्ञ है, जिससे कु छ भी छिपा नहीं है, तू पूर्ण हिकमत वाला है, अपनी नियति और अपने विधान में चीजों को उनके उचित स्थान पर रखता है। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

قَالَ يَـٰٓـَٔادَمُ أَنۢبِئْهُم بِأَسْمَآئِهِمْ ۖ فَلَمَّآ أَنۢبَأَهُم بِأَسْمَآئِهِمْ قَالَ أَلَمْ أَقُل لَّكُمْ إِنِّىٓ أَعْلَمُ غَيْبَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَأَعْلَمُ مَا تُبْدُونَ وَمَا كُنتُمْ تَكْتُمُونَ ﴿٣٣﴾

ما تبدون وما كنتمتكتمون तब अल्लाह तआला ने आदम अलैहिस्सलाम से कहा: उन्हें इन वस्तुओं के नाम बताओ। चुनाँचे जब आदम अलैहिस्सलाम ने उन्हें बता दिया जिस तरह उनके पालनहार ने उन्हें सिखाया था, तो अल्लाह तआला ने फ़रिश्तों से कहा: क्या मैंने तुमसे नहीं कहा था: निःसंदेह मैं आकाशों तथा धरती की छिपी हुई बातों को जानता हूँ, तथा मैं उसे भी जानता हूँ, जो तुम अपनी स्थितियों में से प्रकट करते हो और जो तुम अपने मन से बातें करते हो।

وَإِذْ قُلْنَا لِلْمَلَـٰٓئِكَةِ ٱسْجُدُوا۟ لِـَٔادَمَ فَسَجَدُوٓا۟ إِلَّآ إِبْلِيسَ أَبَىٰ وَٱسْتَكْبَرَ وَكَانَ مِنَ ٱلْكَـٰفِرِينَ ﴿٣٤﴾

अल्लाह तआला बयान कर रहा है कि उसने फ़रिश्तों को आदम को सम्मान स्वरूप सजदा करने का आदेश दिया, तो उन्होंने अल्लाह के आज्ञापालन में ज़रा भी देर नहीं की, फौरन सजदे में गिर गए। इबलीस को छोड़कर जो कि जिन्नों में से था। उसने अल्लाह के सजदे के आदेश पर आपत्ति जताते हुए और आदम पर बड़ा बनते हुए, सजदा करने से मना कर दिया। इसकारण वह अल्लाह के साथ कु फ़्र करने वालों में से हो गया।

وَقُلْنَا يَـٰٓـَٔادَمُ ٱسْكُنْ أَنتَ وَزَوْجُكَ ٱلْجَنَّةَ وَكُلَا مِنْهَا رَغَدًا حَيْثُ شِئْتُمَا وَلَا تَقْرَبَا هَـٰذِهِ ٱلشَّجَرَةَ فَتَكُونَا مِنَ ٱلظَّـٰلِمِينَ ﴿٣٥﴾

और हमने कहा: ऐ आदम! तुम और तुम्हारी पत्नी - ह़व्वा - जन्नत में रहो और उसमें से जन्नत के किसी भी भाग में एक सुखद और विस्तृत भोजन खाओ। तथा तुम दोनों इसرपेड़ के पास मत जाना, जिससे मैंने तुम्हेंو खाने से मना किया है। अन्यथा तुमदोनों मेरी अवज्ञा करने के कारण अत्याचारियों में से हो जाओगे।

فَأَزَلَّهُمَا ٱلشَّيْطَـٰنُ عَنْهَا فَأَخْرَجَهُمَا مِمَّا كَانَا فِيهِ ۖ وَقُلْنَا ٱهْبِطُوا۟ بَعْضُكُمْ لِبَعْضٍ عَدُوٌّۭ ۖ وَلَكُمْ فِى ٱلْأَرْضِ مُسْتَقَرٌّۭ وَمَتَـٰعٌ إِلَىٰ حِينٍۢ ﴿٣٦﴾

ومتع إلى حين चुनाँचे शैतान लगातार दोनों को बहकाता और उनके लिए सुशोभित करता रहा, यहाँ तक कि उन्हें उस पेड़ से खाने के पाप में डाल दिया, जिससे अल्लाह ने उन्हें मना किया था। इसके परिणामस्वरूप, अल्लाह ने उन्हें उस जन्नत से निकाल दिया जिसमें वे दोनों थे, तथा अल्लाह ने उन दोनो से और शैतान से कहा: धरती पर उतर आओ। तुम एक-दूसरे के शत्रु हो। और जब तक तुम्हारी नियत जीवन अवधि समाप्त नहीं हो जाती और क़ियामत क़ायम नहीं हो जाती, तब तक तुम्हें उस धरती पर रहना और उसमें मौजूद अच्छी चीजों से फायदा उठाना है।

فَتَلَقَّىٰٓ ءَادَمُ مِن رَّبِّهِۦ كَلِمَـٰتٍۢ فَتَابَ عَلَيْهِ ۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلتَّوَّابُ ٱلرَّحِيمُ ﴿٣٧﴾

फिर आदम अलैहिस्सलाम ने वे शब्द सीख लिए, जो अल्लाह ने उनके दिल में डाल दिए थे और उनके साथ उन्हें दुआ करने के लिए प्रेरित किया था। ये वही शब्द हैं, हमारे ऐ: कहा ने दोनों ''उन ﴿قاال ربنا ظلمنا أنفسنا وإن لم تغفر لنا وترحمنا لنكونن من الخاس رين﴾)الأعراف: (23: है में कथन इस के अल्लाह उल्लेख जिनका पालनहार! हमने अपनी जानों पर अत्याचार किया है। और यदि तूने हमें क्षमा न किया और हमपर दया न की, तो निश्चय हम अवश्य नुक़सान उठाने वालों में से हो जाएँगे।'' (सूरतुल आराफ़: 23) चुनाँचे अल्लाह ने उनकी तौबा क़बूल कर ली और उन्हें क्षमा कर दिया। क्योंकि वह महिमावान् अपने बंदों की तौबा बहुत ज़्यादा क़बूल करने वाला और उनपर दया करने वाला है।

قُلْنَا ٱهْبِطُوا۟ مِنْهَا جَمِيعًۭا ۖ فَإِمَّا يَأْتِيَنَّكُم مِّنِّى هُدًۭى فَمَن تَبِعَ هُدَاىَ فَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ ﴿٣٨﴾

हमने उनसे कहा: तुमसब जन्नत से धरती पर उतर जाओ। फिर यदि मेरे रसूलों के हाथों तुम्हारे पास कोई मार्गदर्शन आए, तो उसपर चलने वालों और मेरे रसूलों पर ईमान लाने वालों पर न तो आख़िरत में कोई डर है, और न ही वे दुनिया के छू टने पर दुखी होंगे।

وَٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ وَكَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَآ أُو۟لَـٰٓئِكَ أَصْحَـٰبُ ٱلنَّارِ ۖ هُمْ فِيهَا خَـٰلِدُونَ ﴿٣٩﴾

जहाँ तक उन लोगों की बात है जिन्होंने कु फ़्र किया और हमारी आयतों को झुठलाया, तो वही लोग आग (जहन्नम) वाले हैं, वे उससे कभी बाहर नहीं निकलेंगे। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

يَـٰبَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ ٱذْكُرُوا۟ نِعْمَتِىَ ٱلَّتِىٓ أَنْعَمْتُ عَلَيْكُمْ وَأَوْفُوا۟ بِعَهْدِىٓ أُوفِ بِعَهْدِكُمْ وَإِيَّـٰىَ فَٱرْهَبُونِ ﴿٤٠﴾

ऐ अल्लाह के नबी याक़ू ब के बेटो! तुम अपने ऊपर अल्लाह की लगातार नेमतों को याद करो और उनका शुक्रिया अदा करो और मुझपर तथा मेरे रसूलों पर ईमान लाने और मेरे निर्धारित किए हुए नियमों पर अमल करने के मेरे आदेश को पूरा करो। यदि तुम इसे पूरा करते हो, तो मैं दुनिया में सौभाग्यशाली जीवन तथा क़ियामत के दिन बेहतर बदले का तुमसे किया हुआ वादा पूरा करूँ गा। तथा के वल मुझ ही से डरो और मेरी प्रतिज्ञा को मत तोड़ो।

وَءَامِنُوا۟ بِمَآ أَنزَلْتُ مُصَدِّقًۭا لِّمَا مَعَكُمْ وَلَا تَكُونُوٓا۟ أَوَّلَ كَافِرٍۭ بِهِۦ ۖ وَلَا تَشْتَرُوا۟ بِـَٔايَـٰتِى ثَمَنًۭا قَلِيلًۭا وَإِيَّـٰىَ فَٱتَّقُونِ ﴿٤١﴾

तथा उस क़ु रआन पर ईमान लाओ, जिसे मैंने मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उतारा है, जो उसकी पुष्टि करने वाला है जो अल्लाह की तौह़ीद (एके श्वरवाद) तथा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की नुबुव्वत के विषय में तौरात में उसके विकृ त होने से पूर्व आया है। तथा सावधान रहना, कहीं ऐसा न हो कि तुम उसका इनकार करने वाले पहले दलबन जाओ। तथा मेरी उतारी हुई आयतों के बदले प्रतिष्ठा एवं पद के रूप में एक छोटी सी क़ीमत न लो, और मेरे क्रोध तथा मेरी यातना से डरो।

وَلَا تَلْبِسُوا۟ ٱلْحَقَّ بِٱلْبَـٰطِلِ وَتَكْتُمُوا۟ ٱلْحَقَّ وَأَنتُمْ تَعْلَمُونَ ﴿٤٢﴾

तथा उस सत्य को - जो मैंने अपने रसूलों पर उतारा है - उन झूठी बातों के साथ भ्रमित न करो जो तुमगढ़ते हो। तथा अपनी पुस्तकों में मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के विवरण के बारे में आए हुए सत्य को न छिपाओ, जबकि तुमउसे जानते हो और उसके बारे में निश्चित हो।

وَأَقِيمُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتُوا۟ ٱلزَّكَوٰةَ وَٱرْكَعُوا۟ مَعَ ٱلرَّٰكِعِينَ ﴿٤٣﴾

नमाज़ को उसके अरकान, वाजिबात और सुन्नतों के साथ सम्पूर्ण तरीक़े से अदा करो, और अपने उन धनों की ज़कात निकालो जो अल्लाह ने तुम्हारे हाथों में रखा है, तथा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लमकी उम्मत में से अल्लाह के समक्ष झुकने वालों के साथ अल्लाह के सामने झुक जाओ।

۞ أَتَأْمُرُونَ ٱلنَّاسَ بِٱلْبِرِّ وَتَنسَوْنَ أَنفُسَكُمْ وَأَنتُمْ تَتْلُونَ ٱلْكِتَـٰبَ ۚ أَفَلَا تَعْقِلُونَ ﴿٤٤﴾

कितनी बुरी बात है कि तुम दूसरों को तो ईमान और भलाई करने का आदेश दो, और अपने आपको भूलकर खुद उससे मुँह फे र लो, हालाँकि तुम तौरात पढ़ते हो, उसमें मौजूद अल्लाह के धर्म का पालन करने तथा उसके रसूलों पर विश्वासकरने के आदेश से अवगत हो। तो क्या तुमअपनी बुद्धियों से लाभ नहीं उठाते?!

وَٱسْتَعِينُوا۟ بِٱلصَّبْرِ وَٱلصَّلَوٰةِ ۚ وَإِنَّهَا لَكَبِيرَةٌ إِلَّا عَلَى ٱلْخَـٰشِعِينَ ﴿٤٥﴾

अपने सभी धार्मिक और सांसारिक मामलों में सब्र (धैर्य) के साथ मदद माँगो तथा नमाज़ के साथ जो तुम्हें अल्लाह के क़रीब लाती है और तुम्हें उससे जोड़ती है। अतः वह तुम्हारी मदद करता है और तुम्हारी रक्षा करता है और तुम्हारे नुक़सान को दूर कर देता है। और निश्चय नमाज़ क़ायम करना बहुत कठिन और भारी है, सिवाय उनके जो अपने पालनहार के प्रति समर्पित होने वाले हैं।

ٱلَّذِينَ يَظُنُّونَ أَنَّهُم مُّلَـٰقُوا۟ رَبِّهِمْ وَأَنَّهُمْ إِلَيْهِ رَٰجِعُونَ ﴿٤٦﴾

इसका कारण यह है कि वही लोग हैं जो इस बात पर विश्वास रखते हैं कि वे अपने रब के पास आने वाले और क़ियामत के दिन उससे मिलने वाले हैं। और यह कि वे उसी के पास लौटने वाले हैं, ताकि वह उन्हें उनके कर्मों का प्रतिफलदे।

يَـٰبَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ ٱذْكُرُوا۟ نِعْمَتِىَ ٱلَّتِىٓ أَنْعَمْتُ عَلَيْكُمْ وَأَنِّى فَضَّلْتُكُمْ عَلَى ٱلْعَـٰلَمِينَ ﴿٤٧﴾

ऐ अल्लाह के नबी याक़ू ब के बेटो! मेरी प्रदान की हुई धार्मिक एवं सांसारिक नेमतों को याद करो और याद रखो कि निःसंदेह मैंने ही तुम्हें तुम्हारे समय के लोगों पर नुबुव्वत एवं बादशाहत द्वारा प्रधानता प्रदान की। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

وَٱتَّقُوا۟ يَوْمًۭا لَّا تَجْزِى نَفْسٌ عَن نَّفْسٍۢ شَيْـًۭٔا وَلَا يُقْبَلُ مِنْهَا شَفَـٰعَةٌۭ وَلَا يُؤْخَذُ مِنْهَا عَدْلٌۭ وَلَا هُمْ يُنصَرُونَ ﴿٤٨﴾

तथा आदेशों का पालन करके और निषेधों को छोड़कर अपने और क़ियामत के दिन की यातना के बीच, बचाव का साधन अपनाओ। उस दिन कोई किसी के कु छ काम न आएगा, न उस दिन अल्लाह की अनुमति के बिना नुकसान को दूर करने या लाभ प्राप्त करने की किसी की सिफ़ारिश क़बूल की जाएगी, और न ही कोई छुड़ौती स्वीकार की जाएगी; चाहे ज़मीन के बराबर सोना ही क्यों न हो, और न उस दिन उनका कोई मददगार होगा। जब कोई सिफ़ारिशी, या छुड़ौती या मददगार काम नहीं आएगा, तो फिर भागने का स्थान कहाँ है?!

وَإِذْ نَجَّيْنَـٰكُم مِّنْ ءَالِ فِرْعَوْنَ يَسُومُونَكُمْ سُوٓءَ ٱلْعَذَابِ يُذَبِّحُونَ أَبْنَآءَكُمْ وَيَسْتَحْيُونَ نِسَآءَكُمْ ۚ وَفِى ذَٰلِكُم بَلَآءٌۭ مِّن رَّبِّكُمْ عَظِيمٌۭ ﴿٤٩﴾

ر بكم عظيم ऐ बनी इसराईल! उससमय को याद करो, जब हमने तुम्हें फ़िरऔन के लोगों से छु ड़ाया, जो तुम्हें नाना प्रकार की यातनाएँ देते थे; वे तुम्हारे बेटों को बुरी तरह ज़बह कर देते थे, ताकि तुम्हारा कोई अस्तित्व न रहे और तुम्हारी बेटियों को जीवित छोड़ देते थे, ताकि वे उनकी सेवा करने वाली स्त्रियां हो जाएँ। इससे उनका मक़सद तुम्हारा घोर अपमान करना था। तुम्हें फ़िरऔन और उसके अनुयायियों के अत्याचार से बचाना तुम्हारे पालनहार की ओर से एक बड़ी परीक्षा है; ताकि तुम उसका शुक्रिया अदा करो।

وَإِذْ فَرَقْنَا بِكُمُ ٱلْبَحْرَ فَأَنجَيْنَـٰكُمْ وَأَغْرَقْنَآ ءَالَ فِرْعَوْنَ وَأَنتُمْ تَنظُرُونَ ﴿٥٠﴾

और तुम अपने ऊपर हमारी नेमतों में से इसे भी याद करो कि हमने तुम्हारे लिए सागर को फाड़ दिया और उसे तुम्हारे चलने के लिए एक सूखा रास्ता बना दिया। चुनाँचे हमने तुम्हें बचा लिया, और तुम्हारे दुश्मन फ़िरऔन और उसके अनुयायियों को तुम्हारी आँखों के सामने डुबो दिया, जबकि तुमउन्हें देख रहे थे।

وَإِذْ وَٰعَدْنَا مُوسَىٰٓ أَرْبَعِينَ لَيْلَةًۭ ثُمَّ ٱتَّخَذْتُمُ ٱلْعِجْلَ مِنۢ بَعْدِهِۦ وَأَنتُمْ ظَـٰلِمُونَ ﴿٥١﴾

इन नेमतों में से यह भी याद रखो कि हमने मूसा अलैहिस्सलामसे चालीस रातों के लिए वादा किया, ताकि इसमें, प्रकाश और मार्गदर्शन के तौर पर, तौरात को उतारा जाए। फिर तुमने यह किया कि उसअवधि के दौरान बछड़े की पूजा करने लगे। और ऐसा करके तुमअत्याचार करने वाले थे। ثم عفونا عنكممن بعد ذلك لعلكم تشكرون

ثُمَّ عَفَوْنَا عَنكُم مِّنۢ بَعْدِ ذَٰلِكَ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ ﴿٥٢﴾

फिर तुम्हारे तौबा (क्षमा याचना) कर लेने के बाद, हमने तुम्हें क्षमा कर दिया, चुनाँचे हमने तुम्हारी पकड़ नहीं की, ताकि तुम अल्लाह की अच्छी इबादत और आज्ञापालन करके उसका शुक्रिया अदा करो।

وَإِذْ ءَاتَيْنَا مُوسَى ٱلْكِتَـٰبَ وَٱلْفُرْقَانَ لَعَلَّكُمْ تَهْتَدُونَ ﴿٥٣﴾

इन नेमतों में से इसे भी याद करो कि हमने मूसा अलैहिस्सलामको सत्य तथा असत्य के बीच अंतर करने वाली तथा हिदायत एवं गुमराही के बीच फ़र्क़ करने वाली पुस्तक तौरात प्रदान की, ताकि तुम उसके द्वारा सत्य का मार्ग पा सको।

وَإِذْ قَالَ مُوسَىٰ لِقَوْمِهِۦ يَـٰقَوْمِ إِنَّكُمْ ظَلَمْتُمْ أَنفُسَكُم بِٱتِّخَاذِكُمُ ٱلْعِجْلَ فَتُوبُوٓا۟ إِلَىٰ بَارِئِكُمْ فَٱقْتُلُوٓا۟ أَنفُسَكُمْ ذَٰلِكُمْ خَيْرٌۭ لَّكُمْ عِندَ بَارِئِكُمْ فَتَابَ عَلَيْكُمْ ۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلتَّوَّابُ ٱلرَّحِيمُ ﴿٥٤﴾

इन नेमतों में से यह भी याद रखो कि अल्लाह ने तुम्हें बछड़े की पूजा से तौबा करने का सामर्थ्य प्रदान किया। जब मूसा अलैहिस्सलाम ने तुमसे कहा: तुमने बछड़े को उसकी इबादत करने के लिए पूज्य बनाकर अपने आप पर अत्याचार किया है। अतः पश्चाताप करो और अपने पैदा करने वाले की ओर लौट जाओ। इस प्रकार कि तुम एक-दूसरे को क़त्लकरो। इस तरह से पश्चाताप करना, तुम्हारे लिए कु फ़्र में बने रहने से बेहतर है जो कि आग में अमरता की ओर ले जाता है। चुनाँचे अल्लाह की तौफ़ीक़ और मदद से तुमने ऐसा कर लिया, तो उसने तुम्हारी तौबा क़बूल कर ली। क्योंकि वह बहुत ज़्यादा तौबा क़बूल करने वाला, अपने बंदों पर दया करने वाला है। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

وَإِذْ قُلْتُمْ يَـٰمُوسَىٰ لَن نُّؤْمِنَ لَكَ حَتَّىٰ نَرَى ٱللَّهَ جَهْرَةًۭ فَأَخَذَتْكُمُ ٱلصَّـٰعِقَةُ وَأَنتُمْ تَنظُرُونَ ﴿٥٥﴾

तथा उस समय को याद करो, जब तुम्हारे पूर्वजों ने मूसा अलैहिस्सलाम को साहसपूर्वक संबोधित करते हुए कहा था: हम तुमपर उस समय तक ईमान नहीं ला सकते, जब तक हम अल्लाह को अपनी आँखों से इस तरह न देख लें कि हमारे बीच कोई आड़ न हो। इसपर जलाने वाली आग ने तुम्हें पकड़ लिया, और तुम्हें मार डाला, जबकि तुम एक-दूसरे को देख रहे थे। ثم بعثنكممن بعدموتكم لعلكم تشكرون

ثُمَّ بَعَثْنَـٰكُم مِّنۢ بَعْدِ مَوْتِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ ﴿٥٦﴾

फिर हमने तुम्हारे मरने के पश्चात तुम्हें पुनर्जीवित किया, ताकि तुम अल्लाह का अपने ऊपर इस उपकार पर शुक्रिया अदा करो।

وَظَلَّلْنَا عَلَيْكُمُ ٱلْغَمَامَ وَأَنزَلْنَا عَلَيْكُمُ ٱلْمَنَّ وَٱلسَّلْوَىٰ ۖ كُلُوا۟ مِن طَيِّبَـٰتِ مَا رَزَقْنَـٰكُمْ ۖ وَمَا ظَلَمُونَا وَلَـٰكِن كَانُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ ﴿٥٧﴾

أ نفسهم يظلمون तुमपर हमारी एक कृपा यह है कि जब तुम धरती में भटक रहे थे, तो हमने तुम्हें सूर्य की गर्मी से छाया देने के लिए बादलों को भेजा। इसी तरह हमने अपनी नेमतों में से तुमपर शहद की तरह एक मीठा पेय, तथा बटेर के सदृश अच्छे माँस वाला एक छोटा पक्षी उतारा, और हमने तुमसे कहा: उन अच्छी चीजों में से खाओ जो हमने तुम्हें प्रदान की हैं। उन्होंने इन नेमतों का इनकार और उनकी नाशुक्री करके हमारा कुछ नुक़सान नहीं किया, बल्कि उन्होंने अपने हिस्से का सवाब कम करके और अपने आपको दंड से दो चार करके ख़ुद पर अत्याचार किया।

وَإِذْ قُلْنَا ٱدْخُلُوا۟ هَـٰذِهِ ٱلْقَرْيَةَ فَكُلُوا۟ مِنْهَا حَيْثُ شِئْتُمْ رَغَدًۭا وَٱدْخُلُوا۟ ٱلْبَابَ سُجَّدًۭا وَقُولُوا۟ حِطَّةٌۭ نَّغْفِرْ لَكُمْ خَطَـٰيَـٰكُمْ ۚ وَسَنَزِيدُ ٱلْمُحْسِنِينَ ﴿٥٨﴾

अपने ऊपर अल्लाह की नेमतों में से उस समय को याद करो जब हमने तुमसे कहा: बैतुल-मक़्दिस में प्रवेश कर जाओ और उसमें मौजूद अच्छी चीज़ों में से जिस स्थान से भी चाहो आनंदमय, विशाल भोजन खाओ। तथा जब तुम प्रवेश करो, तो अल्लाह के आगे सिर झुकाए हुए हो और अल्लाह से यह दुआ करते रहो: ऐ हमारे पालनहार! हमारे गुनाहों को मिटा दे; हम तुम्हारी दुआ क़बूल कर लेंगे और हम उन लोगों के सवाब को बढ़ा देंगे, जिन्होंने अच्छे काम किए।

فَبَدَّلَ ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ قَوْلًا غَيْرَ ٱلَّذِى قِيلَ لَهُمْ فَأَنزَلْنَا عَلَى ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ رِجْزًۭا مِّنَ ٱلسَّمَآءِ بِمَا كَانُوا۟ يَفْسُقُونَ ﴿٥٩﴾

लेकिन उनमें से अत्याचारियों ने कार्यों को बदल दिया, और शब्दों को विकृत कर दिया। चुनाँचे वे अपने नितंबों पर घिसटते हुए दाख़िल हुए और अल्लाह के आदेश का मज़ाक़ उड़ाते हुए उन्होंने कहा: 'बाली में दाना'। जिसके परिणामस्वरूप अल्लाह ने उनमें से अत्याचार करने वालों पर, उनके शरीयत की सीमा से बाहर निकलने और आदेश का उल्लंघन करने के कारण आकाश से अज़ाब उतार दिया।

۞ وَإِذِ ٱسْتَسْقَىٰ مُوسَىٰ لِقَوْمِهِۦ فَقُلْنَا ٱضْرِب بِّعَصَاكَ ٱلْحَجَرَ ۖ فَٱنفَجَرَتْ مِنْهُ ٱثْنَتَا عَشْرَةَ عَيْنًۭا ۖ قَدْ عَلِمَ كُلُّ أُنَاسٍۢ مَّشْرَبَهُمْ ۖ كُلُوا۟ وَٱشْرَبُوا۟ مِن رِّزْقِ ٱللَّهِ وَلَا تَعْثَوْا۟ فِى ٱلْأَرْضِ مُفْسِدِينَ ﴿٦٠﴾

तथा अपने ऊपर अल्लाह की उस नेमत को भी याद करो जब तुम चटियल मैदान में भटक रहे थे और तुम बहुत प्यासे थे, तो मूसा अलैहिस्सलाम ने अपने रब से प्रार्थना की और उससे तुम्हारे लिए पानी माँगा। इसलिए हमने उन्हें अपनी लाठी पत्थर पर मारने का आदेश दिया। जब उन्होंने उसको मारा, तो उससे तुम्हारे गोत्रों की संख्या के अनुसार बारह सोते फूट पड़े और उनमें से पानी निकल आया। हमने हर गोत्र के लिए उसके पीने का विशिष्ट स्थान स्पष्ट कर दिया, ताकि उनके बीच कोई विवाद न हो, और हमने तुमसे कहा: अल्लाह की उस रोज़ी से खाओ और पियो, जो उसने तुम्हें बिना किसी परिश्रम या कार्य के प्रदान की है और धरती पर बिगाड़ फै लाते न फिरो। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

وَإِذْ قُلْتُمْ يَـٰمُوسَىٰ لَن نَّصْبِرَ عَلَىٰ طَعَامٍۢ وَٰحِدٍۢ فَٱدْعُ لَنَا رَبَّكَ يُخْرِجْ لَنَا مِمَّا تُنۢبِتُ ٱلْأَرْضُ مِنۢ بَقْلِهَا وَقِثَّآئِهَا وَفُومِهَا وَعَدَسِهَا وَبَصَلِهَا ۖ قَالَ أَتَسْتَبْدِلُونَ ٱلَّذِى هُوَ أَدْنَىٰ بِٱلَّذِى هُوَ خَيْرٌ ۚ ٱهْبِطُوا۟ مِصْرًۭا فَإِنَّ لَكُم مَّا سَأَلْتُمْ ۗ وَضُرِبَتْ عَلَيْهِمُ ٱلذِّلَّةُ وَٱلْمَسْكَنَةُ وَبَآءُو بِغَضَبٍۢ مِّنَ ٱللَّهِ ۗ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ كَانُوا۟ يَكْفُرُونَ بِـَٔايَـٰتِ ٱللَّهِ وَيَقْتُلُونَ ٱلنَّبِيِّـۧنَ بِغَيْرِ ٱلْحَقِّ ۗ ذَٰلِكَ بِمَا عَصَوا۟ وَّكَانُوا۟ يَعْتَدُونَ ﴿٦١﴾

उस समय को याद करो, जब तुमने अपने रब की नेमत की नाशुक्री की। चुनाँचे मन्न और सलवा के रूप में अल्लाह की उतारी हुई रोज़ी को खाने से ऊब गए और कहने लगे: हम एक ही प्रकार के खाने पर संतोष नहीं कर सकते, जो नहीं बदलता है। फिर तुमने मूसा अलैहिस्सलाम से मुतालबा किया कि वह अल्लाह से दुआ करें कि वह तुम्हारे लिए धरती की उपज में से, जैसे उसकी फलियों एवं साग-सब्ज़ियों, उसकी ककड़ी, अनाज, मसूर और प्याज़ में से कोई खाना निकाले। इसपर मूसा अलैहिस्सलाम ने (तुम्हारे अनुरोध की निंदा करते हुए: क्या तुम मन्न और सलवा जैसे बेहतरीन और अधिक उदार भोजन के बदले एक कमतर और तुच्छ चीज़ को अपनाते हो, जबकि वह तुम्हारे पास बिना परेशानी और थकान के आता था?) फरमाया: तुम यहाँ की धरती से निकलकर किसी भी बस्ती में जा उतरो। तुम्हें वहाँ के खेतों और बाज़ारों में वह सब मिल जाएगा, जो तुमने माँगा है। उनके अपनी इच्छाओं का पालन करने और अल्लाह ने उनके लिए जो चुना था, उससे बार-बार मुँह फेरने के कारण; उन्हें अपमान, दरिद्रता और विपत्ति ने घेर लिया। साथ ही वे अल्लाह की ओर से भारी प्रकोप के साथ लौटे; क्योंकि उन्होंने उसके दीन से मुँह फे रा, उसकी आयतों का इनकार किया और उसके नबियों की अन्यायपूर्ण और आक्रामक तरीक़े से हत्या की; यह सब इस कारण हुआ कि उन्होंने अल्लाह की अवज्ञा की और वे उसकी सीमाओं को पार कर रहे थे।

إِنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَٱلَّذِينَ هَادُوا۟ وَٱلنَّصَـٰرَىٰ وَٱلصَّـٰبِـِٔينَ مَنْ ءَامَنَ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ وَعَمِلَ صَـٰلِحًۭا فَلَهُمْ أَجْرُهُمْ عِندَ رَبِّهِمْ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ ﴿٦٢﴾

عندربهم ولاخوف عليهم ولا هم يحزنون इस उम्मत के जो लोग ईमान लाए, तथा इसी तरह मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के नबी बनने से पहले पिछले समुदायों, जैसे यहूदियों, ईसाइयों और साबियों - ये किसी नबी को मानने वालों का एक समूह था - में से जो ईमान लाए, इनमें से जो सही मायने में अल्लाह तथा अंतिम दिन पर ईमान लाए; तो उनका सवाब उनके रब के पास है। वे आख़िरत में जिस चीज़ का सामना करने वाले हैं उसके बारे में उन्हें कोई भय नहीं है, तथा दुनिया में से जो चीज़ उनसे छू ट गई है, उसके लिए उन्हें कोई मलाल नहीं होगा।

وَإِذْ أَخَذْنَا مِيثَـٰقَكُمْ وَرَفَعْنَا فَوْقَكُمُ ٱلطُّورَ خُذُوا۟ مَآ ءَاتَيْنَـٰكُم بِقُوَّةٍۢ وَٱذْكُرُوا۟ مَا فِيهِ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ ﴿٦٣﴾

अल्लाह तथा उसके रसूलों पर ईमान लाने के उस पक्के वचन को याद करो, जो हमने तुमसे लिया था, और हमने तुम्हें डराने के लिए तथा वचन पर अमल न करने से सावधान करते हुए पहाड़ को तुम्हारे ऊपर उठा लिया, तुम्हें यह आदेश देते हुए कि हमारी उतारी हुई पुस्तक तौरात को पूरी शक्ति के साथ, बिना किसी लापरवाही और आलस्य के थामलो, तथा जो कु छ उसमें है उसे याद कर लो और उसपर चिंतन-मनन करो। ताकि ऐसा करके , तुमअल्लाह के अज़ाब से बच जाओ।

ثُمَّ تَوَلَّيْتُم مِّنۢ بَعْدِ ذَٰلِكَ ۖ فَلَوْلَا فَضْلُ ٱللَّهِ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَتُهُۥ لَكُنتُم مِّنَ ٱلْخَـٰسِرِينَ ﴿٦٤﴾

लेकिन अपने ऊपर दृढ़ वचन लिए जाने के बाद भी तुमने मुँह फे रा और अवज्ञा की। ऐसे में अगर अल्लाह ने अपनी कृ पा से तुम्हें माफ़ न किया होता और अपनी दया से तुम्हारी तौबा क़बूल न करता, तो तुम इस विमुखता और अवज्ञा के कारण नुक़सान उठाने वालों में से होते।

وَلَقَدْ عَلِمْتُمُ ٱلَّذِينَ ٱعْتَدَوْا۟ مِنكُمْ فِى ٱلسَّبْتِ فَقُلْنَا لَهُمْ كُونُوا۟ قِرَدَةً خَـٰسِـِٔينَ ﴿٦٥﴾

तुमने अपने उन पूर्वजों का समाचार संदेह रहित स्पष्ट रूप से जान लिया है, जिन्होंने शनिवार के दिन शिकार करके ज़्यादती की, जिसमें उनके लिए शिकार करना मना था। इसलिए उन्होंने इसके लिए यह चाल चली कि शनिवार से पहले जाल लगा दिया और रविवार को उसे निकाल लिया। चुनाँचे अल्लाह ने इन चालबाज़ों को उनकी चालबाज़ी की सज़ा के रूप में बहिष्कृ त बंदर बना दिया। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर فجعلنها نكلا لما بين يديها وما خلفها وموعظةللمتقين

فَجَعَلْنَـٰهَا نَكَـٰلًۭا لِّمَا بَيْنَ يَدَيْهَا وَمَا خَلْفَهَا وَمَوْعِظَةًۭ لِّلْمُتَّقِينَ ﴿٦٦﴾

तो हमने इस आक्रामक बस्ती को इसके आस-पास की बस्तियों के लिए एक इबरत तथा इसके बाद आने वाले के लिए एक इबरत बना दिया। ताकि कोई उस जैसा अमल करके उसी तरह के अज़ाब का हक़दार न बने। तथा हमने उसे उन डरने वालों के लिए अनुस्मारक बना दिया, जो अल्लाह की सज़ा और उसकी सीमाओं का उल्लंघन करने वालों से उसके बदला लेने से डरते हैं।

وَإِذْ قَالَ مُوسَىٰ لِقَوْمِهِۦٓ إِنَّ ٱللَّهَ يَأْمُرُكُمْ أَن تَذْبَحُوا۟ بَقَرَةًۭ ۖ قَالُوٓا۟ أَتَتَّخِذُنَا هُزُوًۭا ۖ قَالَ أَعُوذُ بِٱللَّهِ أَنْ أَكُونَ مِنَ ٱلْجَـٰهِلِينَ ﴿٦٧﴾

तथा अपने पूर्वजों के समाचार में से उस संवाद को याद करो, जो उनके और मूसा अलैहिस्सलाम के बीच हुआ। जब मूसा अलैहिस्सलाम ने उन्हें सूचित किया कि अल्लाह ने उन्हें एक गाय ज़बह करने का आदेश दिया है। तो उन्होंने अल्लाह के आदेश का पालन करने में जल्दी करने के बजाय हठपूर्वक कहा: क्या तुमहमारा मज़ाक़ उड़ा रहे हो?! मूसा अलैहिस्सलामने कहा: मैं उन लोगों में शामिलहोने से अल्लाह की शरण लेता हूँ, जो अल्लाह पर झूठ बोलते हैं और लोगों का मज़ाक़ उड़ाते हैं।

قَالُوا۟ ٱدْعُ لَنَا رَبَّكَ يُبَيِّن لَّنَا مَا هِىَ ۚ قَالَ إِنَّهُۥ يَقُولُ إِنَّهَا بَقَرَةٌۭ لَّا فَارِضٌۭ وَلَا بِكْرٌ عَوَانٌۢ بَيْنَ ذَٰلِكَ ۖ فَٱفْعَلُوا۟ مَا تُؤْمَرُونَ ﴿٦٨﴾

تؤمرون उन्होंने मूसा अलैहिस्सलाम से कहा: अपने रब से प्रार्थना करो कि वह हमें उस गाय का विवरण समझाए जिसे उसने हमें ज़बह करने का आदेश दिया है। उन्होंने उनसे कहा: अल्लाह कहता है: वह एक ऐसी गाय है जो न तो बूढ़ी है और न ही बछड़ी, बल्कि वह दोनों के बीच मध्यमआयु की है। अत: अपने रब की आज्ञा का पालन करने में जल्दी करो।

قَالُوا۟ ٱدْعُ لَنَا رَبَّكَ يُبَيِّن لَّنَا مَا لَوْنُهَا ۚ قَالَ إِنَّهُۥ يَقُولُ إِنَّهَا بَقَرَةٌۭ صَفْرَآءُ فَاقِعٌۭ لَّوْنُهَا تَسُرُّ ٱلنَّـٰظِرِينَ ﴿٦٩﴾

उन्होंने अपने तर्क -वितर्क और हठ को जारी रखते हुए मूसा अलैहिस्सलाम से कहा: अपने पालनहार से प्रार्थना करो कि वह हमें समझाए कि उसका रंग क्या है। तो मूसा अलैहिस्सलाम ने उनसे कहा: अल्लाह कहता है: वह एक बहुत ही पीली गाय है, जो हर किसी को भा जाती है जो उसे देखता है।

قَالُوا۟ ٱدْعُ لَنَا رَبَّكَ يُبَيِّن لَّنَا مَا هِىَ إِنَّ ٱلْبَقَرَ تَشَـٰبَهَ عَلَيْنَا وَإِنَّآ إِن شَآءَ ٱللَّهُ لَمُهْتَدُونَ ﴿٧٠﴾

फिर वे अपने हठ में हद से बढ़ते हुए कहने लगे: अपने पालनहार से प्रार्थना करो कि वह हमारे लिए इसके गुणों को और अधिक स्पष्ट कर दे; क्योंकि उपर्युक्त विशेषताओं वाली गायें बहुत हैं, उनमें से हम उसकी पहचान नहीं कर सकते। उन्होंने इस बात की पुष्टि भी की कि - यदि अल्लाह ने चाहा - तो वे ज़बह के लिए अपेक्षित गाय तक पहुँच जाएँगे।

قَالَ إِنَّهُۥ يَقُولُ إِنَّهَا بَقَرَةٌۭ لَّا ذَلُولٌۭ تُثِيرُ ٱلْأَرْضَ وَلَا تَسْقِى ٱلْحَرْثَ مُسَلَّمَةٌۭ لَّا شِيَةَ فِيهَا ۚ قَالُوا۟ ٱلْـَٔـٰنَ جِئْتَ بِٱلْحَقِّ ۚ فَذَبَحُوهَا وَمَا كَادُوا۟ يَفْعَلُونَ ﴿٧١﴾

فذبحوها وما كادوايفعلون मूसा अलैहिस्सलामने उनसे कहा: अल्लाह तआला कहता है: वह गाय ऐसी है जो जुताई में कामकरने और भूमिको सींचने के लिए सधाई हुई नहीं है, और वह दोषों से मुक्त है, तथा उसमें उसके पीले रंग के अलावा किसी और रंग का निशान नहीं है। तब उन्होंने कहा: अब तू सटीक विवरण के साथ आया है जो पूरी तरह से उस गाय का निर्धारण करता है। और उन्होंने उस गाय को ज़बह किया, जबकि वे वाद-विवाद और हठ के कारण क़रीब थे कि उसे ज़बह न करें।

وَإِذْ قَتَلْتُمْ نَفْسًۭا فَٱدَّٰرَْٰٔتُمْ فِيهَا ۖ وَٱللَّهُ مُخْرِجٌۭ مَّا كُنتُمْ تَكْتُمُونَ ﴿٧٢﴾

तथा उस समय को याद करो, जब तुमने अपने ही में से एक व्यक्ति की हत्या कर दी, फिर आपस में लड़ने लगे। हर एक अपने आपको हत्या के आरोप से बचाने लगा और दूसरों पर आरोप धरने लगा, यहाँ तक कि तुमआपसमें झगड़ बैठे। जबकि अल्लाह उसनिर्दोष व्यक्ति की हत्या के मामले को प्रकाश में लाने वाला था, जिसे तुमे छिपा रहे थे। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

فَقُلْنَا ٱضْرِبُوهُ بِبَعْضِهَا ۚ كَذَٰلِكَ يُحْىِ ٱللَّهُ ٱلْمَوْتَىٰ وَيُرِيكُمْ ءَايَـٰتِهِۦ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ ﴿٧٣﴾

तो हमने तुमसे कहा: मरे हुए व्यक्ति के शरीर पर उस गाय के किसी भाग से मारो, जिसे तुम्हें ज़बह करने का आदेश दिया गया था। क्योंकि हत्यारा कौन है यह बताने के लिए अल्लाह उसे पुनर्जीवित करेगा! चुनाँचे उन्होंने वैसा ही किया और उसने अपने हत्यारे को बता दिया। और इस मरे हुए व्यक्ति को फिर से जीवित करने की तरह, अल्लाह क़ियामत के दिन मरे हुओं को पुनर्जीवित करेगा। अल्लाह तुम्हें अपनी शक्ति के स्पष्ट प्रमाण दिखाता है, ताकि तुम उन्हें समझो और अल्लाह पर सही मायने में विश्वास रखो।

ثُمَّ قَسَتْ قُلُوبُكُم مِّنۢ بَعْدِ ذَٰلِكَ فَهِىَ كَٱلْحِجَارَةِ أَوْ أَشَدُّ قَسْوَةًۭ ۚ وَإِنَّ مِنَ ٱلْحِجَارَةِ لَمَا يَتَفَجَّرُ مِنْهُ ٱلْأَنْهَـٰرُ ۚ وَإِنَّ مِنْهَا لَمَا يَشَّقَّقُ فَيَخْرُجُ مِنْهُ ٱلْمَآءُ ۚ وَإِنَّ مِنْهَا لَمَا يَهْبِطُ مِنْ خَشْيَةِ ٱللَّهِ ۗ وَمَا ٱللَّهُ بِغَـٰفِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ ﴿٧٤﴾

ه फिर इन दिल में उतरने वाले सदुपदेशों और स्पष्ट चमत्कारों के बाद भी तुम्हारे दिल कठोर हो गए। यहाँ तक कि वे पत्थर की तरह, बल्कि उससे भी ज़्यादा सख़्त हो गए; क्योंकि ये अपने हाल में ज़रा भी परिवर्तन स्वीकार करने को तैयार नहीं, जबकि पत्थर परिवर्तित होते और स्थिति बदलते रहते हैं। चुनाँचे कुछ पत्थरों से नहरें फूट निकलती हैं और कु छ पत्थर फट जाते हैं और उनसे पानी के सोते निकल आते हैं, जिनसे इनसान और चौपाए लाभान्वित होते हैं, जबकि कु छ पत्थर अल्लाह के भय से पहाड़ों की ऊँ चाइयों से गिर पड़ते हैं। परंतु तुम्हारे दिलों का हालऐसा नहीं है। तथा तुमजो कु छ कर रहे हो, अल्ल्लाह उससे से ग़ाफ़िलनहीं है। बल्कि वह उससे अवगत है और तुम्हें उसका बदला देगा।

۞ أَفَتَطْمَعُونَ أَن يُؤْمِنُوا۟ لَكُمْ وَقَدْ كَانَ فَرِيقٌۭ مِّنْهُمْ يَسْمَعُونَ كَلَـٰمَ ٱللَّهِ ثُمَّ يُحَرِّفُونَهُۥ مِنۢ بَعْدِ مَا عَقَلُوهُ وَهُمْ يَعْلَمُونَ ﴿٧٥﴾

يعلمون तो क्या - ऐ मोमिनो! - तुम यहूदियों की स्थिति की वास्तविकता और उनके हठ को जानने के बाद इस बात की आशा रखते हो कि वे ईमान ले आएँगे और तुम्हारी बात स्वीकार कर लेंगे?! जबकि उनके विद्वानों का एक समूह ऐसा रहा है, जो तौरात में उनपर उतरे हुए अल्लाह के वचनों को सुनते हैं; फिर वे उन्हें समझने और जानने के बाद उनके शब्दों और अर्थों को बदलदेते हैं, जबकि वे अपने अपराध की गंभीरता को जानते हैं।

وَإِذَا لَقُوا۟ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ قَالُوٓا۟ ءَامَنَّا وَإِذَا خَلَا بَعْضُهُمْ إِلَىٰ بَعْضٍۢ قَالُوٓا۟ أَتُحَدِّثُونَهُم بِمَا فَتَحَ ٱللَّهُ عَلَيْكُمْ لِيُحَآجُّوكُم بِهِۦ عِندَ رَبِّكُمْ ۚ أَفَلَا تَعْقِلُونَ ﴿٧٦﴾

यहूदियों के विरोधाभासों और छल में से यह (भी) है कि जब वे कुछ मोमिनों से मिलते हैं, तो उनके सामने पैग़ंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सत्यता और आपके संदेश की शुद्धता को स्वीकार करते हैं, जिसकी स्वयं तौरात भी गवाही देता है। लेकिन जब यहूदी एक-दूसरे के साथ अके ले होते हैं, तो वे इन स्वीकारोक्तियों के कारण एक-दूसरे को दोष देते हैं; क्योंकि मुसलमान उनकी पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लमकी सच्चाई की स्वीकृ ति को उनके खिलाफ सबूत बनाते हैं।

أَوَلَا يَعْلَمُونَ أَنَّ ٱللَّهَ يَعْلَمُ مَا يُسِرُّونَ وَمَا يُعْلِنُونَ ﴿٧٧﴾

ये यहूदी इस घृणित तरीक़े से व्यवहार कर रहे हैं, जैसे कि वे इस बात की अनदेखी कर रहे हैं कि अल्लाह उनके उन सभी कथनों और कार्यों को जानता है, जो वे छिपाते हैं और जो वे ज़ाहिर करते हैं, और शीघ्र ही वह उन्हें अपने बंदों के लिए प्रकट करके उन्हें अपमानित करेगा।

وَمِنْهُمْ أُمِّيُّونَ لَا يَعْلَمُونَ ٱلْكِتَـٰبَ إِلَّآ أَمَانِىَّ وَإِنْ هُمْ إِلَّا يَظُنُّونَ ﴿٧٨﴾

तथा यहूदियों में से कु छ लोग ऐसे हैं, जो तौरात का के वल पाठ करना जानते हैं और वे उसके आशय (मतलब) को नहीं समझते। तथा उनके पास झूठ के अलावा कु छ भी नहीं है, जो उन्होंने अपने बड़ों से ग्रहण किए हैं, वे समझते हैं कि यही वह तौरात है जिसे अल्लाह ने अवतरित किया है। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

فَوَيْلٌۭ لِّلَّذِينَ يَكْتُبُونَ ٱلْكِتَـٰبَ بِأَيْدِيهِمْ ثُمَّ يَقُولُونَ هَـٰذَا مِنْ عِندِ ٱللَّهِ لِيَشْتَرُوا۟ بِهِۦ ثَمَنًۭا قَلِيلًۭا ۖ فَوَيْلٌۭ لَّهُم مِّمَّا كَتَبَتْ أَيْدِيهِمْ وَوَيْلٌۭ لَّهُم مِّمَّا يَكْسِبُونَ ﴿٧٩﴾

أيديهم وويل لهم مما يكسبون अतः विनाश और घोर यातना इन लोगों की प्रतीक्षा कर रही है, जो अपने हाथों से किताब लिखते हैं, फिर - झूठ-मूठ - कहते हैं: यह अल्लाह की ओर से है; ताकि वे सत्य और मार्गदर्शन का पालन करने के बदले इस दुनिया में एक छोटी सी क़ीमत, जैसे कि धन और सरदारी प्राप्त कर सकें । अतः उनके लिए बड़ी तबाही और सख़्त अज़ाब है उसके कारण जो उनके हाथों ने लिखकर अल्लाह के खिलाफ झूठ बोला है, तथा उनके लिए तबाही और सख़्त अज़ाब है उसके कारण जो वे उससे धन और सरदारी कमाते हैं।

وَقَالُوا۟ لَن تَمَسَّنَا ٱلنَّارُ إِلَّآ أَيَّامًۭا مَّعْدُودَةًۭ ۚ قُلْ أَتَّخَذْتُمْ عِندَ ٱللَّهِ عَهْدًۭا فَلَن يُخْلِفَ ٱللَّهُ عَهْدَهُۥٓ ۖ أَمْ تَقُولُونَ عَلَى ٱللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ ﴿٨٠﴾

لا تعلمون तथा उन्होंने - झूठ-मूठ और धोखेबाज़ी से - कहा: हमें आग हरगिज़ नहीं छु एगी और हम कु छ दिनों के अलावा उसमें हरगिज़ प्रवेश नहीं करेंगे। ऐ नबी! आप इनसे कह दीजिए: क्या तुमने इसपर अल्लाह से पक्का वादा ले रखा है? अगर तुम्हारे पास ऐसा वादा है; तो निःसंदेह अल्लाह अपना वादा नहीं तोड़ता। या फिर तुम - झूठ का सहारा लेते हुए - अल्लाह के बारे में ऐसी बात कहते हो, जो तुम नहीं जानते?

بَلَىٰ مَن كَسَبَ سَيِّئَةًۭ وَأَحَـٰطَتْ بِهِۦ خَطِيٓـَٔتُهُۥ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ أَصْحَـٰبُ ٱلنَّارِ ۖ هُمْ فِيهَا خَـٰلِدُونَ ﴿٨١﴾

मामला वैसा नहीं है, जैसा ये समझ रहे हैं; अल्लाह हर उस व्यक्ति को यातना देगा, जिसने कु फ़्र की बुराई की और उसके गुनाहों ने उसे चारों ओर से घेर लिया। अल्लाह उन्हें जहन्नममें दाख़िलकरेगा, जिसमें वे हमेशा के लिए रहेंगे।

وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ أُو۟لَـٰٓئِكَ أَصْحَـٰبُ ٱلْجَنَّةِ ۖ هُمْ فِيهَا خَـٰلِدُونَ ﴿٨٢﴾

तथा जो लोग अल्लाह और उसके रसूलपर ईमान लाए और सत्कर्म किए, अल्लाह के निकट उनका बदला जन्नत में प्रवेश है, जिसमें वे हमेशा के लिए रहने वाले हैं।

وَإِذْ أَخَذْنَا مِيثَـٰقَ بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ لَا تَعْبُدُونَ إِلَّا ٱللَّهَ وَبِٱلْوَٰلِدَيْنِ إِحْسَانًۭا وَذِى ٱلْقُرْبَىٰ وَٱلْيَتَـٰمَىٰ وَٱلْمَسَـٰكِينِ وَقُولُوا۟ لِلنَّاسِ حُسْنًۭا وَأَقِيمُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتُوا۟ ٱلزَّكَوٰةَ ثُمَّ تَوَلَّيْتُمْ إِلَّا قَلِيلًۭا مِّنكُمْ وَأَنتُم مُّعْرِضُونَ ﴿٨٣﴾

और - ऐ बनी इसराईल! - उस दृढ़ वचन को याद करो, जो हमने तुमसे लिया था, कि तुम अल्लाह को एकमात्र पूज्य मानोगे और उसके साथ किसी की इबादत नहीं करोगे, और यह कि तुम माता-पिता, रिश्तेदारों, अनाथों और ज़रूरतमंद निर्धनों के साथ अच्छा व्यवहार करोगे। और यह कि तुम लोगों से अच्छी बात बोलो, बिना सख़्ती और कठोरता के भलाई का आदेश देते हुए एवं बुराई से रोकते हुए। और यह कि तुम पूरी तरह से नमाज़ अदा करो जैसा मैंने तुम्हें आदेश दिया है, और यह कि तुम ज़कात अदा करो उसे उसके हक़दारों को खुशी के साथ देकर। फिर, इस वचन के बाद, जो तुमसे लिया गया था, तुम उसे पूरा करने से मुँह मोड़ते हुए फिर गए, सिवाय उसके जिसे अल्लाह ने तुममें से बचा लिया, तो उसने अल्लाह के लिए उसके वचन और प्रतिज्ञा को पूरा किया।

وَإِذْ أَخَذْنَا مِيثَـٰقَكُمْ لَا تَسْفِكُونَ دِمَآءَكُمْ وَلَا تُخْرِجُونَ أَنفُسَكُم مِّن دِيَـٰرِكُمْ ثُمَّ أَقْرَرْتُمْ وَأَنتُمْ تَشْهَدُونَ ﴿٨٤﴾

तथा उस पक्के वचन को याद करो, जो हमने तौरात में तुमसे लिया था कि तुम आपस में एक-दूसरे का ख़ून नहीं बहाओगे और न एक-दूसरे को उनके घरों से निकालोगे। फिर तुमने उस वचन को मान लिया जो हमने तुमसे लिया था, और तुम स्वयं इसके सही होने की गवाही देते हो। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

ثُمَّ أَنتُمْ هَـٰٓؤُلَآءِ تَقْتُلُونَ أَنفُسَكُمْ وَتُخْرِجُونَ فَرِيقًۭا مِّنكُم مِّن دِيَـٰرِهِمْ تَظَـٰهَرُونَ عَلَيْهِم بِٱلْإِثْمِ وَٱلْعُدْوَٰنِ وَإِن يَأْتُوكُمْ أُسَـٰرَىٰ تُفَـٰدُوهُمْ وَهُوَ مُحَرَّمٌ عَلَيْكُمْ إِخْرَاجُهُمْ ۚ أَفَتُؤْمِنُونَ بِبَعْضِ ٱلْكِتَـٰبِ وَتَكْفُرُونَ بِبَعْضٍۢ ۚ فَمَا جَزَآءُ مَن يَفْعَلُ ذَٰلِكَ مِنكُمْ إِلَّا خِزْىٌۭ فِى ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا ۖ وَيَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ يُرَدُّونَ إِلَىٰٓ أَشَدِّ ٱلْعَذَابِ ۗ وَمَا ٱللَّهُ بِغَـٰفِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ ﴿٨٥﴾

ى फिर तुमही इस वचन का उल्लंघन करते हो; चुनाँचे तुमएक-दूसरे की हत्या करते हो और अपने ही में से कु छ लोगों को उनके विरुद्ध दुश्मनों की मदद लेकर नाहक़ और अन्यायपूर्वक उनके घरों से निकालते हो। और यदि वे शत्रुओं के हाथों बंदी बनकर तुम्हारे पास आते हैं, तो उन्हें क़ै द से छु ड़ाने के लिए छु ड़ौती देने हेतु दौड़-भाग करते हो, जबकि उन्हें उनके घरों से बाहर निकालना तुम्हारे लिए निषिद्ध है। फिर कै से तुमतौरात के कु छ आदेशों, जैसे बंदियों को फ़िदया देकर छु ड़ाने पर ईमान रखते हो और कु छ शिक्षाओं, जैसे खून का संरक्षण करने और एक-दूसरे को उनके घरों से न निकालने के आदेश का इनकार करते हो?! अतः तुम में से ऐसा करने वाले के लिए सांसारिक जीवन में अपमान के अलावा कोई बदला नहीं है, रही बात आख़िरत की तो वह सबसे कठोर यातना की ओर लौटाया जाएगा। और जो कु छ तुम करते हो, अल्लाह उससे असावधान नहीं, बल्कि वह उससे अवगत है और तुम्हें उसका बदला देगा।

أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ ٱشْتَرَوُا۟ ٱلْحَيَوٰةَ ٱلدُّنْيَا بِٱلْـَٔاخِرَةِ ۖ فَلَا يُخَفَّفُ عَنْهُمُ ٱلْعَذَابُ وَلَا هُمْ يُنصَرُونَ ﴿٨٦﴾

यही लोग हैं, जिन्होंने अमर पर नश्वर को वरीयता देते हुए सांसारिक जीवन को आख़िरत के बदले चुन लिया। इसलिए आख़िरत में उनकी यातना हल्की नहीं की जाएगी और उस दिन उनकी मदद करने के लिए उनके पासकोई सहायक नहीं होगा।

وَلَقَدْ ءَاتَيْنَا مُوسَى ٱلْكِتَـٰبَ وَقَفَّيْنَا مِنۢ بَعْدِهِۦ بِٱلرُّسُلِ ۖ وَءَاتَيْنَا عِيسَى ٱبْنَ مَرْيَمَ ٱلْبَيِّنَـٰتِ وَأَيَّدْنَـٰهُ بِرُوحِ ٱلْقُدُسِ ۗ أَفَكُلَّمَا جَآءَكُمْ رَسُولٌۢ بِمَا لَا تَهْوَىٰٓ أَنفُسُكُمُ ٱسْتَكْبَرْتُمْ فَفَرِيقًۭا كَذَّبْتُمْ وَفَرِيقًۭا تَقْتُلُونَ ﴿٨٧﴾

हमने मूसा को तौरात प्रदान किया तथा उनके बाद उनके पीछे ही बहुत से रसूल भेजे, और ईसा बिन मरयम को उनकी सच्चाई को दर्शाने वाली स्पष्ट निशानियाँ प्रदान कीं; जैसे मरे हुए लोगों को पुनर्जीवित करना, अंधे पैदा हुए लोगों को ठीक करना और कोढ़ी को चंगा करना। तथा हमने उन्हें जिबरील नामी फ़रिश्ते द्वारा शक्ति प्रदान की। फिर क्या जब भी - ऐ बनी इसराईल! - अल्लाह की ओर से कोई रसूल तुम्हारे पास वह चीज़ लेकर आया, जो तुम्हारी इच्छाओं के अनुकूल नहीं थी, तो तुमने सत्य को स्वीकार करने से अभिमान किया और अल्लाह के रसूलों पर बड़ा बनने लगे; चुनाँचे उनमें से एक समूह को तुमझुठलाते रहे और एक समूह की हत्या करते रहे?।

وَقَالُوا۟ قُلُوبُنَا غُلْفٌۢ ۚ بَل لَّعَنَهُمُ ٱللَّهُ بِكُفْرِهِمْ فَقَلِيلًۭا مَّا يُؤْمِنُونَ ﴿٨٨﴾

मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का अनुसरण न करने का यहूदियों का तर्क उनका यह कहना था: वास्तव में, हमारे दिलों पर पर्दे पड़े हुए हैं, आप जो कहते हैं, उसमें से कुछ भी उन तक नहीं पहुँचता और वे उसे नहीं समझते हैं। हालाँकि स्थिति वैसी नहीं है जैसा उन्होंने दावा किया है। बल्कि सच्चाई यह है कि उनके कुफ़्र के कारण अल्लाह ने उन्हें अपनी रहमत से दूर कर दिया। अतः वे अल्लाह की उतारी हुई बातों में से के वलबहुत कमही पर ईमान लाते हैं।

وَلَمَّا جَآءَهُمْ كِتَـٰبٌۭ مِّنْ عِندِ ٱللَّهِ مُصَدِّقٌۭ لِّمَا مَعَهُمْ وَكَانُوا۟ مِن قَبْلُ يَسْتَفْتِحُونَ عَلَى ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ فَلَمَّا جَآءَهُم مَّا عَرَفُوا۟ كَفَرُوا۟ بِهِۦ ۚ فَلَعْنَةُ ٱللَّهِ عَلَى ٱلْكَـٰفِرِينَ ﴿٨٩﴾

जब उनके पास अल्लाह की ओर से क़ुरआन आया, जो सही सामान्य सिद्धांतों में उसके अनुरूप है, जो कुछ तौरात तथा इन्जील में है। जबकि वे इसके उतरने से पहले कहा करते थे: हम बहुदेववादियों पर विजयी होंगे और हमें जीत प्राप्त होगी जब एक नबी भेजा जाएगा, जिसपर हम ईमान लाएँगे और उसका अनुसरण करेंगे। फिर जब क़ु रआन और मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उस विशेषता के साथ आ गए, जिसे उन्होंने पहचान लिया और उस सत्य के साथ, जिसे उन्होंने जान लिया; तो उन्होंने उसके साथ कु फ़्र किया। अतः अल्लाह और उसके रसूलके साथ कु फ़्र करने वालों पर अल्लाह की ला'नत है। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

بِئْسَمَا ٱشْتَرَوْا۟ بِهِۦٓ أَنفُسَهُمْ أَن يَكْفُرُوا۟ بِمَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ بَغْيًا أَن يُنَزِّلَ ٱللَّهُ مِن فَضْلِهِۦ عَلَىٰ مَن يَشَآءُ مِنْ عِبَادِهِۦ ۖ فَبَآءُو بِغَضَبٍ عَلَىٰ غَضَبٍۢ ۚ وَلِلْكَـٰفِرِينَ عَذَابٌۭ مُّهِينٌۭ ﴿٩٠﴾

ى बहुत बुरी है वह चीज़ जिसे उन्होंने अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान के बदले ले लिया; चुनाँचे उन्होंने अल्लाह की उतारी हुई शरीयत का इनकार कर दिया और उसके रसूलों को झुठलाया, के वल इस कारण अन्याय और ईर्ष्या करते हुए कि नुबुव्वत (पैगंबरी) और क़ु रआन को मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर अवतरित किया गया है। अतः मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का इनकार करने और इससे पहले तौरात में फेर-बदल करने के कारण, वे अल्लाह की ओर से दोहरे क्रोध के भागी बन गए। तथा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लमकी नुबुव्वत का इनकार करने वालों के लिए क़ियामत के दिन अपमानजनक यातना है।

وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ ءَامِنُوا۟ بِمَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ قَالُوا۟ نُؤْمِنُ بِمَآ أُنزِلَ عَلَيْنَا وَيَكْفُرُونَ بِمَا وَرَآءَهُۥ وَهُوَ ٱلْحَقُّ مُصَدِّقًۭا لِّمَا مَعَهُمْ ۗ قُلْ فَلِمَ تَقْتُلُونَ أَنۢبِيَآءَ ٱللَّهِ مِن قَبْلُ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ ﴿٩١﴾

जब इन यहूदियों से कहा जाता है: उस सत्य और हिदायत पर ईमान ले आओ, जो अल्लाह ने अपने रसूल पर उतारी है। तो वे कहते हैं: हम उसपर ईमान रखते हैं, जो हमारे नबियों पर उतारा गया है। तथा वे उसका इनकार करते हैं जो मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उतारा गया है। हालाँकि यह क़ु रआन ही सत्य है, जो उसके अनुरूप है जो अल्लाह की ओर से उनके पास है। और यदि वे वास्तव में उस पर ईमान रखते होते, जो उन पर उतारा गया है, तो वे क़ु रआन पर अवश्य ईमान लाते। (ऐ नबी!) आप उनके जवाब में कह दें: तुम इससे पहले नबियों की हत्या क्यों किया करते थे, यदि तुम उस सत्य पर सही मायने में ईमान रखने वाले थे, जो वे तुम्हारे पास लेकर आए थे?!

۞ وَلَقَدْ جَآءَكُم مُّوسَىٰ بِٱلْبَيِّنَـٰتِ ثُمَّ ٱتَّخَذْتُمُ ٱلْعِجْلَ مِنۢ بَعْدِهِۦ وَأَنتُمْ ظَـٰلِمُونَ ﴿٩٢﴾

निश्चय तुम्हारे रसूल मूसा अलैहिस्सलाम तुम्हारे पास अपने सच्चे नबी होने की पुष्टि करने वाली स्पष्ट निशानियाँ लेकर आए। फिर उसके बाद, जब मूसा अलैहिस्सलाम अपने रब से मिलने चले गए, तो तुम बछड़े को पूज्य बनाकर उसकी पूजा करने लगे। और तुम अल्लाह के साथ साझी ठहराने के कारण अत्याचार करने वाले थे। हालाँकि वही अके ला इबादत के योग्य है, कोई और नहीं।

وَإِذْ أَخَذْنَا مِيثَـٰقَكُمْ وَرَفَعْنَا فَوْقَكُمُ ٱلطُّورَ خُذُوا۟ مَآ ءَاتَيْنَـٰكُم بِقُوَّةٍۢ وَٱسْمَعُوا۟ ۖ قَالُوا۟ سَمِعْنَا وَعَصَيْنَا وَأُشْرِبُوا۟ فِى قُلُوبِهِمُ ٱلْعِجْلَ بِكُفْرِهِمْ ۚ قُلْ بِئْسَمَا يَأْمُرُكُم بِهِۦٓ إِيمَـٰنُكُمْ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ ﴿٩٣﴾

तथा उस समय को याद करो, जब हमने तुमसे मूसा अलैहिस्सलाम का अनुसरण करने और जो कुछ वह अल्लाह के पास से लाए हैं उसे क़बूल करने का पक्का वचन लिया। हमने तुम्हें डराने के लिए तुम्हारे ऊपर पहाड़ उठा लिया, और हमने तुमसे कहा: हमने तुम्हें जो तौरात दिया है उसे पूरी ताक़त से पकड़ लो, तथा स्वीकार करने और पालन करने के उद्देश्य से सुनो; अन्यथा हमतुम्हारे ऊपर पहाड़ को गिरा देंगे। तो तुमने कहा: हमने अपने कानों से सुना और हमने अपने कार्यों से अवज्ञा की। और उनके कुफ़्र के कारण उनके दिलों में बछड़े की पूजा घर कर चुकी थी। ऐ नबी! आप कह दीजिए: बहुत बुरा है वह काम (अल्लाह के साथ कुफ़्र), जिसका आदेश तुम्हें यह ईमान दे रहा है, यदि तुमईमान वाले हो; क्योंकि सच्चे ईमान के साथ कु फ़्र इकट्ठा नहीं हो सकता।

قُلْ إِن كَانَتْ لَكُمُ ٱلدَّارُ ٱلْـَٔاخِرَةُ عِندَ ٱللَّهِ خَالِصَةًۭ مِّن دُونِ ٱلنَّاسِ فَتَمَنَّوُا۟ ٱلْمَوْتَ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ ﴿٩٤﴾

(ऐ नबी!) आप कह दीजिए: यदि आख़िरत में जन्नत (ऐ यहूदियो!) के वल तुम्हारे ही लिए है और तुम्हारे सिवा और कोई उसमें प्रवेश नहीं करेगा; तो तुम मरने की कामना करो; ताकि तुम इस स्थान को जल्दी से प्राप्त कर लो और सांसारिक जीवन के बोझ और उसकी चिंताओं से आराम पा जाओ, यदि तुम अपने इस दावे में सच्चे हो।

وَلَن يَتَمَنَّوْهُ أَبَدًۢا بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيهِمْ ۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌۢ بِٱلظَّـٰلِمِينَ ﴿٩٥﴾

वे हरगिज़ मौत की कामना कभी नहीं करेंगे; क्योंकि उन्होंने अपने जीवन में अल्लाह के साथ कु फ़्र, उसके रसूलों को झुठलाने और उसकी किताबों को विकृ त करने जैसे पाप करके आगे भेजे हैं। तथा अल्लाह उनमें से और उनके अलावा में से ज़ालिमों को ख़ूब जानने वाला है और वह प्रत्येक को उसके कार्य का बदला देगा। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

وَلَتَجِدَنَّهُمْ أَحْرَصَ ٱلنَّاسِ عَلَىٰ حَيَوٰةٍۢ وَمِنَ ٱلَّذِينَ أَشْرَكُوا۟ ۚ يَوَدُّ أَحَدُهُمْ لَوْ يُعَمَّرُ أَلْفَ سَنَةٍۢ وَمَا هُوَ بِمُزَحْزِحِهِۦ مِنَ ٱلْعَذَابِ أَن يُعَمَّرَ ۗ وَٱللَّهُ بَصِيرٌۢ بِمَا يَعْمَلُونَ ﴿٩٦﴾

निश्चय (ऐ नबी!) आप यहूदियों को लोगों में सबसे अधिक जीवन के लिए उत्सुक पाएँगे, चाहे वह कितना भी तुच्छ और अपमानजनक क्यों न हो। बल्कि, वे उन बहुदेववादियों से भी अधिक उत्सुक हैं जो पुनर्जीवन और हिसाब पर ईमान नहीं रखते हैं। वे अह्ले किताब होने तथा दोबारा ज़िंदा होने और हिसाब पर ईमान रखने के बावजूद; उन में से हर व्यक्ति चाहता है कि उसे हज़ार साल की आयु मिले। हालाँकि उसकी लंबी आयु उसे अल्लाह के अज़ाब से बचा नहीं सकती, चाहे वह कितनी भी दीर्घ हो। तथा अल्लाह उनके कर्मों से अवगत और उन्हें देखने वाला है। उससे कोई चीज़ छिपी नहीं है और वह उन्हें उनका बदलाوप्रदान करेगा।

قُلْ مَن كَانَ عَدُوًّۭا لِّجِبْرِيلَ فَإِنَّهُۥ نَزَّلَهُۥ عَلَىٰ قَلْبِكَ بِإِذْنِ ٱللَّهِ مُصَدِّقًۭا لِّمَا بَيْنَ يَدَيْهِ وَهُدًۭى وَبُشْرَىٰ لِلْمُؤْمِنِينَ ﴿٩٧﴾

(ऐ नबी!) आप उन यहूदियों से कह दीजिए, जिन्होंने कहा: "जिब्रीलफ़रिश्तों में से हमारा दुश्मन है।": जो जिब्रीलसे दुश्मनी रखता हो, तो (वह सुन ले कि) वही अल्लाह के आदेश से आपके दिल पर क़ु रआन लेकर उतरे हैं, जो पिछली आसमानी किताबों; जैसे तौरात तथा इन्जील की पुष्टि करता है, भलाई का मार्ग दिखाता है और ईमान वालों को उन नेमतों की शुभ सूचना देता है, जो अल्लाह ने उनके लिए तैयार कर रखी हैं। अतः जो कोई भी उससे दुश्मनी रखने वाला है, जिसकी यह विशेषता और यह कार्य है, तो वह पथभ्रष्टों में से है। و و

مَن كَانَ عَدُوًّۭا لِّلَّهِ وَمَلَـٰٓئِكَتِهِۦ وَرُسُلِهِۦ وَجِبْرِيلَ وَمِيكَىٰلَ فَإِنَّ ٱللَّهَ عَدُوٌّۭ لِّلْكَـٰفِرِينَ ﴿٩٨﴾

जो कोई अल्लाह और उसके फ़रिश्तों और उसके रसूलों से दुश्मनी रखता हो तथा उसके दो निकटवर्ती फ़रिश्तों: जिबरील और मीकाईल से बैर रखता हो, तो निःसंदेह अल्लाह तुममें से और तुम्हारे अलावा में से सभी काफ़िरों का दुश्मन है। और जिसका दुश्मन अल्लाह हो, तो निश्चय वह स्पष्ट घाटे के साथ लौटा।

وَلَقَدْ أَنزَلْنَآ إِلَيْكَ ءَايَـٰتٍۭ بَيِّنَـٰتٍۢ ۖ وَمَا يَكْفُرُ بِهَآ إِلَّا ٱلْفَـٰسِقُونَ ﴿٩٩﴾

हमने (ऐ नबी!) आपकी तरफ़ आप जो कु छ नुबुव्वत और वह़्य लेकर आए हैं, उसमें आपकी सत्यता की स्पष्ट निशानियाँ उतारी हैं। और उनकी स्पष्टता और स्पष्टीकरण के बावजूद, उनका इनकार वही लोग करते हैं, जो अल्लाह के दीन से निकलने वाले हों।

أَوَكُلَّمَا عَـٰهَدُوا۟ عَهْدًۭا نَّبَذَهُۥ فَرِيقٌۭ مِّنْهُم ۚ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ ﴿١٠٠﴾

यहूदियों की बुरी स्थिति में से एक यह है कि जब भी उन्होंने अपने आपसे कोई वचन लिया - जिसमें तौरात में मौजूद मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की नुबुव्वत पर ईमान लाना भी शामिल है - तो उनके एक गिरोह ने उसे तोड़ दिया। बल्कि तथ्य यह है कि इन यहूदियों में से अधिकांश लोग उसपर सही मायने में ईमान नहीं रखते, जो अल्लाह ने अवतरित किया है; क्योंकि ईमान वचन को पूरा करने की प्रेरणा देता है।

وَلَمَّا جَآءَهُمْ رَسُولٌۭ مِّنْ عِندِ ٱللَّهِ مُصَدِّقٌۭ لِّمَا مَعَهُمْ نَبَذَ فَرِيقٌۭ مِّنَ ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْكِتَـٰبَ كِتَـٰبَ ٱللَّهِ وَرَآءَ ظُهُورِهِمْ كَأَنَّهُمْ لَا يَعْلَمُونَ ﴿١٠١﴾

ظهورهم كأنهم لا يعلمون जब मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह की ओर से रसूल बनकर उनके पास आए, और आप उसके बिल्कु ल अनुकू ल थे, जो तौरात में आपकी विशेषता वर्णित है, तो उनके एक समूह ने तौरात से प्रमाणित होने वाली बात से मुँह मोड़ लिया और उसकी परवाह न करते हुए उसे अपनी पीठ के पीछे फें क दिया। बिल्कु ल उस अज्ञानी व्यक्ति की स्थिति के समान, जो उसमें मौजूद सत्य और मार्गदर्शन से लाभ नहीं उठाता, इसलिए उसकी परवाह नहीं करता है। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

وَٱتَّبَعُوا۟ مَا تَتْلُوا۟ ٱلشَّيَـٰطِينُ عَلَىٰ مُلْكِ سُلَيْمَـٰنَ ۖ وَمَا كَفَرَ سُلَيْمَـٰنُ وَلَـٰكِنَّ ٱلشَّيَـٰطِينَ كَفَرُوا۟ يُعَلِّمُونَ ٱلنَّاسَ ٱلسِّحْرَ وَمَآ أُنزِلَ عَلَى ٱلْمَلَكَيْنِ بِبَابِلَ هَـٰرُوتَ وَمَـٰرُوتَ ۚ وَمَا يُعَلِّمَانِ مِنْ أَحَدٍ حَتَّىٰ يَقُولَآ إِنَّمَا نَحْنُ فِتْنَةٌۭ فَلَا تَكْفُرْ ۖ فَيَتَعَلَّمُونَ مِنْهُمَا مَا يُفَرِّقُونَ بِهِۦ بَيْنَ ٱلْمَرْءِ وَزَوْجِهِۦ ۚ وَمَا هُم بِضَآرِّينَ بِهِۦ مِنْ أَحَدٍ إِلَّا بِإِذْنِ ٱللَّهِ ۚ وَيَتَعَلَّمُونَ مَا يَضُرُّهُمْ وَلَا يَنفَعُهُمْ ۚ وَلَقَدْ عَلِمُوا۟ لَمَنِ ٱشْتَرَىٰهُ مَا لَهُۥ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ مِنْ خَلَـٰقٍۢ ۚ وَلَبِئْسَ مَا شَرَوْا۟ بِهِۦٓ أَنفُسَهُمْ ۚ لَوْ كَانُوا۟ يَعْلَمُونَ ﴿١٠٢﴾

ى जब उन्होंने अल्लाह के धर्म को छोड़ दिया, तो वे उसके स्थान पर उस चीज़ का अनुसरण करने लगे, जो शैतानों ने अल्लाह के पैग़ंबर सुलैमान अलैहिस्सलाम के राज्य के बारे में झूठ फै ला रखा था। क्योंकि उन्होंने दावा किया था कि आप अलैहिस्सलाम ने अपना राज्य जादू द्वारा स्थापित किया था। हालाँकि सुलैमान अलैहिस्सलाम ने जादू का अभ्यास करके कु फ़्र नहीं किया - जैसा कि यहूदियों ने दावा किया - लेकिन शैतानों ने कु फ़्र किया कि वे लोगों को जादू सिखाते थे। तथा वे लोगों को वह जादू सिखाते थे, जो इराक़ के शहर बाबिल में दो फ़रिश्तों: हारूत तथा मारूत पर लोगों की परीक्षा तथा आज़माइश के लिए उतारा गया था। तथा ये दोनों फ़रिश्ते किसी को तब तक जादू नहीं सिखाते जब तक कि वे उसे चेतावनी न दे दें और यह कहकर उसके लिए मामला स्पष्ट न कर दें: हमलोगों के लिए के वलएक परीक्षा और आज़माइश हैं, अतः तुम जादू सीखकर कु फ़्र न करो। अतः जो उन दोनों की सलाह को स्वीकार नहीं करता, उनसे जादू सीखता। उस जादू का एक प्रकार ऐसा भी था, जो आदमी और उसकी पत्नी के बीच नफरत पैदा करके उनके बीच जुदाई डाल देता था। हालाँकि वे जादूगर अल्लाह की अनुमति और उसकी इच्छा के बिना किसी को नुक़सान नहीं पहुँचा सकते थे। और वे ऐसी चीज़ सीखते थे, जो उन्हें हानि पहुँचाती थी और उन्हें लाभ नहीं देती थी। तथा निश्चय वे यहूदी जानते थे कि जिसने जादू को अल्लाह की पुस्तक से बदल लिया, उसके लिए आखिरत में कोई भाग और हिस्सा नहीं है। निश्चय बहुत बुरी है वह चीज़ है, जिसके बदले उन्होंने अपने आपको बेचा डाला; क्योंकि उन्होंने अल्लाह की वह़्य और उसकी शरीयत के बदले जादू को अपना लिया। यदि उन्हें पता होता कि किस वस्तु से उन्हें लाभ होगा, तो वे इस घिनौने कृ त्यऔर स्पष्ट गुमराही में न पड़ते।

وَلَوْ أَنَّهُمْ ءَامَنُوا۟ وَٱتَّقَوْا۟ لَمَثُوبَةٌۭ مِّنْ عِندِ ٱللَّهِ خَيْرٌۭ ۖ لَّوْ كَانُوا۟ يَعْلَمُونَ ﴿١٠٣﴾

यदि यहूदी सचमुच अल्लाह पर ईमान लाते, तथा उसकी आज्ञाकारिता करके और उसकी अवज्ञा को त्यागकर उससे डरते; तो अल्लाह का सवाब उनके लिए उससे बेहतर होता, जिसपर वे हैं, यदि वे अपने हित से अवगत होते।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تَقُولُوا۟ رَٰعِنَا وَقُولُوا۟ ٱنظُرْنَا وَٱسْمَعُوا۟ ۗ وَلِلْكَـٰفِرِينَ عَذَابٌ أَلِيمٌۭ ﴿١٠٤﴾

अल्लाह तआला मोमिनों को शब्दों के सही चुनाव के लिए निर्देशित करते हुए कहता है: ऐ ईमान वालो! तुम {रा-इना} (अर्थात् हमारा ध्यान रखिए) शब्द का प्रयोग न करो; क्योंकि यहूदी इसे विकृत कर देते हैं और इसके साथ नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को संबोधित करते हैं, जिससे वे एक ग़लत अर्थ 'रुऊनत' (तुच्छता) मुराद लेते हैं। इसलिए अल्लाह ने इस दरवाज़े को बंद करने के लिए इस शब्द के इस्तेमाल से मना कर दिया और अपने बंदों को आदेश दिया कि उसके स्थान पर {उन्ज़ुरना} कहें; अर्थात् हमारी प्रतीक्षा करें, ताकि हम आपकी बात समझ जाएँ। क्योंकि इस शब्द से बिना किसी ख़राबी के अर्थ पूरा हो जाता है। तथा अल्लाह का इनकार करने वालों के लिए कष्टदायी यातना है।

مَّا يَوَدُّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ مِنْ أَهْلِ ٱلْكِتَـٰبِ وَلَا ٱلْمُشْرِكِينَ أَن يُنَزَّلَ عَلَيْكُم مِّنْ خَيْرٍۢ مِّن رَّبِّكُمْ ۗ وَٱللَّهُ يَخْتَصُّ بِرَحْمَتِهِۦ مَن يَشَآءُ ۚ وَٱللَّهُ ذُو ٱلْفَضْلِ ٱلْعَظِيمِ ﴿١٠٥﴾

काफ़िर - चाहे अह्ले किताब हों या मुश्रिक - यह पसंद नहीं करते हैं कि तुमपर तुम्हारे पालनहार की ओर से कोई भी भलाई उतरे, चाहे वह थोड़ी हो या बहुत। तथा अल्लाह अपने बंदों में से जिसे चाहता है, अपनी दया, जैसे नुबुव्वत, वह़्य और ईमान के साथ खास कर लेता है। और अल्लाह बहुत बड़े अनुग्रह वाला है। अतः किसी भी प्राणी को, जो भी भलाई पहुँचती है, वह उसी की ओर से होती है तथा उसके अनुग्रह में से रसूल का भेजना और किताब उतारना भी है।

۞ مَا نَنسَخْ مِنْ ءَايَةٍ أَوْ نُنسِهَا نَأْتِ بِخَيْرٍۢ مِّنْهَآ أَوْ مِثْلِهَآ ۗ أَلَمْ تَعْلَمْ أَنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرٌ ﴿١٠٦﴾

अल्लाह तआला बयान कर रहा है कि जब वह क़ु रआन की किसी आयत के ह़ुक्म को उठा देता (समाप्त कर देता) है, या उसके शब्द को ख़त्म कर देता है और लोग उसे بلغ क़ुरआन · तफ़सीर भूल जाते हैं, तो अल्लाह उसके स्थान पर ऐसी आयत ले आता है, जो तत्काल और भविष्य में उससे अधिक फायदेमंद होती है, अथवा उसके समान होती है, और यह सब कुछ अल्लाह के ज्ञान और उसकी ह़िकमत के मुताबिक़ होता है। और - ऐ नबी! - आप जानते हैं कि अल्लाह हर चीज़ का सामर्थ्य रखता है। चुनाँचे वह जो चाहता है, करता है, और जो चाहता है, आदेश देता है।

أَلَمْ تَعْلَمْ أَنَّ ٱللَّهَ لَهُۥ مُلْكُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۗ وَمَا لَكُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ مِن وَلِىٍّۢ وَلَا نَصِيرٍ ﴿١٠٧﴾

निःसंदेह (ऐ नबी!) आप जानते हैं कि अल्लाह ही आसमानों और ज़मीन का मालिक है, वह जो चाहता है, हुक्म देता है। वह अपने बंदों को जिस चीज़ का चाहता है, आदेश देता है और जिस चीज़ से चाहता है, उन्हें मना कर देता है। तथा वह शरीयत में से जो चाहता है, स्थिर कर देता है और जो चाहता है, निरस्त कर देता है। अल्लाह के बाद, तुम्हारे मामलों को संभालने के लिए तुम्हारे पास कोई संरक्षक नहीं, और न ही तुम्हें नुकसान से बचाने के लिए कोई सहायक है। बल्कि अल्लाह ही इन सब का संरक्षक है और ऐसा करने में सक्षमहै।

أَمْ تُرِيدُونَ أَن تَسْـَٔلُوا۟ رَسُولَكُمْ كَمَا سُئِلَ مُوسَىٰ مِن قَبْلُ ۗ وَمَن يَتَبَدَّلِ ٱلْكُفْرَ بِٱلْإِيمَـٰنِ فَقَدْ ضَلَّ سَوَآءَ ٱلسَّبِيلِ ﴿١٠٨﴾

(ऐ ईमान वालो!) तुम्हें यह शोभा नहीं देता कि तुम अपने रसूल से - आपत्ति और ढिठाई के तौर पर - प्रश्न करो, जिस तरह कि मूसा अलैहिस्सलाम की क़ौम के लोगों ने इससे पहले अपने नबी (मूसा) से किया था। जैसे कि उन्होंने कहा था: (153 )النساء: ة{رهج الله أرنا} ''हमें अल्लाह को खुल्लम खुल्ला दिखा दो।'' (सूरतुन्-निसा: 153) और जो व्यक्ति ईमान के बदले कु फ़्र को अपना ले, तो निश्चय वह मध्यम मार्ग से भटक गया जो कि सीधा मार्ग है।

وَدَّ كَثِيرٌۭ مِّنْ أَهْلِ ٱلْكِتَـٰبِ لَوْ يَرُدُّونَكُم مِّنۢ بَعْدِ إِيمَـٰنِكُمْ كُفَّارًا حَسَدًۭا مِّنْ عِندِ أَنفُسِهِم مِّنۢ بَعْدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُمُ ٱلْحَقُّ ۖ فَٱعْفُوا۟ وَٱصْفَحُوا۟ حَتَّىٰ يَأْتِىَ ٱللَّهُ بِأَمْرِهِۦٓ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرٌۭ ﴿١٠٩﴾

ى ى यहूदियों और ईसाइयों में से बहुत-से लोग चाहते हैं कि तुम्हें तुम्हारे ईमान के बाद वापस काफ़िर बना दें, जैसे तुम(पहले) मूर्तियों की पूजा किया करते थे। ऐसा वे उस ईर्ष्या के कारण कर रहे हैं, जो उनके दिलों में है। यह कामना वे उसके बाद कर रहे हैं जब उनके लिए स्पष्ट हो चुका है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जो कु छ लाए हैं, वह अल्लाह की ओर से सत्य है। अतः (ऐ ईमान वालो!) उनके कार्यों को क्षमा करो, और उनकी अज्ञानता और उनकी आत्मा की बुराई को नज़रअंदाज़ करो, यहाँ तक कि उनके बारे में अल्लाह का आदेश आ जाए - और अब अल्लाह का यह आदेश और निर्णय आ चुका है। इसलिए काफ़िर को इस्लाम स्वीकारने या जिज़या देने या लड़ाई करने के बीच चयन करने का विकल्प दिया जाता है - निःसंदेह अल्लाह हर चीज़ पर सर्वशक्तिमान है। इसलिए वे अल्लाह को विवश नहीं कर सकते।

وَأَقِيمُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتُوا۟ ٱلزَّكَوٰةَ ۚ وَمَا تُقَدِّمُوا۟ لِأَنفُسِكُم مِّنْ خَيْرٍۢ تَجِدُوهُ عِندَ ٱللَّهِ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌۭ ﴿١١٠﴾

नमाज़ को उसके अरकान, वाजिबात और सुन्नतों के साथ पूर्ण रूप से अदा करो, और अपने धनों की ज़कात निकालकर उसके हक़दारों को दो। तुम अपने जीवन काल में जो भी नेक कामकरोगे और उसे अपनी मृत्यु से पहले अपने लिए एक कोष के रूप में आगे भेजोगे; क़ियामत के दिन तुमअपने रब के पास उसका सवाब पाओगे। वह तुम्हें उसका प्रतिफलप्रदान करेगा। निःसंदेह अल्लाह, जो कु छ तुमकरते हो, उसे ख़ूब देखने वाला है। इसलिए वह हर एक को उसके कामका प्रतिफलदेगा।

وَقَالُوا۟ لَن يَدْخُلَ ٱلْجَنَّةَ إِلَّا مَن كَانَ هُودًا أَوْ نَصَـٰرَىٰ ۗ تِلْكَ أَمَانِيُّهُمْ ۗ قُلْ هَاتُوا۟ بُرْهَـٰنَكُمْ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ ﴿١١١﴾

यहूदियों और ईसाइयों में से हर संप्रदाय ने कहा: जन्नत उन्हीं के लिए विशिष्ट है। यहूदियों ने कहा: उसमें के वल वही प्रवेश करेगा, जो यहूदी है। तथा ईसाइयों ने कहा: उसमें के वल वही प्रवेश करेगा, जो ईसाई है। ये उनकी झूठी इच्छाएँ और उनके भ्रष्ट भ्रम हैं। (ऐ नबी!) आप उनका खंडन करते हुए कह दीजिए: तुम जो कु छ दावा करते हो उसपर अपना तर्क प्रस्तुत करो, यदि वास्तव में तुमअपने दावे में सच्चे हो। بل من أسلم وجهه لله وهومحسن فله أجره عند ربه ولا خوف عليهم ولا هم يحزنون

بَلَىٰ مَنْ أَسْلَمَ وَجْهَهُۥ لِلَّهِ وَهُوَ مُحْسِنٌۭ فَلَهُۥٓ أَجْرُهُۥ عِندَ رَبِّهِۦ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ ﴿١١٢﴾

के वल वही व्यक्ति जन्नत में प्रवेश करेगा, जो निष्ठा के साथ अपने आप को अल्लाह के अधीन कर दे, तथा वह - अपनी निष्ठा के साथ-साथ - रसूल के लाए हुए तरीक़े का अनुसरण करके अच्छी तरह से इबादत करने वाला है। चुनाँचे ऐसा ही व्यक्ति जन्नत में प्रवेश करेगा, चाहे वह किसी भी संप्रदाय से हो। तथा उसके लिए उसका बदला उसके पालनहार के पास है। आख़िरत में उन्हें न कोई भय होगा और न ही वे दुनिया में न मिलने वाली वस्तुओं पर दुखी होंगे। ज्ञात हो कि ये ऐसी विशेषताएँ हैं, जो नबी بلغ क़ुरआन · तफ़सीर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लमके आने के बाद, के वलमोमिनों ही में पाई जा सकती हैं।

وَقَالَتِ ٱلْيَهُودُ لَيْسَتِ ٱلنَّصَـٰرَىٰ عَلَىٰ شَىْءٍۢ وَقَالَتِ ٱلنَّصَـٰرَىٰ لَيْسَتِ ٱلْيَهُودُ عَلَىٰ شَىْءٍۢ وَهُمْ يَتْلُونَ ٱلْكِتَـٰبَ ۗ كَذَٰلِكَ قَالَ ٱلَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ مِثْلَ قَوْلِهِمْ ۚ فَٱللَّهُ يَحْكُمُ بَيْنَهُمْ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ فِيمَا كَانُوا۟ فِيهِ يَخْتَلِفُونَ ﴿١١٣﴾

यहूदियों ने कहा: ईसाई सच्चे धर्म पर नहीं हैं। और ईसाइयों ने कहा: यहूदी सच्चे धर्म पर नहीं हैं। हालाँकि हर कोई अपनी किताब में उस चीज़ की पुष्टि पढ़ता है जिसका उसने इनकार किया है, तथा सभी नबियों पर बिना किसी भेदभाव के ईमान लाने का आदेश पढ़ता है। वे अपने इस कार्य में उन मुश्रिकों के कहने के समान हो गए, जिनके पास कोई ज्ञान नहीं; जब उन्होंने सभी रसूलों और उनपर उतारी गई पुस्तकों का इनकार कर दिया। अतः अल्लाह सभी मतभेद करने वाले लोगों के बीच क़ियामत के दिन निर्णय करेगा, अपने उस न्यायपूर्ण फ़ै सले के साथ जिसकी उसने अपने बंदों को सूचना दी है: कि अल्लाह की उतारी हुई समस्त चीज़ों पर ईमान लाए बिना कोई सफलता नहीं है।

وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّن مَّنَعَ مَسَـٰجِدَ ٱللَّهِ أَن يُذْكَرَ فِيهَا ٱسْمُهُۥ وَسَعَىٰ فِى خَرَابِهَآ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ مَا كَانَ لَهُمْ أَن يَدْخُلُوهَآ إِلَّا خَآئِفِينَ ۚ لَهُمْ فِى ٱلدُّنْيَا خِزْىٌۭ وَلَهُمْ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ عَذَابٌ عَظِيمٌۭ ﴿١١٤﴾

उस व्यक्ति से बड़ा अत्याचारी कोई नहीं है, जो अल्लाह की मस्जिदों में उसका नाम लेने से रोके । चुनाँचे उनमें नमाज़, ज़िक्र और क़ु रआन की तिलावत से मना कर दे, तथा उन्हें गिराकर अथवा उनमें इबादत करने से रोककर, उन्हें बर्बाद और भ्रष्ट करने का भरपूर प्रयास करे। जो लोग मस्जिदों को नष्ट करने में प्रयासरत हैं, उन्हें उनमें प्रवेश नहीं करना चाहिए परंतु इस स्थिति में कि वे डरे सहमे हों, उनके दिलकाँप रहे हों; उनके कु फ़्र तथा अल्लाह की मस्जिदों से रोकने के कारण। ऐसे लोगों के लिए सांसारिक जीवन में ईमान वालों के हाथों अपमान एवं रुसवाई है तथा उनके लिए आख़िरत में अल्लाह की मस्जिदों से लोगों को रोकने के कारण एक बड़ी यातना होगी।

وَلِلَّهِ ٱلْمَشْرِقُ وَٱلْمَغْرِبُ ۚ فَأَيْنَمَا تُوَلُّوا۟ فَثَمَّ وَجْهُ ٱللَّهِ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ وَٰسِعٌ عَلِيمٌۭ ﴿١١٥﴾

पूर्व एवं पश्चिम और उनके बीच का राज्य अल्लाह ही का है। अल्लाह अपने बंदों को जो चाहता है, आदेश देता है। अतः तुम जिधर भी मुख करोगे, अल्लाह का सामना करोगे। यदि वह तुम्हें बैतुल-मक़दिस या काबा की ओर मुँह करने का आदेश दे, अथवा तुमसे क़िबला (के निर्धारण) में गलती हो जाए, या उसकी ओर मुख करना तुम्हारे लिए मुश्किलहो; तो तुम्हारे लिए कोई हानि की बात नहीं है; क्योंकि सभी दिशाएँ सर्वशक्तिमान अल्लाह के लिए हैं। बेशक अल्लाह सर्वव्यापी है। वह अपनी दया और सुविधा के साथ अपनी समस्त सृष्टिلको व्याप्त है, उनके इरादों एवं कार्यों को जानने वाला है।

وَقَالُوا۟ ٱتَّخَذَ ٱللَّهُ وَلَدًۭا ۗ سُبْحَـٰنَهُۥ ۖ بَل لَّهُۥ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۖ كُلٌّۭ لَّهُۥ قَـٰنِتُونَ ﴿١١٦﴾

तथा यहूदियों, ईसाइयों और मुश्रिकों ने कहा: अल्लाह ने अपने लिए कोई संतान बना रखी है! अल्लाह इससे पाक एवं पवित्र है। क्योंकि वह अपनी सृष्टि से बेनियाज़ है और संतान तो वह बनाता है, जिसे उसकी आवश्यकता होती है। बल्कि वही महिमावान आकाशों और धरती की सभी चीज़ों का मालिक है। सभी प्राणी उसी महिमावान के दास और उसके अधीन हैं, वह जैसे चाहता है, उनमें व्यवहार करता है।

بَدِيعُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۖ وَإِذَا قَضَىٰٓ أَمْرًۭا فَإِنَّمَا يَقُولُ لَهُۥ كُن فَيَكُونُ ﴿١١٧﴾

अल्लाह महिमावान आकाशों तथा धरती और उनमें मौजूद सभी चीज़ों का बिना किसी पूर्व उदाहरण के सृष्टिकर्ता है। जब वह किसी काम का फैसला करता है और उसकी इच्छा करता है, तो उस काम से कहता है: ''हो जा''; तो वह वैसे ही हो जाता है, जैसे अल्लाह चाहता है कि वह हो। उसके आदेश और निर्णय को कोई टालने वाला नहीं।

وَقَالَ ٱلَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ لَوْلَا يُكَلِّمُنَا ٱللَّهُ أَوْ تَأْتِينَآ ءَايَةٌۭ ۗ كَذَٰلِكَ قَالَ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِم مِّثْلَ قَوْلِهِمْ ۘ تَشَـٰبَهَتْ قُلُوبُهُمْ ۗ قَدْ بَيَّنَّا ٱلْـَٔايَـٰتِ لِقَوْمٍۢ يُوقِنُونَ ﴿١١٨﴾

अह्ले किताब और बहुदेववादियों में से जो नहीं जानते, उन्होंने सत्य के प्रति हठ के कारण कहा: अल्लाह हमसे बिना किसी मध्यस्थ के बात क्यों नहीं करता, या हमारे पास हमारे ही लिए विशिष्ट कोई भौतिक निशानी क्यों नहीं आती?इन लोगों की इसी बात की तरह, इससे पहले झुठलाने वाले समुदायों ने भी अपने रसूलों से कही थी, भले ही بلغ क़ुरआन · तफ़सीर उनके समय और स्थान अलग-अलग हों। इन लोगों के दिल कु फ़्र, हठ और अहंकार में उन लोगों के दिलों के समान हैं जो इनसे पहले थे। हमने उन लोगों के लिए आयतें स्पष्ट कर दी हैं, जो सत्य पर विश्वास करते हैं, जब वह उनके सामने प्रकट होता है, न तो उन्हें कोई संदेह घेरता है और न ही हठ उन्हें रोकता है।

إِنَّآ أَرْسَلْنَـٰكَ بِٱلْحَقِّ بَشِيرًۭا وَنَذِيرًۭا ۖ وَلَا تُسْـَٔلُ عَنْ أَصْحَـٰبِ ٱلْجَحِيمِ ﴿١١٩﴾

हमने आपको (ऐ नबी!) सत्य धर्म के साथ भेजा है, जिसमें कोई संदेह नहीं; ताकि आप ईमान वालों को जन्नत की शुभ सूचना दें और काफ़िरों को जहन्नम की आग से डराएँ। आपका काम के वल स्पष्ट रूप से पहुँचा देना है। अल्लाह आपसे उन जहन्नमियों के बारे में हरगिज़ नहीं पूछेगा, जो आपपर ईमान नहीं लाए।

وَلَن تَرْضَىٰ عَنكَ ٱلْيَهُودُ وَلَا ٱلنَّصَـٰرَىٰ حَتَّىٰ تَتَّبِعَ مِلَّتَهُمْ ۗ قُلْ إِنَّ هُدَى ٱللَّهِ هُوَ ٱلْهُدَىٰ ۗ وَلَئِنِ ٱتَّبَعْتَ أَهْوَآءَهُم بَعْدَ ٱلَّذِى جَآءَكَ مِنَ ٱلْعِلْمِ ۙ مَا لَكَ مِنَ ٱللَّهِ مِن وَلِىٍّۢ وَلَا نَصِيرٍ ﴿١٢٠﴾

अल्लाह अपने नबी को निर्देश एवं चेतावनी देते हुए उन्हें संबोधित करते हुए कहता है: आपसे यहूदी और ईसाई हरगिज़ राज़ी नहीं होंगे, यहाँ तक कि आप इस्लाम को छोड़कर उनके धर्म का पालन करने लगें। आप कह दीजिए: निःसंदेह अल्लाह की किताब और उसका बयान ही सच्चा मार्गदर्शन है, न कि वह झूठ जिसपर वे क़ायमहैं। यदि आपके पास स्पष्ट सत्य आ जाने के बाद, आपने या आपके किसी अनुयायी ने उनका अनुसरण किया, तो आपको अल्लाह की पकड़ से बचाने के लिए हरगिज़ कोई मदद या सहायता नहीं मिलेगी। यह सत्य को छोड़ने और असत्य के लोगों के साथ क़दममिलाकर चलने के ख़तरे को स्पष्ट करने के अध्याय से है।

ٱلَّذِينَ ءَاتَيْنَـٰهُمُ ٱلْكِتَـٰبَ يَتْلُونَهُۥ حَقَّ تِلَاوَتِهِۦٓ أُو۟لَـٰٓئِكَ يُؤْمِنُونَ بِهِۦ ۗ وَمَن يَكْفُرْ بِهِۦ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْخَـٰسِرُونَ ﴿١٢١﴾

इस आयत में क़ु रआन अह्ले किताब के एक समूह के बारे में बात करता है, जो अपने हाथों में मौजूद अवतरित पुस्तकों पर अमल करते हैं और उनका पालन करते हैं जैसे उनका पालन किया जाना चाहिए। ये लोग इन पुस्तकों में नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सच्चे नबी होने को दर्शाने वाली निशानियाँ पाते हैं। यही कारण है कि उन्होंने आपपर ईमान लाने में जल्दी की। जबकि दूसरा समूह अपने कु फ़्र पर अड़ा रहा, तो उसे हानि उठानी पड़ी।

يَـٰبَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ ٱذْكُرُوا۟ نِعْمَتِىَ ٱلَّتِىٓ أَنْعَمْتُ عَلَيْكُمْ وَأَنِّى فَضَّلْتُكُمْ عَلَى ٱلْعَـٰلَمِينَ ﴿١٢٢﴾

ऐ बनी इसराईल! मेरी प्रदान की हुई धार्मिक एवं सांसारिक नेमतों को याद करो और याद रखो कि निःसंदेह मैंने ही तुम्हें तुम्हारे समय के लोगों पर नुबुव्वत एवं बादशाहत द्वारा प्रधानता प्रदान की।

وَٱتَّقُوا۟ يَوْمًۭا لَّا تَجْزِى نَفْسٌ عَن نَّفْسٍۢ شَيْـًۭٔا وَلَا يُقْبَلُ مِنْهَا عَدْلٌۭ وَلَا تَنفَعُهَا شَفَـٰعَةٌۭ وَلَا هُمْ يُنصَرُونَ ﴿١٢٣﴾

अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर अपने और क़ियामत के दिन की यातना के बीच, बचाव का साधन अपनाओ। क्योंकि उस दिन कोई भी किसी के कुछ काम न आएगा, और उस दिन उससे कोई छुड़ौती स्वीकार नहीं की जाएगी, चाहे वह कितनी भी बड़ी क्यों न हो, और न उस दिन उसे किसी की सिफ़ारिश लाभ देगी, चाहे उसका स्थान कितना भी ऊँ चा क्यों न हो। और न ही अल्लाह के अलावा उसके लिए कोई मददगार होगा, जो उसकी मदद कर सके ।

۞ وَإِذِ ٱبْتَلَىٰٓ إِبْرَٰهِـۧمَ رَبُّهُۥ بِكَلِمَـٰتٍۢ فَأَتَمَّهُنَّ ۖ قَالَ إِنِّى جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًۭا ۖ قَالَ وَمِن ذُرِّيَّتِى ۖ قَالَ لَا يَنَالُ عَهْدِى ٱلظَّـٰلِمِينَ ﴿١٢٤﴾

उस समय को याद करो, जब अल्लाह ने इबराहीम अलैहिस्सलाम को उन आदेशों और कर्तव्यों के द्वारा आज़माया, जिनका उन्हें आदेश दिया था, तो उन्होंने उनका निष्पादन किया और उन्हें पूर्णतमरूप से अंजामदिया। अल्लाह ने अपने नबी इबराहीमअलैहिस्सलामसे कहा: मैं तुम्हें लोगों के लिए आदर्श बनाने वाला हूँ, ताकि तुम्हारे क्रियाकलापों और आचार-व्यवहार में तुम्हारा अनुकरण किया जाए। इबराहीम अलैहिस्सलाम ने कहा: ऐ मेरे पालनहार! मेरी औलाद में से भी कु छ लोगों को इमाम बना, जिनका लोग अनुकरण करें। अल्लाह तआला ने उन्हें उत्तर देते हुए कहा: मेरा तुम्हारे लिए धर्म की पेशवाई का वचन, तुम्हारे वंश के अत्याचारियों को नहीं पहुँचता। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर ل

وَإِذْ جَعَلْنَا ٱلْبَيْتَ مَثَابَةًۭ لِّلنَّاسِ وَأَمْنًۭا وَٱتَّخِذُوا۟ مِن مَّقَامِ إِبْرَٰهِـۧمَ مُصَلًّۭى ۖ وَعَهِدْنَآ إِلَىٰٓ إِبْرَٰهِـۧمَ وَإِسْمَـٰعِيلَ أَن طَهِّرَا بَيْتِىَ لِلطَّآئِفِينَ وَٱلْعَـٰكِفِينَ وَٱلرُّكَّعِ ٱلسُّجُودِ ﴿١٢٥﴾

तथा उस समय को याद करो, जब अल्लाह ने सम्मानित घर काबा को लोगों के लिए बार-बार लौट कर आने की जगह बनाई, जिससे उनका दिल जुड़ा हुआ रहता है। जब भी वे वहाँ से वापस जाते हैं, दोबारा उसकी ओर लौटकर आते हैं। तथा उसे उनके लिए सर्वथा शांति का स्थल (सुरक्षित स्थान) बना दिया, जिसमें उनपर कोई अत्याचार नहीं किया जाता। और लोगों से कहा: उस पत्थर को - जिसपर खड़े होकर इबराहीम अलैहिस्सलाम काबा का निर्माण करते थे - नमाज़ की जगह बना लो। तथा हमने इबराहीम और उनके पुत्र इसमाईल अलैहिमस्सलाम को आदेश दिया कि वे काबा को गंदगियों और मूर्तियों से शुद्ध करें, तथा उसे तवाफ़, एतिकाफ़ और नमाज़ आदि के द्वारा इबादत करने वालों के लिए तैयार रखें।

وَإِذْ قَالَ إِبْرَٰهِـۧمُ رَبِّ ٱجْعَلْ هَـٰذَا بَلَدًا ءَامِنًۭا وَٱرْزُقْ أَهْلَهُۥ مِنَ ٱلثَّمَرَٰتِ مَنْ ءَامَنَ مِنْهُم بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ ۖ قَالَ وَمَن كَفَرَ فَأُمَتِّعُهُۥ قَلِيلًۭا ثُمَّ أَضْطَرُّهُۥٓ إِلَىٰ عَذَابِ ٱلنَّارِ ۖ وَبِئْسَ ٱلْمَصِيرُ ﴿١٢٦﴾

तथा (ऐ नबी!) याद कीजिए, जब इबराहीम अलैहिस्सलाम ने अपने पालनहार से दुआ करते हुए कहा: ऐ मेरे पालनहार! मक्का को एक शांति वाला (सुरक्षित) शहर बना दे, जिसमें किसी को कष्ट न पहुँचाया जाए, तथा उसमें रहने वालों को विभिन्न प्रकार के फल प्रदान कर, और उसे तुझपर और अंतिम दिन पर ईमान रखने वालों के लिए एक विशिष्ट रोज़ी बना दे। अल्लाह ने कहा: तथा उनमें से जो कु फ़्र करेगा, तो मैं उसे इस दुनिया में जो कु छ भी प्रदान करता हूँ, उसके साथ उसे थोड़ा-सा लाभ दूँगा, फिर आखिरत में उसे आग की यातना की ओर विवश कर दूँगा और वह बहुत बुरा ठिकाना है, जिसकी ओर वह क़ियामत के दिन लौटकर आएगा।

وَإِذْ يَرْفَعُ إِبْرَٰهِـۧمُ ٱلْقَوَاعِدَ مِنَ ٱلْبَيْتِ وَإِسْمَـٰعِيلُ رَبَّنَا تَقَبَّلْ مِنَّآ ۖ إِنَّكَ أَنتَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْعَلِيمُ ﴿١٢٧﴾

तथा (ऐ नबी!) उस समय को याद करो, जब इबराहीम और इसमाईल अलैहिमस्सलाम काबा की बुनियादें ऊँ ची कर रहे थे, और वे दोनों (नम्रता के साथ) कह रहे थे: ऐ हमारे पालनहार! हमसे हमारे कार्यों को - जिनमें से एक इस घर का निर्माण है - क़बूल फरमा। निःसंदेह तू ही हमारी दुआ को सुनने वाला, हमारे इरादों और कार्यों को जानने वाला है।

رَبَّنَا وَٱجْعَلْنَا مُسْلِمَيْنِ لَكَ وَمِن ذُرِّيَّتِنَآ أُمَّةًۭ مُّسْلِمَةًۭ لَّكَ وَأَرِنَا مَنَاسِكَنَا وَتُبْ عَلَيْنَآ ۖ إِنَّكَ أَنتَ ٱلتَّوَّابُ ٱلرَّحِيمُ ﴿١٢٨﴾

ऐ हमारे पालनहार! तू हमें अपने आदेश के प्रति समर्पित होने वाला और अपना आज्ञाकारी बना दे कि हम तेरे साथ किसी को भी साझी न बनाएँ। तथा हमारे वंश से भी एक ऐसा समुदाय बना, जो तेरा आज्ञाकारी हो। और हमें अपनी इबादत सिखा दे कि वह कै से होनी चाहिए, तथा हमारे गुनाहों और अपने आज्ञापालन में हमारी कमियों को क्षमा कर दे; निःसंदेह तू ही है जो अपने तौबा करने वाले बंदों की तौबा को बहुत क़बूल करने वाला, उनपर अत्यंत दयालु है।

رَبَّنَا وَٱبْعَثْ فِيهِمْ رَسُولًۭا مِّنْهُمْ يَتْلُوا۟ عَلَيْهِمْ ءَايَـٰتِكَ وَيُعَلِّمُهُمُ ٱلْكِتَـٰبَ وَٱلْحِكْمَةَ وَيُزَكِّيهِمْ ۚ إِنَّكَ أَنتَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ ﴿١٢٩﴾

ऐ हमारे पालनहार!, और उनके बीच उन्हीं में से इसमाईल की संतान से एक रसूल भेज, जो उनपर तेरी उतारी हुई आयतें पढ़े, तथा उन्हें क़ु रआन एवं सुन्नत की शिक्षा दे और उन्हें शिर्क एवं बुराइयों से पाक करे; निःसंदेह तू ही सर्वशक्तिमान, प्रभुत्वशाली और अपने कार्यों एवं आदेशों में पूर्ण हिकमत वाला है।

وَمَن يَرْغَبُ عَن مِّلَّةِ إِبْرَٰهِـۧمَ إِلَّا مَن سَفِهَ نَفْسَهُۥ ۚ وَلَقَدِ ٱصْطَفَيْنَـٰهُ فِى ٱلدُّنْيَا ۖ وَإِنَّهُۥ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ لَمِنَ ٱلصَّـٰلِحِينَ ﴿١٣٠﴾

इबराहीम अलैहिस्सलाम के धर्म से विमुख होकर दूसरे धर्मों की ओर वही आकर्षित होगा, जिसने अपनी मूर्खता तथा कु प्रबंधन से सत्य को छोड़ गुमराही को अपनाकर अपने ऊपर अत्याचार किया और अपने लिए अपमान से संतुष्ट हो गया। निश्चय हमने उसे दुनिया में एक रसूल और दोस्त के रूप में चुन लिया, तथा आख़िरत में वह निश्चय उन सदाचारियों में से है, जिन्होंने अपने ऊपर अल्लाह के अनिवार्य किए हुए आदेशों को पूरा करके सर्वोच्च पद प्राप्त किए। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

إِذْ قَالَ لَهُۥ رَبُّهُۥٓ أَسْلِمْ ۖ قَالَ أَسْلَمْتُ لِرَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ ﴿١٣١﴾

अल्लाह ने उन्हें उनके इस्लाम (आज्ञापालन) की ओर जल्दी करने के कारण चुना। जब उनके पालनहार ने उनसे कहा: इबादत को मेरे लिए विशुद्ध कर दो और आज्ञाकारिता के साथ मेरे अधीन हो जाओ, तो उन्होंने अपने रब को उत्तर देते हुए कहा: मैं अल्लाह का आज्ञाकारी हो गया, जो बंदों को पैदा करने वाला, उन्हें रोज़ी देने वाला और उनके मामलों का प्रबंधक है।

وَوَصَّىٰ بِهَآ إِبْرَٰهِـۧمُ بَنِيهِ وَيَعْقُوبُ يَـٰبَنِىَّ إِنَّ ٱللَّهَ ٱصْطَفَىٰ لَكُمُ ٱلدِّينَ فَلَا تَمُوتُنَّ إِلَّا وَأَنتُم مُّسْلِمُونَ ﴿١٣٢﴾

इबराहीम ने अपने बेटों को इसी बात की वसीयत की, कि: {ينالمالع لرب تلم أس} ''मैं सारे संसारों के पालनहार का आज्ञाकारी हो गया।'', इसी तरह याक़ूब ने भी अपने बेटों को इसी बात की वसीयत की। उन दोनों ने अपने बेटों को आवाज़ देते हुए कहा: निःसंदेह अल्लाह ने तुम्हारे लिए इस्लाम धर्म को चुन लिया है। अतः तुम उसे दृढ़ता से पकड़े रहो यहाँ तक कि तुम्हारे पास मृत्यु आ जाए, और तुमबाहरी और आंतरिक रूप से अल्लाह के आज्ञाकारी हो।

أَمْ كُنتُمْ شُهَدَآءَ إِذْ حَضَرَ يَعْقُوبَ ٱلْمَوْتُ إِذْ قَالَ لِبَنِيهِ مَا تَعْبُدُونَ مِنۢ بَعْدِى قَالُوا۟ نَعْبُدُ إِلَـٰهَكَ وَإِلَـٰهَ ءَابَآئِكَ إِبْرَٰهِـۧمَ وَإِسْمَـٰعِيلَ وَإِسْحَـٰقَ إِلَـٰهًۭا وَٰحِدًۭا وَنَحْنُ لَهُۥ مُسْلِمُونَ ﴿١٣٣﴾

إبرهم وإسمعيل وإسحق إلها وحدا ونحن له مسلمون या तुम उस समय उपस्थित थे, जब याक़ू ब अलैहिस्सलाम की मृत्यु निकट आई। जब उन्होंने अपने बेटों से पूछते हुए कहा: तुम मेरी मृत्यु के बाद किसकी इबादत करोगे? उन्होंने उनके सवाल के जवाब में कहा: हम आपके पूज्य और आपके पूर्वजों इबराहीम, इसमाईल तथा इसह़ाक़ के पूज्य की इबादत करेंगे, जो एक अकेला पूज्य है, उसका कोई साझी नहीं। और हम अके ले उसी के प्रति समर्पित और उसी के आज्ञाकारी हैं।

تِلْكَ أُمَّةٌۭ قَدْ خَلَتْ ۖ لَهَا مَا كَسَبَتْ وَلَكُم مَّا كَسَبْتُمْ ۖ وَلَا تُسْـَٔلُونَ عَمَّا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ ﴿١٣٤﴾

यह तुमसे पहले गुज़रे हुए समुदायों में से एक समुदाय था, जो गुज़र चुका और उस कार्य की ओर जा चुका जो उसने आगे बढ़ाया था। अतः उसके लिए उसके कमाए हुए अच्छे या बुरे कर्म हैं, और तुम्हारे लिए तुम्हारे कमाए हुए कर्म। न तुमसे उनके कर्मों के बारे में पूछा जाएगा, न उनसे तुम्हारे कर्मों के बारे में पूछा जाएगा, तथा कोई भी किसी दूसरे के गुनाह के बदले नहीं पकड़ा जाएगा। बल्कि प्रत्येक को उसके कर्म का बदला दिया जाएगा। इसलिए अपने पहले गुज़रे हुए लोगों के कर्म के पीछे पड़ना तुम्हें खुद अपने कर्म को देखने से विचलित न करे। क्योंकि किसी को अल्लाह की दया के बाद, उसके सत्कर्म के सिवा कोई चीज़ हरगिज़ फायदा न देगी।

وَقَالُوا۟ كُونُوا۟ هُودًا أَوْ نَصَـٰرَىٰ تَهْتَدُوا۟ ۗ قُلْ بَلْ مِلَّةَ إِبْرَٰهِـۧمَ حَنِيفًۭا ۖ وَمَا كَانَ مِنَ ٱلْمُشْرِكِينَ ﴿١٣٥﴾

यहूदियों ने मुसलमानों से कहा: यहूदी बन जाओ, हिदायत के मार्ग पर चलने लगोगे, तथा ईसाइयों ने कहा: ईसाई बन जाओ, हिदायत के मार्ग पर चलने लगोगे। (ऐ नबी!) आप उन्हें जवाब देते हुए कह दीजिए: बल्कि, हम इबराहीम अलैहिस्सलाम के धर्म का अनुसरण करेंगे, जो झूठे धर्मों से विमुख होकर सच्चे धर्म की ओर प्रवृत थे तथा उन लोगों में से नहीं थे जिन्होंने अल्लाह के साथ किसी को साझी बनाया।

قُولُوٓا۟ ءَامَنَّا بِٱللَّهِ وَمَآ أُنزِلَ إِلَيْنَا وَمَآ أُنزِلَ إِلَىٰٓ إِبْرَٰهِـۧمَ وَإِسْمَـٰعِيلَ وَإِسْحَـٰقَ وَيَعْقُوبَ وَٱلْأَسْبَاطِ وَمَآ أُوتِىَ مُوسَىٰ وَعِيسَىٰ وَمَآ أُوتِىَ ٱلنَّبِيُّونَ مِن رَّبِّهِمْ لَا نُفَرِّقُ بَيْنَ أَحَدٍۢ مِّنْهُمْ وَنَحْنُ لَهُۥ مُسْلِمُونَ ﴿١٣٦﴾

ى ऐ ईमान वालो! इस झूठे दावा वाले यहूदियों और ईसाइयों से कह दो: हम अल्लाह पर और उस क़ु रआन पर ईमान लाए जो हमारी ओर उतारा गया। तथा हम उसपर ईमान लाए जो इबराहीम और उनके पुत्रों इसमाईल, इसह़ाक़ और याक़ू ब पर उतारा गया। और हम उसपर ईमान लाए जो याक़ू ब अलैहिस्सलाम की संतान में से होने वाले नबियों पर उतारा गाय। इसी तरह हम ईमान लाए उस तौरात पर जो अल्लाह ने मूसा अलैहिस्सलाम को प्रदान किया और उस इन्जील पर जो अल्लाह ने ईसा अलैहिस्सलाम को प्रदान किया। तथा हम उन किताबों पर ईमान लाए जो अल्लाह ने सभी नबियों को प्रदान कीं। हम उनमें से किसी के बीच अंतर (भेदभाव) नहीं करते, कि हम कुछ पर ईमान लाएँ और कु छ का इनकार कर दें। बल्कि हमउन सभी (नबियों) पर ईमान रखते हैं और हमअके ले उसी महिमावान अल्लाह के आज्ञाकारी और अधीन हैं। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

فَإِنْ ءَامَنُوا۟ بِمِثْلِ مَآ ءَامَنتُم بِهِۦ فَقَدِ ٱهْتَدَوا۟ ۖ وَّإِن تَوَلَّوْا۟ فَإِنَّمَا هُمْ فِى شِقَاقٍۢ ۖ فَسَيَكْفِيكَهُمُ ٱللَّهُ ۚ وَهُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْعَلِيمُ ﴿١٣٧﴾

यदि यहूदी, ईसाई और अन्य काफ़िर तुम्हारे ईमान लाने की तरह ईमान लाएँ; तो उन्होंने उससीधे मार्ग को पा लिया, जिसे अल्लाह ने पसंद किया है। लेकिन यदि वे सभी या कु छ नबियों को झुठलाकर ईमान से उपेक्षा करें, तो वे विरोध और शत्रुता में पड़े हुए हैं। इसलिए - ऐ नबी! - आप दुखी न हों, क्योंकि अल्लाह आपको उनके कष्ट से बचाने के लिए पर्याप्त हो जाएगा, आपकी उनकी बुराई से रक्षा करेगा और उनके खिलाफ आपकी मदद करेगा। क्योंकि वह उनकी बातों को सुनने वाला, और उनके इरादों और कार्यों को जानने वाला है।

صِبْغَةَ ٱللَّهِ ۖ وَمَنْ أَحْسَنُ مِنَ ٱللَّهِ صِبْغَةًۭ ۖ وَنَحْنُ لَهُۥ عَـٰبِدُونَ ﴿١٣٨﴾

अल्लाह के उस धर्म पर बाहरी और आंतरिक रूप से जमे रहो, जिसपर उसने तुम्हें पैदा किया है। क्योंकि अल्लाह के धर्म से बेहतर कोई धर्म नहीं। क्योंकि वह प्रकृ ति के अनुकू ल है, हितों को लाने वाला और अहितों को रोकने वाला है। तथा कहो: हम के वल अल्लाह की इबादत करने वाले हैं, हम उसके साथ किसी दूसरे को साझी नहीं बनाते।

قُلْ أَتُحَآجُّونَنَا فِى ٱللَّهِ وَهُوَ رَبُّنَا وَرَبُّكُمْ وَلَنَآ أَعْمَـٰلُنَا وَلَكُمْ أَعْمَـٰلُكُمْ وَنَحْنُ لَهُۥ مُخْلِصُونَ ﴿١٣٩﴾

ऐ नबी! कह दीजिए: (ऐ किताब वालो!) क्या तुम हमसे इस बारे में बहस करते हो कि तुम अल्लाह और उसके धर्म के हमसे ज़्यादा हक़दार हो; इस कारण कि तुम्हारा धर्म पुराना है और तुम्हारी पुस्तक पहले की है। तो (जान लो) इससे तुम्हें कोई फायदा नहीं होगा। क्योंकि अल्लाह ही हम सब का रब है, वह विशेष रूप से के वल तुम्हारा ही रब नहीं है। तथा हमारे लिए हमारे कर्म हैं, जिनके बारे में तुमसे नहीं पूछा जाएगा, और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म हैं, जिनके बारे में हमसे नहीं पूछा जाएगा। बल्कि प्रत्येक को उसके काम का बदला दिया जाएगा। हम इबादत और आज्ञाकारिता में अल्लाह के प्रति निष्ठावान हैं, उसके साथ किसी चीज़ को साझी नहीं ठहराते।

أَمْ تَقُولُونَ إِنَّ إِبْرَٰهِـۧمَ وَإِسْمَـٰعِيلَ وَإِسْحَـٰقَ وَيَعْقُوبَ وَٱلْأَسْبَاطَ كَانُوا۟ هُودًا أَوْ نَصَـٰرَىٰ ۗ قُلْ ءَأَنتُمْ أَعْلَمُ أَمِ ٱللَّهُ ۗ وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّن كَتَمَ شَهَـٰدَةً عِندَهُۥ مِنَ ٱللَّهِ ۗ وَمَا ٱللَّهُ بِغَـٰفِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ ﴿١٤٠﴾

ه (ऐ अह्ले किताब!) क्या तुम कहते हो: इबराहीम और इसमाईल और इसह़ाक़ और याक़ू ब तथा याक़ू ब की संतान में से होने वाले पैग़ंबर, यहूदी या ईसाई धर्म के अनुयायी थे? ऐ नबी! आप उनका उत्तर देते हुए कह दें: क्या तुम अधिक जानते हो या अल्लाह?! यदि उनका दावा है कि वे (उक्त नबीगण) उनके धर्म पर थे, तो निश्चय उन्होंने झूठ बोला है। क्योंकि उनकी नुबुव्वत और मृत्यु का ज़माना तौरात और इंजील उतरने से पहले का है! इससे यह पता चला कि जो कु छ वे कहते हैं, वह अल्लाह और उसके रसूलों के खिलाफ झूठ है, और उन्होंने उस सत्य को छिपाया है, जो उनपर उतरा था। और उससे बड़ा ज़ालिम कोई नहीं, जो अपने पास मौजूद उस पक्की गवाही को छिपाए, जिसका ज्ञान उसे अल्लाह की ओर से हुआ है, जैसा कि किताब वालों ने किया। और अल्लाह तुम्हारे कर्मों से अनजान नहीं है और वह तुम्हें उनका बदला देगा।

تِلْكَ أُمَّةٌۭ قَدْ خَلَتْ ۖ لَهَا مَا كَسَبَتْ وَلَكُم مَّا كَسَبْتُمْ ۖ وَلَا تُسْـَٔلُونَ عَمَّا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ ﴿١٤١﴾

यह एक समुदाय था, जो गुज़र चुका और उस कार्य की ओर जा चुका जो उसने आगे बढ़ाया था। अतः उसके लिए उसके कमाए हुए (अच्छे या बुरे) कर्म हैं, और तुम्हारे लिए तुम्हारे कमाए हुए कर्म। न तुमसे उनके कर्मों के बारे में पूछा जाएगा, न उनसे तुम्हारे कर्मों के बारे में पूछा जाएगा, तथा कोई भी किसी दूसरे के गुनाह के बदले नहीं पकड़ा जाएगा और न ही वह किसी दूसरे के कर्म से लाभान्वित होगा। बल्कि प्रत्येक को उसके कर्म का बदला दिया जाएगा।

۞ سَيَقُولُ ٱلسُّفَهَآءُ مِنَ ٱلنَّاسِ مَا وَلَّىٰهُمْ عَن قِبْلَتِهِمُ ٱلَّتِى كَانُوا۟ عَلَيْهَا ۚ قُل لِّلَّهِ ٱلْمَشْرِقُ وَٱلْمَغْرِبُ ۚ يَهْدِى مَن يَشَآءُ إِلَىٰ صِرَٰطٍۢ مُّسْتَقِيمٍۢ ﴿١٤٢﴾

शीघ्र ही अज्ञानी, अल्पबुद्धि यहूदी और उनके जैसे मुनाफ़िक़ (पाखंडी) कहेंगे: मुसलमानों को बैतुल-मक़दिस के क़िबला से, जो पहले उनका क़िबला था, किस चीज़ ने फे र दिया?! (ऐ नबी!) आप उन्हें उत्तर देते हुए कह दीजिए: पूर्व और पश्चिम तथा अन्य दिशाओं का मालिक अके ला अल्लाह ही है, वह अपने बंदों में से जिसे चाहता है, जिस दिशा की ओर भी चाहता है, निर्देशित कर देता है। तथा वह अपने बंदों में से जिसे चाहता है, सीधे रास्ते का मार्गदर्शन प्रदान करता है, जिसमें कोई टेढ़ापन और विचलन नहीं है। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

وَكَذَٰلِكَ جَعَلْنَـٰكُمْ أُمَّةًۭ وَسَطًۭا لِّتَكُونُوا۟ شُهَدَآءَ عَلَى ٱلنَّاسِ وَيَكُونَ ٱلرَّسُولُ عَلَيْكُمْ شَهِيدًۭا ۗ وَمَا جَعَلْنَا ٱلْقِبْلَةَ ٱلَّتِى كُنتَ عَلَيْهَآ إِلَّا لِنَعْلَمَ مَن يَتَّبِعُ ٱلرَّسُولَ مِمَّن يَنقَلِبُ عَلَىٰ عَقِبَيْهِ ۚ وَإِن كَانَتْ لَكَبِيرَةً إِلَّا عَلَى ٱلَّذِينَ هَدَى ٱللَّهُ ۗ وَمَا كَانَ ٱللَّهُ لِيُضِيعَ إِيمَـٰنَكُمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ بِٱلنَّاسِ لَرَءُوفٌۭ رَّحِيمٌۭ ﴿١٤٣﴾

ى जिस तरह हमने तुम्हारे लिए वह क़िबला निर्धारित किया है, जिसे हमने तुम्हारे लिए पसंद किया है; वैसे ही हमने तुम्हें सबसे बेहतर, न्यायपूर्ण उम्मत (समुदाय) बनाया, जो अक़ायद, इबादात और मामलात में सभी उम्मतों (समुदायों) के बीच मध्यम है; ताकि तुम क़ियामत के दिन अल्लाह के सभी रसूलों के लिए गवाही देने वाले बन जाओ कि उन्होंने अपनी उम्मतों को वह संदेश पहुँचा दिया था जिसे पहुँचाने का अल्लाह ने उन्हे आदेश दिया था, तथा रसूल मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तुमपर यह गवाही देने वाले हो जाएँ कि उन्होंने तुम्हें अल्लाह का धर्म पहुँचा दिया। तथा हमने उस क़िबले को जिसकी ओर आप रुख़ करते थे अर्थात् बैतुल-मक़दिस को इसलिए बदलदिया, ताकि हम - इस तरह प्रत्यक्ष रुप से जिसपर बदला निष्कर्षित होता है - जान लें कि कौन अल्लाह के निर्धारित किए हुए नियम से संतुष्ट होता है और उसके सामने अपना सिर झुकाते हुए रसूलका अनुसरण करता है, तथा कौन अपने धर्म से फिर जाता है और अपनी इच्छाओं का पालन करता है। इसलिए वह अल्लाह के बनाए हुए नियमके आगे सिर नहीं झुकाता। वास्तव में, पहले क़िबले को बदलने की बात बहुत बड़ी थी, सिवाय उन लोगों के लिए जिन्हें अल्लाह ने उसपर तथा इस बात पर विश्वास करने की तौफ़ीक़ दी कि अल्लाह अपने बंदों के लिए जो नियम बनाता है, वह व्यापक हिकमतों की वजह से बनाता है। तथा अल्लाह ऐसा नहीं कि तुम्हारा ईमान बर्बाद कर दे, जिसमें तुम्हारी वे नमाज़ें भी शामिल हैं, जो तुमने क़िबला बदलने से पहले पढ़ी थीं। निःसंदेह अल्लाह लोगों पर बहुत करुणा करने वाला, अत्यंत दयावान् है। इसलिए वह उन्हें कष्ट में नहीं डालता है, और उनके कर्मों का प्रतिफल व्यर्थ नहीं करता है।

قَدْ نَرَىٰ تَقَلُّبَ وَجْهِكَ فِى ٱلسَّمَآءِ ۖ فَلَنُوَلِّيَنَّكَ قِبْلَةًۭ تَرْضَىٰهَا ۚ فَوَلِّ وَجْهَكَ شَطْرَ ٱلْمَسْجِدِ ٱلْحَرَامِ ۚ وَحَيْثُ مَا كُنتُمْ فَوَلُّوا۟ وُجُوهَكُمْ شَطْرَهُۥ ۗ وَإِنَّ ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْكِتَـٰبَ لَيَعْلَمُونَ أَنَّهُ ٱلْحَقُّ مِن رَّبِّهِمْ ۗ وَمَا ٱللَّهُ بِغَـٰفِلٍ عَمَّا يَعْمَلُونَ ﴿١٤٤﴾

ه يعملون हमने - ऐ नबी! - आपके चेहरे और निगाह को बार-बार आसमान की ओर उठते हुए देखा है, इस प्रत्याशा में कि आपको अपने मनपसंद क़िबले की ओर मुख करके नमाज़ पढ़ने की अनुमति प्राप्त हो जाए। अतः निश्चय हम वर्तमान क़िबला बैतुल-मक़दिस के बदले, आपको उस क़िबले की ओर फे र देंगे, जिसे आप पसंद करते हैं (और वह अल्लाह का पवित्र घर काबा है)। सो (अब) आप अपना चेहरा मक्का मुकर्रमा में स्थित अल्लाह के पवित्र घर की ओर फे र लें। तथा - ऐ ईमान वालो! - तुम जहाँ भी हो, नमाज़ पढ़ते समय उसी की ओर मुख कर लो। निश्चय यहूदी तथा ईसाई इस बात से अवगत हैं कि क़िबले का बदलना उनके पालनहार और उनके मामलों के प्रभंधक की ओर से अवतिरत सत्य है; क्योंकि यह उनकी पुस्तक में प्रमाणित है। तथा अल्लाह उस बात से अनजान नहीं है जो ये सत्य से मुँह मोड़ने वाले करते हैं। बल्कि, वह महिमावान् उसे जानता है और उन्हें उसका बदला देगा।

وَلَئِنْ أَتَيْتَ ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْكِتَـٰبَ بِكُلِّ ءَايَةٍۢ مَّا تَبِعُوا۟ قِبْلَتَكَ ۚ وَمَآ أَنتَ بِتَابِعٍۢ قِبْلَتَهُمْ ۚ وَمَا بَعْضُهُم بِتَابِعٍۢ قِبْلَةَ بَعْضٍۢ ۚ وَلَئِنِ ٱتَّبَعْتَ أَهْوَآءَهُم مِّنۢ بَعْدِ مَا جَآءَكَ مِنَ ٱلْعِلْمِ ۙ إِنَّكَ إِذًۭا لَّمِنَ ٱلظَّـٰلِمِينَ ﴿١٤٥﴾

अल्लाह की क़सम! (ऐ नबी!) यदि आप उन यहूदियों और ईसाइयों के पास जिन्हें किताब दी गई थी, इस बात पर हर प्रकार की निशानी और प्रमाण ले आएँ कि क़िबला का बदलना सत्य है; तब भी वे आपके क़िबले की ओर रुख नहीं करेंगे, उसके प्रति हठ करके जो आप लेकर आए हैं तथा सत्य का पालन करने से अहंकार करते हुए। तथा आप उनके क़िबले की ओर मुख करने वाले नहीं हैं जबकि अल्लाह ने आपको उससे फे र दिया है। तथा वे स्वयं परस्पर एक-दूसरे के क़िबले की ओर रुख़ करने वाले नहीं हैं; क्योंकि उनमें से प्रत्येक दूसरे समूह को काफ़िर कहता है। यदि आपने क़िबला तथा अन्य नियमों और विधानों के बारे में इन लोगों की इच्छाओं का पालन किया, इसके बाद कि आपके पास सही ज्ञान आ चुका है, जिसमें कोई संदेह नहीं; तो निश्चय आप उस समय हिदायत को छोड़ने तथा इच्छा का अनुसरण करने के कारण, अत्याचारियों में से हो जाएँगे। यहाँ नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को संबोधित करने का मक़सद अह्ले किताब का पालन करने की बुराई (कुरूपता) को दर्शाना है। अन्यथा, अल्लाह ने अपने नबी को उससे सुरक्षित रखा है। इसलिए यह आपके बाद आपकी उम्मत के लिए एक चेतावनी है।

ٱلَّذِينَ ءَاتَيْنَـٰهُمُ ٱلْكِتَـٰبَ يَعْرِفُونَهُۥ كَمَا يَعْرِفُونَ أَبْنَآءَهُمْ ۖ وَإِنَّ فَرِيقًۭا مِّنْهُمْ لَيَكْتُمُونَ ٱلْحَقَّ وَهُمْ يَعْلَمُونَ ﴿١٤٦﴾

यहूदियों और ईसाइयों के विद्वानों में से जिन्हें हमने किताब दी थी; वे क़िबला के बदलने की बात को, जो कि उनके निकट मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की नुबुव्वत की निशानियों में से है, बिल्कु ल वैसे ही जानते हैं, जैसे अपने बच्चों को जानते हैं और उन्हें दूसरों से अलग करते हैं। फिर भी उनमें से एक समूह, अपनी ओर से ईर्ष्या करते हुए, उससत्य को छिपाता है, जो आप लाए हैं। वे यह जानते हुए भी ऐसा करते हैं कि यह सच है। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

ٱلْحَقُّ مِن رَّبِّكَ ۖ فَلَا تَكُونَنَّ مِنَ ٱلْمُمْتَرِينَ ﴿١٤٧﴾

यही आपके पालनहार की और से सत्य है। अतः (ऐ रसूल!) आप कदापि इसकी प्रामाणिकता पर संदेह करने वालों में से न हों।

وَلِكُلٍّۢ وِجْهَةٌ هُوَ مُوَلِّيهَا ۖ فَٱسْتَبِقُوا۟ ٱلْخَيْرَٰتِ ۚ أَيْنَ مَا تَكُونُوا۟ يَأْتِ بِكُمُ ٱللَّهُ جَمِيعًا ۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرٌۭ ﴿١٤٨﴾

हर क़ौम की कोई न कोई दिशा होती है, जिसकी ओर वह रुख करती है, चाहे वह दिशा इंद्रियगोचर हो या अगोचर (अभौतिक) हो। यही कारण है कि अलग-अलग समुदायों के अलग-अलग क़िबले और शरई प्रावधान हैं। इसलिए उनकी दिशाओं की विविधता से कोई नुक़सान नहीं, यदि वह अल्लाह के आदेश और उसकी शरीयत के अनुसार है। अतः - ऐ मोमिनो! - उन अच्छे कामों को करने में एक-दूसरे से आगे बढ़ो, जिन्हें करने का तुम्हें आदेश दिया गया है। तथा तुम जहाँ भी होगे, वहाँ से क़ियामत के दिन अल्लाह तुम्हें इकट्ठा करेगा; ताकि तुम्हें तुम्हारे कार्यों का बदला दे। निःसंदेह अल्लाह हर चीज़ का सामर्थ्य रखता है। अतः उसका तुम्हें इकट्ठा करना और बदला देना उसे विवश नहीं कर सकता।

وَمِنْ حَيْثُ خَرَجْتَ فَوَلِّ وَجْهَكَ شَطْرَ ٱلْمَسْجِدِ ٱلْحَرَامِ ۖ وَإِنَّهُۥ لَلْحَقُّ مِن رَّبِّكَ ۗ وَمَا ٱللَّهُ بِغَـٰفِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ ﴿١٤٩﴾

तथा (ऐ नबी!) आप और आपके अनुयायी जहाँ से भी निकलें और जिस स्थान पर भी हों और नमाज़ का इरादा करें, तो अपना चेहरा सम्मानित मस्जिद (काबा शरीफ़) की ओर कर लें। क्योंकि यही सत्य है जिसकी आपके रब ने आपकी ओर वह़्य की है। और तुम जो कु छ करते हो, अल्लाह उससे अनजान नहीं है, बल्कि वह उसके बारे में खू़ ब जानता है और तुम्हें उसका बदल देगा।

وَمِنْ حَيْثُ خَرَجْتَ فَوَلِّ وَجْهَكَ شَطْرَ ٱلْمَسْجِدِ ٱلْحَرَامِ ۚ وَحَيْثُ مَا كُنتُمْ فَوَلُّوا۟ وُجُوهَكُمْ شَطْرَهُۥ لِئَلَّا يَكُونَ لِلنَّاسِ عَلَيْكُمْ حُجَّةٌ إِلَّا ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ مِنْهُمْ فَلَا تَخْشَوْهُمْ وَٱخْشَوْنِى وَلِأُتِمَّ نِعْمَتِى عَلَيْكُمْ وَلَعَلَّكُمْ تَهْتَدُونَ ﴿١٥٠﴾

(ऐ नबी!) आप जिस स्थान से भी निकलें और नमाज़ पढ़ना चाहें, तो अपना चेहरा मस्जिदे-ह़राम की ओर कर लें। तथा - ऐ मोमिनो! - तुम जिस स्थान पर भी हो, तो अगर तुमनमाज़ पढ़ना चाहो, तो अपने चेहरे उसी की दिशा में कर लो; ताकि लोगों के पासकोई तर्क (हुज्जत) न रहे जिसके द्वारा वे तुमसे वाद-विवाद करें, सिवाय उन लोगों के जिन्होंने उनमें से अत्याचार किया। क्योंकि वे अपने हठ पर बने रहेंगे और तुम्हारे विरुद्ध कमज़ोर से कमज़ोर तर्क के साथ बहस करेंगे। अतः उनसे मत डरो और अकेले अपने पालनहार से डरो, उसके आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर। क्योंकि अल्लाह ने काबा की ओर चेहरा करने का नियमइसलिए बनाया है, ताकि तुम्हें शेष सारी क़ौमों से उत्कृ ष्टकरके तुमपर अपनी नेमत पूरी करे और ताकि लोगों के लिए सबसे सम्माननीय क़िबला की ओर तुम्हारा मार्गदर्शन करे।

كَمَآ أَرْسَلْنَا فِيكُمْ رَسُولًۭا مِّنكُمْ يَتْلُوا۟ عَلَيْكُمْ ءَايَـٰتِنَا وَيُزَكِّيكُمْ وَيُعَلِّمُكُمُ ٱلْكِتَـٰبَ وَٱلْحِكْمَةَ وَيُعَلِّمُكُم مَّا لَمْ تَكُونُوا۟ تَعْلَمُونَ ﴿١٥١﴾

تعلمون इसी तरह हमने तुम्हें एक और नेमत प्रदान की; कि हमने तुम्हारी ओर तुम्हारे बीच से एक रसूल भेजा, जो तुम्हें हमारी आयतें पढ़कर सुनाता है, तुम्हें अच्छाइयों तथा भली बात का आदेश देकर और घृणित चीज़ों तथा बुरी बात से मनाही करके पवित्र करता है, तथा तुम्हें क़ुरआन और सुन्नत सिखाता है और तुम्हें तुम्हारे धर्म एवं संसार के मामलों के बारे में ऐसी बातें सिखाता है, जो तुम नहीं जानते थे।

فَٱذْكُرُونِىٓ أَذْكُرْكُمْ وَٱشْكُرُوا۟ لِى وَلَا تَكْفُرُونِ ﴿١٥٢﴾

तुममुझे अपने दिलों और शारीरिक अंगों द्वारा याद करो; मैं तुम्हारी प्रशंसा करके और तुम्हें संरक्षण प्रदान करके तुम्हें याद रखूँगा। क्योंकि बदला कार्य के समान ही मिलता है। तथा मेरी उन नेमतों का शुक्रिया अदा करो, जो मैंने तुम्हें प्रदान की हैं, और उनका इनकार करके और उन्हें हराम चीज़ों में इस्तेमाल करके मेरी नाशुक्री न करो।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱسْتَعِينُوا۟ بِٱلصَّبْرِ وَٱلصَّلَوٰةِ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ مَعَ ٱلصَّـٰبِرِينَ ﴿١٥٣﴾

ऐ ईमान वालो! धैर्य तथा नमाज़ के साथ मेरी आज्ञाकारिता करने और मेरे आदेश के प्रति समर्पित होने में मदद हासिल करो। निश्चय अल्लाह धैर्य रखने वालों के साथ है, उन्हें सामर्थ्य प्रदान करता तथा उनकी सहायता करता है। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

وَلَا تَقُولُوا۟ لِمَن يُقْتَلُ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ أَمْوَٰتٌۢ ۚ بَلْ أَحْيَآءٌۭ وَلَـٰكِن لَّا تَشْعُرُونَ ﴿١٥٤﴾

(ऐ मोमिनो!) तुमउनके बारे में जो अल्लाह के मार्ग में जिहाद के कारण मारे जाएँ, यह मत कहो: वे मर गए, जैसे उनके अलावा दूसरे लोग मरते हैं। बल्कि, वे अपने रब के पास जीवित हैं। लेकिन तुमउनके जीवन का एहसासनहीं करते; क्योंकि वह एक विशिष्ट जीवन है, जिसे जानने का एकमात्र तरीक़ा अल्लाह की वह़्य है।

وَلَنَبْلُوَنَّكُم بِشَىْءٍۢ مِّنَ ٱلْخَوْفِ وَٱلْجُوعِ وَنَقْصٍۢ مِّنَ ٱلْأَمْوَٰلِ وَٱلْأَنفُسِ وَٱلثَّمَرَٰتِ ۗ وَبَشِّرِ ٱلصَّـٰبِرِينَ ﴿١٥٥﴾

हम अनेक प्रकार की विपत्तियों के साथ तुम्हें ज़रूर आज़माएँगे; अपने दुश्मनों के कु छ भय के साथ, भोजन की कमी के कारण भूख के साथ, धन के समाप्त हो जाने या उसे प्राप्त करने की कठिनाई के कारण धन की कमी के साथ, लोगों को नष्ट करने वाली आपदाओं के कारण या अल्लाह के मार्ग में शहीद होने के कारण जानों के नुक़सान के साथ, तथा उन फलों की कमी के साथ जिन्हें धरती उगाती है। ऐसे में - ऐ नबी! - इन विपत्तियों पर धैर्य रखने वालों को उस चीज़ की शुभ सूचना सुना दें, जिससे उन्हें दुनिया एवं आख़िरत में प्रसन्नता हासिल होगी।

ٱلَّذِينَ إِذَآ أَصَـٰبَتْهُم مُّصِيبَةٌۭ قَالُوٓا۟ إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّآ إِلَيْهِ رَٰجِعُونَ ﴿١٥٦﴾

जब उनपर इन विपत्तियों में से कोई विपत्ति आती है, तो वे अल्लाह के निर्णय के प्रति संतोष और समर्पण के साथ कहते हैं: निःसंदेह हम अल्लाह के हैं, वह हमारे साथ जैसा चाहता है, व्यवहार करता है। तथा निःसंदेह हम क़ियामत के दिन उसी की ओर लौटने वाले हैं। क्योंकि उसी ने हमें पैदा किया और हमें विभिन्न प्रकार की नेमतें प्रदान कीं, तथा उसी की तरफ़ हमारा लौटना और हमारे मामले का अंत है।

أُو۟لَـٰٓئِكَ عَلَيْهِمْ صَلَوَٰتٌۭ مِّن رَّبِّهِمْ وَرَحْمَةٌۭ ۖ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْمُهْتَدُونَ ﴿١٥٧﴾

इस विशेषता के मालिक लोगों के लिए फ़रिश्तों की सर्वोच्च सभा में अल्लाह की ओर से प्रशंसा है, तथा उनपर रहमत उतरती है और यही लोग सत्य के मार्ग पर निर्देशित हैं।

۞ إِنَّ ٱلصَّفَا وَٱلْمَرْوَةَ مِن شَعَآئِرِ ٱللَّهِ ۖ فَمَنْ حَجَّ ٱلْبَيْتَ أَوِ ٱعْتَمَرَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِ أَن يَطَّوَّفَ بِهِمَا ۚ وَمَن تَطَوَّعَ خَيْرًۭا فَإِنَّ ٱللَّهَ شَاكِرٌ عَلِيمٌ ﴿١٥٨﴾

काबा के पास सफ़ा और मरवा के नाम से जानी जाने वाली दो पहाड़ियाँ, शरीयत के दृश्य स्थलों में से हैं। इसलिए जो हज्ज अथवा उम्रा के लिए काबा पहुँचे; उसपर कोई पाप नहीं कि वह इन दोनों के बीच दौड़ लगाए। यहाँ पाप का इनकार करने में उन मुसलमानों के लिए आश्वासन है, जो इन दोनों के बीच दौड़ लगाने को जाहिलिय्यत (पूर्व- इस्लामी युग) का काम समझकर गुनाह समझते थे। चुनाँचे अल्लाह ने स्पष्ट कर दिया कि यह हज्ज के अनुष्ठानों में से है। जो भी व्यक्ति स्वेच्छा से निष्ठापूर्वक मुस्तहब आज्ञाकारिता का कार्य करे; अल्लाह उसकी क़द्र करने वाला है, उसे उससे स्वीकार करेगा और उसे उसपर बदला देगा। वह उसके बारे में जानने वाला है, जो अच्छा काम करता है और सवाब का हक़दार है।

إِنَّ ٱلَّذِينَ يَكْتُمُونَ مَآ أَنزَلْنَا مِنَ ٱلْبَيِّنَـٰتِ وَٱلْهُدَىٰ مِنۢ بَعْدِ مَا بَيَّنَّـٰهُ لِلنَّاسِ فِى ٱلْكِتَـٰبِ ۙ أُو۟لَـٰٓئِكَ يَلْعَنُهُمُ ٱللَّهُ وَيَلْعَنُهُمُ ٱللَّـٰعِنُونَ ﴿١٥٩﴾

यहूदियों, ईसाइयों और अन्य लोगों में से जो लोग नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके लाए हुए संदेश की सच्चाई को दर्शाने वाले स्पष्ट प्रमाणों को छिपाते हैं, इसके बाद कि हमने उन्हें उनकी किताबों में लोगों के लिए खोलकर बयान कर दिया है; वे ऐसे लोग हैं जिन्हें अल्लाह अपनी दया से निष्कासित कर देता है। साथ ही फ़रिश्ते, नबी गण और सभी लोग यह दुआ करते हैं कि अल्लाह उन्हें अपनी रहमत से निष्कासित कर दे।

إِلَّا ٱلَّذِينَ تَابُوا۟ وَأَصْلَحُوا۟ وَبَيَّنُوا۟ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ أَتُوبُ عَلَيْهِمْ ۚ وَأَنَا ٱلتَّوَّابُ ٱلرَّحِيمُ ﴿١٦٠﴾

परंतु जो लोग उन स्पष्ट निशानियों को छिपाने पर पछतावा करते हुए अल्लाह की ओर लौट आए, तथा अपने बाहरी और आंतरिक कार्यों को सुधार लिया और उन्होंने जो सच्चाई और मार्गदर्शन छु पाया था, उन्हें स्पष्ट कर दिया; तो ऐसे लोगों की मैं अपनी आज्ञाकारिता की ओर वापसी को स्वीकार करता हूँ, और मैं तौबा करने वाले बंदों की بلغ क़ुरआन · तफ़सीर तौबा क़बूल करने वाला, उनपर दया करने वाला हूँ।

إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ وَمَاتُوا۟ وَهُمْ كُفَّارٌ أُو۟لَـٰٓئِكَ عَلَيْهِمْ لَعْنَةُ ٱللَّهِ وَٱلْمَلَـٰٓئِكَةِ وَٱلنَّاسِ أَجْمَعِينَ ﴿١٦١﴾

निःसंदेह जिन लोगों ने कु फ़्र किया और उससे तौबा करने से पहले कु फ़्र ही की अवस्था में मर गए, तो ऐसे लोगों पर अल्लाह का यह अभिशाप है कि उन्हें अपनी दया से निष्कासित कर देता है, तथा फ़रिश्तों और सभी लोगों का उनपर यह श्राप है कि अल्लाह उन्हें अपनी दया से निष्कासित और दूर कर दे।

خَـٰلِدِينَ فِيهَا ۖ لَا يُخَفَّفُ عَنْهُمُ ٱلْعَذَابُ وَلَا هُمْ يُنظَرُونَ ﴿١٦٢﴾

वे इसी लानत (अभिशाप) से पीड़ित रहेंगे, उनकी यातना एक दिन के लिए भी कम नहीं होगी और न उन्हें क़ियामत के दिन मोहलत दी जाएगी।

وَإِلَـٰهُكُمْ إِلَـٰهٌۭ وَٰحِدٌۭ ۖ لَّآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ٱلرَّحْمَـٰنُ ٱلرَّحِيمُ ﴿١٦٣﴾

(ऐ लोगो!) तुम्हारा सच्चा मा'बूद एक ही है, जो अपने अस्तित्व और गुणों में अद्वितीय है, उसके अलावा कोई सच्चा मा'बूद नहीं। वह अत्यंत दयावान् विशाल दया वाला, अपने बंदों पर असीमदयालु है। क्योंकि उसने उन्हें अनगिनत नेमतें प्रदान की हैं।

إِنَّ فِى خَلْقِ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَٱخْتِلَـٰفِ ٱلَّيْلِ وَٱلنَّهَارِ وَٱلْفُلْكِ ٱلَّتِى تَجْرِى فِى ٱلْبَحْرِ بِمَا يَنفَعُ ٱلنَّاسَ وَمَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مِن مَّآءٍۢ فَأَحْيَا بِهِ ٱلْأَرْضَ بَعْدَ مَوْتِهَا وَبَثَّ فِيهَا مِن كُلِّ دَآبَّةٍۢ وَتَصْرِيفِ ٱلرِّيَـٰحِ وَٱلسَّحَابِ ٱلْمُسَخَّرِ بَيْنَ ٱلسَّمَآءِ وَٱلْأَرْضِ لَـَٔايَـٰتٍۢ لِّقَوْمٍۢ يَعْقِلُونَ ﴿١٦٤﴾

له ء निःसंदेह आसमानों और ज़मीन की रचना और उनमें उपस्थित अद्भुत प्राणियों में, तथा रात और दिन के एक-दूसरे के पश्चात आने-जाने में, तथा उन कश्तियों में जो लोगों को लाभ पहुँचाने वाले भोजन, वस्त्र, व्यापार और अन्य आवश्यकता की चीज़ों को लेकर समुद्र के पानी में दौड़ती हैं, तथा उस पानी में जो अल्लाह ने आसमान से उतारा, फिर उसके द्वारा धरती को उसमें उगने वाली फसलों और पौधों (घास) के द्वारा पुनर्जीवित किया। तथा धरती के ऊपर जीवित प्राणियों को फैलाने में, तथा एक तरफ़ से दूसरी तरफ़ हवाओं के फे रने में, तथा धरती और आकाश के बीच वशीभूत किए हुए बादलों में; निश्चय इन सब में उन लोगों के लिए अल्लाह के एकत्व (एके श्वरवाद) के स्पष्ट संके त (प्रमाण) हैं, जो तर्कोंبऔर प्रमाणों को समझते हैं।

وَمِنَ ٱلنَّاسِ مَن يَتَّخِذُ مِن دُونِ ٱللَّهِ أَندَادًۭا يُحِبُّونَهُمْ كَحُبِّ ٱللَّهِ ۖ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ أَشَدُّ حُبًّۭا لِّلَّهِ ۗ وَلَوْ يَرَى ٱلَّذِينَ ظَلَمُوٓا۟ إِذْ يَرَوْنَ ٱلْعَذَابَ أَنَّ ٱلْقُوَّةَ لِلَّهِ جَمِيعًۭا وَأَنَّ ٱللَّهَ شَدِيدُ ٱلْعَذَابِ ﴿١٦٥﴾

ه इन स्पष्ट निशानियों के बावजूद, कु छ लोग ऐसे हैं, जो अल्लाह के अलावा कु छ पूज्य ठहराकर उन्हें अल्लाह का समकक्ष बना लेते हैं, जिनसे वे वैसा ही प्रेम करते हैं जैसा प्रेम अल्लाह से करते हैं। परंतु जो लोग ईमान लाए, वे अल्लाह से इन लोगों के अपने पूज्यों (देवताओं) से प्रेम करने से कहीं बढ़कर प्रेम करने वाले होते हैं। क्योंकि वे अल्लाह के साथ किसी को साझी नहीं बनाते, तथा वे समृद्धि और विपत्ति दोनों में उससे प्रेमकरते हैं। जबकि इन लोगों का हालयह है कि वे के वलसमृद्धि में अपने पूज्यों से प्रेमकरते हैं, लेकिन विपत्ति में के वलअल्लाह को पुकारते हैं। यदि अपने शिर्क और बुरे कर्मों के द्वारा अत्याचार करने वाले आख़िरत में अपनी स्थिति को देख लें जब वे अज़ाब को देखेंगे; तो जान लें कि सर्वशक्तिमान के वल अल्लाह ही है तथा वह अपने अवज्ञाकारियों को कठिन यातना देने वाला है। यदि ये लोग उस स्थिति को देख लेते, तो अल्लाह के साथ किसी को साझी न बनाते।

إِذْ تَبَرَّأَ ٱلَّذِينَ ٱتُّبِعُوا۟ مِنَ ٱلَّذِينَ ٱتَّبَعُوا۟ وَرَأَوُا۟ ٱلْعَذَابَ وَتَقَطَّعَتْ بِهِمُ ٱلْأَسْبَابُ ﴿١٦٦﴾

यह उस समय होगा जब अनुसरण किए गए सरदार उन कमज़ोरों से अलग हो जाएँगे जिन्होंने उनका अनुसरण किया था; क्योंकि वे क़ियामत के दिन की भयावहता और उसकी कठिनाइयों को देख रहे होंगे, तथा मुक्ति के सभी कारण और साधन उनसे कट जाएँगे। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

وَقَالَ ٱلَّذِينَ ٱتَّبَعُوا۟ لَوْ أَنَّ لَنَا كَرَّةًۭ فَنَتَبَرَّأَ مِنْهُمْ كَمَا تَبَرَّءُوا۟ مِنَّا ۗ كَذَٰلِكَ يُرِيهِمُ ٱللَّهُ أَعْمَـٰلَهُمْ حَسَرَٰتٍ عَلَيْهِمْ ۖ وَمَا هُم بِخَـٰرِجِينَ مِنَ ٱلنَّارِ ﴿١٦٧﴾

तथा कमज़ोर और अनुयायी लोग कहेंगे: काश! हमें दुनिया में वापस जाने का एक अवसर मिल जाता, तो हम भी अपने पेशवाओं से उसी तरह बिल्कु ल अलग हो जाते, जैसे वे आज हमसे बिल्कुल अलग हो गए। जिस तरह अल्लाह ने उन्हें आख़िरत में कठिन यातना दिखाई है, उन्हें उनके पेशवाओं का असत्य पर अनुसरण करने का परिणाम पछतावेوऔर दुखों के रूप में दिखाएगा, और वे कभी भी आग (जहन्नम) से बाहर नहीं आएँगे।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ كُلُوا۟ مِمَّا فِى ٱلْأَرْضِ حَلَـٰلًۭا طَيِّبًۭا وَلَا تَتَّبِعُوا۟ خُطُوَٰتِ ٱلشَّيْطَـٰنِ ۚ إِنَّهُۥ لَكُمْ عَدُوٌّۭ مُّبِينٌ ﴿١٦٨﴾

ऐ लोगो! धरती में मौजूद चीज़ों जैसे जानवरों, पौधों और पेड़ों में से खाओ, जिसकी कमाई हलालहो और वह अपने आप में अच्छी हो, बुरी (अशुद्ध) न हो। तथा शैतान के उन रास्तों पर मत चलो, जिनके द्वारा वह तुम्हें लुभाता है। क्योंकि वह तुम्हारा एक ऐसा शत्रु है जिसकी शत्रुता स्पष्ट है। और एक समझदार व्यक्ति के लिए अपने शत्रु का अनुसरण करना जायज़ नहीं है, जो उसे नुक़सान पहुँचाने और गुमराह करने का लोभी होता है!

إِنَّمَا يَأْمُرُكُم بِٱلسُّوٓءِ وَٱلْفَحْشَآءِ وَأَن تَقُولُوا۟ عَلَى ٱللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ ﴿١٦٩﴾

वह के वल तुम्हें बुरे पापों तथा बड़े एवं गंभीर गुनाहों का आदेश देता है और यह कि तुम अक़ीदे और शरीयत के नियमों के संबंध में अल्लाह पर कोई बात कहो, जिसके बारे में तुम्हारे पासअल्लाह या उसके रसूलकी तरफ़ से कोई ज्ञान न आया हो।

وَإِذَا قِيلَ لَهُمُ ٱتَّبِعُوا۟ مَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ قَالُوا۟ بَلْ نَتَّبِعُ مَآ أَلْفَيْنَا عَلَيْهِ ءَابَآءَنَآ ۗ أَوَلَوْ كَانَ ءَابَآؤُهُمْ لَا يَعْقِلُونَ شَيْـًۭٔا وَلَا يَهْتَدُونَ ﴿١٧٠﴾

ولا يهتدون जब इन काफ़िरों से कहा जाता है कि उस मार्गदर्शन और प्रकाश का अनुसरण करो, जो अल्लाह ने उतारा है, तो वे हठ करते हुए कहते हैं: बल्कि हम उन मान्यताओं और परंपराओं का अनुसरण करेंगे, जिनपर हमने अपने बाप-दादा को पाया है। क्या वे अपने बाप-दादा का अनुसरण करेंगे, यद्यपि वे मार्गदर्शन और प्रकाश के बारे में कु छ भी न समझते हों, और न ही वे उस सत्य की ओर मार्गदर्शन पाते हों, जिससे अल्लाह प्रसन्न होता है?!

وَمَثَلُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ كَمَثَلِ ٱلَّذِى يَنْعِقُ بِمَا لَا يَسْمَعُ إِلَّا دُعَآءًۭ وَنِدَآءًۭ ۚ صُمٌّۢ بُكْمٌ عُمْىٌۭ فَهُمْ لَا يَعْقِلُونَ ﴿١٧١﴾

अपने बाप-दादा का अनुसरण करने में काफ़िरों का उदाहरण उस चरवाहे के समान है, जो अपने पशुओं को आवाज़ देता है, तो वे (पशु) उसकी आवाज़ तो सुनते हैं, परंतु उसकी बात नहीं समझते हैं। इसी तरह, वे (काफ़िर) सत्य को इस प्रकार सुनने से बहरे हैं कि उसका लाभ उठा सकें , गूंगे हैं, उनकी ज़बानें सच बोलने से मूक हैं, तथा सत्य को देखने से अंधे हैं। इसलिए वे उसमार्गदर्शन को नहीं समझते हैं जिसकी ओर आप उन्हें बुला रहे हैं।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ كُلُوا۟ مِن طَيِّبَـٰتِ مَا رَزَقْنَـٰكُمْ وَٱشْكُرُوا۟ لِلَّهِ إِن كُنتُمْ إِيَّاهُ تَعْبُدُونَ ﴿١٧٢﴾

ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! उन अच्छी चीजों में से खाओ जो अल्लाह ने तुम्हें प्रदान की हैं और तुम्हारे लिए उन्हें अनुमेय किया है। तथा बाहरी और आंतरिक रूप से उन नेमतों के लिए अल्लाह का शुक्र अदा करो, जो उसने तुम्हें प्रदान की हैं। उसका शुक्र अदा करने में यह भी शामिलहै कि उसकी आज्ञा का पालन करो तथा उसकी अवज्ञा से बचो, यदि तुम वास्तव में अके ले उसी की इबादत करते हो और उसके साथ किसी को साझी नहीं बनाते हो।

إِنَّمَا حَرَّمَ عَلَيْكُمُ ٱلْمَيْتَةَ وَٱلدَّمَ وَلَحْمَ ٱلْخِنزِيرِ وَمَآ أُهِلَّ بِهِۦ لِغَيْرِ ٱللَّهِ ۖ فَمَنِ ٱضْطُرَّ غَيْرَ بَاغٍۢ وَلَا عَادٍۢ فَلَآ إِثْمَ عَلَيْهِ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌ ﴿١٧٣﴾

अल्लाह ने तुमपर के वल ये खाने की चीज़ें हराम की हैं: वह जानवर जो शरई तरीक़े से ज़बह किए बिना मर जाए, बहता खून, सूअर का माँस और वह जानवर जिसे ज़बह करते समय अल्लाह के सिवा किसी और का नाम लिया गया हो। लेकिन यदि आदमी इनमें से कोई वस्तु खाने पर मजबूर हो जाए, जबकि वह उनमें से बिना आवश्यकता के खाकर अत्याचार करने वाला और ज़रूरत की सीमा से आगे बढ़ने वाला नहीं है; तो उसपर कोई दोष तथा दंड नहीं है। निःसंदेह अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों بلغ क़ुरआन · तफ़सीर को क्षमा करने वाला, उनपर दया करने वाला है। उसकी दया में से यह भी है कि उसने मजबूरी की हालत में इन हराम वस्तुओं को खाने की अनुमति प्रदान की है।

إِنَّ ٱلَّذِينَ يَكْتُمُونَ مَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ مِنَ ٱلْكِتَـٰبِ وَيَشْتَرُونَ بِهِۦ ثَمَنًۭا قَلِيلًا ۙ أُو۟لَـٰٓئِكَ مَا يَأْكُلُونَ فِى بُطُونِهِمْ إِلَّا ٱلنَّارَ وَلَا يُكَلِّمُهُمُ ٱللَّهُ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ وَلَا يُزَكِّيهِمْ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ ﴿١٧٤﴾

निःसंदेह जो लोग अल्लाह की उतारी हुई किताबों और उनमें मौजूद सत्य और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की नुबुव्वत के संके त (प्रमाण) को छिपाते हैं, जैसा कि यहूदी और ईसाई करते हैं, तथा वे इसे छिपाकर थोड़ा मुआवज़ा जैसे सरदारी, या पद (प्रतिष्ठा), या धन प्राप्त करते हैं; वे वास्तव में अपने पेटों में इसके सिवा कुछ नहीं खाते जो उनके आग से यातना दिए जाने का कारण होगा। तथा अल्लाह क़ियामत के दिन उनसे ऐसी बात नहीं करेगा, जो उन्हें पसंद हो, बल्कि ऐसी बात करेगा जो उन्हें बुरी लगे। तथा न उन्हें पवित्र करेगा और न उनकी प्रशंसा करेगा और उनके लिए दर्दनाक यातना है।

أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ ٱشْتَرَوُا۟ ٱلضَّلَـٰلَةَ بِٱلْهُدَىٰ وَٱلْعَذَابَ بِٱلْمَغْفِرَةِ ۚ فَمَآ أَصْبَرَهُمْ عَلَى ٱلنَّارِ ﴿١٧٥﴾

जिन लोगों की विशेषता उस ज्ञान को छिपाना है जिसकी लोगों को आवश्यकता होती है, वही लोग हैं, जिन्होंने सच्चे ज्ञान को छिपाने के कारण हिदायत के बदले गुमराही और अल्लाह की क्षमा के बदले उसकी यातना को अपना लिया। तो ये लोग ऐसे कार्य को करने पर कितना धैर्य रखने वाले हैं, जो उनके लिए जहन्नम में प्रवेश करने का कारण बनता है, मानो कि वे उसमें पाई जाने वाली यातना की परवाह नहीं करते हैं, इस कारण उसपर धैर्य से काम ले रहे हैं।

ذَٰلِكَ بِأَنَّ ٱللَّهَ نَزَّلَ ٱلْكِتَـٰبَ بِٱلْحَقِّ ۗ وَإِنَّ ٱلَّذِينَ ٱخْتَلَفُوا۟ فِى ٱلْكِتَـٰبِ لَفِى شِقَاقٍۭ بَعِيدٍۢ ﴿١٧٦﴾

ज्ञान और मार्गदर्शन को छिपाने का यह दंड इस कारण है कि अल्लाह ने ईश्वरीय पुस्तकों को सत्य के साथ उतारा है और इसकी अपेक्षा यह है कि उन्हें स्पष्ट किया जाए, न कि छिपाया जाए। निःसंदेह जिन लोगों ने ईश्वरीय पुस्तकों में मतभेद किया, चुनाँचे उनमें से कु छ पर ईमान लाए और उनमें से कु छ को छिपाया, निश्चय वे सत्य से बहुत दूर और विरोध में हैं।

۞ لَّيْسَ ٱلْبِرَّ أَن تُوَلُّوا۟ وُجُوهَكُمْ قِبَلَ ٱلْمَشْرِقِ وَٱلْمَغْرِبِ وَلَـٰكِنَّ ٱلْبِرَّ مَنْ ءَامَنَ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ وَٱلْمَلَـٰٓئِكَةِ وَٱلْكِتَـٰبِ وَٱلنَّبِيِّـۧنَ وَءَاتَى ٱلْمَالَ عَلَىٰ حُبِّهِۦ ذَوِى ٱلْقُرْبَىٰ وَٱلْيَتَـٰمَىٰ وَٱلْمَسَـٰكِينَ وَٱبْنَ ٱلسَّبِيلِ وَٱلسَّآئِلِينَ وَفِى ٱلرِّقَابِ وَأَقَامَ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتَى ٱلزَّكَوٰةَ وَٱلْمُوفُونَ بِعَهْدِهِمْ إِذَا عَـٰهَدُوا۟ ۖ وَٱلصَّـٰبِرِينَ فِى ٱلْبَأْسَآءِ وَٱلضَّرَّآءِ وَحِينَ ٱلْبَأْسِ ۗ أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ صَدَقُوا۟ ۖ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْمُتَّقُونَ ﴿١٧٧﴾

ى ى و अल्लाह के निकट पसंदीदा नेकी के वल पूर्व या पश्चिम की ओर मुँह कर लेना और उसके बारे में मतभेद करना नहीं है। बल्कि सारी की सारी अच्छाई उस व्यक्ति में है, जो अल्लाह पर उसे एकमात्र पूज्य मानते हुए ईमान लाए, तथा क़ियामत के दिन पर और सभी फ़रिश्तों पर, और सभी अवतरित की गई किताबों पर और सभी नबियों पर बिना किसी भेदभाव के ईमान लाए, तथा धन खर्च करे उसके मोह और लोभ के बावजूद अपने रिश्तेदारों पर, तथा व्यस्क होने से पहले अपने पिता को खो देने वाले पर, ज़रूरतमंदों, अपने परिवार और स्वदेश से कट जाने वाले परदेशी और उन लोगों पर जिन्हें किसी आवश्यकता के कारण लोगों से माँगना पड़ जाता है। तथा गुलामी और क़ै द से गर्दनों को छु ड़ाने में पैसा खर्च करे। तथा अल्लाह की आज्ञा के अनुसार पूरी तरह से नमाज़ अदा करे, और अनिवार्य ज़कात का भुगतान करे। इसी तरह वे लोग, जो यदि वचन देते हैं तो अपने वचन को पूरा करते हैं, और जो लोग ग़रीबी और कठिनाई पर तथा बीमारी पर और भीषण युद्ध के समय धैर्य से काम लेते हैं, चुनाँचे वे भागते नहीं हैं। जो लोग इन विशेषताओं से सुसज्जित हैं, वही लोग हैं जो अपने ईमान और कर्मों में अल्लाह के प्रति सच्चे हैं, और वही परहेज़गार लोग हैं, जिन्होंने अल्लाह के आदेशों का पालन किया और उसकी मना की हुई चीज़ों से परहेज़ किया। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ كُتِبَ عَلَيْكُمُ ٱلْقِصَاصُ فِى ٱلْقَتْلَى ۖ ٱلْحُرُّ بِٱلْحُرِّ وَٱلْعَبْدُ بِٱلْعَبْدِ وَٱلْأُنثَىٰ بِٱلْأُنثَىٰ ۚ فَمَنْ عُفِىَ لَهُۥ مِنْ أَخِيهِ شَىْءٌۭ فَٱتِّبَاعٌۢ بِٱلْمَعْرُوفِ وَأَدَآءٌ إِلَيْهِ بِإِحْسَـٰنٍۢ ۗ ذَٰلِكَ تَخْفِيفٌۭ مِّن رَّبِّكُمْ وَرَحْمَةٌۭ ۗ فَمَنِ ٱعْتَدَىٰ بَعْدَ ذَٰلِكَ فَلَهُۥ عَذَابٌ أَلِيمٌۭ ﴿١٧٨﴾

ى ذلك فلهعذاب أليم ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! उन लोगों के मामले में जो जानबूझकर और आक्रामकता में दूसरों हत्या कर देते हैं, हत्यारे को उसके अपराध के समान दंड देना तुमपर अनिवार्य कर दिया गया है। अतः आज़ाद आदमी को आज़ाद के बदले क़त्ल किया जाएगा, ग़ुलाम को ग़ुलाम के बदले क़त्ल किया जाएगा तथा नारी को नारी के बदले क़त्ल किया जाएगा। यदि वधित व्यक्ति अपनी मृत्यु से पहले क्षमा कर दे, या उसका अभिभावक दियत - वह धनराशि जो हत्यारा अपनी क्षमा के बदले में भुगतान करता है - लेकर क्षमा कर दे, तो क्षमा करने वाले को चाहिए कि क़ातिल से दियत (रक्त धन) की माँग अच्छे तरीक़े से करे, उपकार जतलाने तथा कष्ट देने से बचे। क़ातिल को भी चाहिए कि बिना टाल-मटोल के भले तरीक़े से दियत (ख़ून-बहा) अदा कर दे। यह क्षमा करना और ख़ून-बहा लेना, तुम्हारे पालनहार की ओर से तुमपर एक आसानी और इस उम्मत पर एक दया है। फिर जो व्यक्ति क्षमा करने और ख़ून-बहा लेने के बाद क़ातिल पर अत्याचार करे; तो उसके लिए अल्लाह की ओर से एक दर्दनाक सज़ा है।

وَلَكُمْ فِى ٱلْقِصَاصِ حَيَوٰةٌۭ يَـٰٓأُو۟لِى ٱلْأَلْبَـٰبِ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ ﴿١٧٩﴾

अल्लाह ने तुम्हारे लिए क़िसास का जो नियम निर्धारित किया है, उसमें तुम्हारे लिए जीवन है; क्योंकि इससे तुम्हारे ख़ून की रक्षा होती है और तुम्हारे बीच ज़्यादती (अत्याचार) को रोका जाता है। इसे वे बुद्धि वाले लोग महसूस करते हैं, जो अल्लाह की शरीयत का पालन करके और उसके आदेश के अनुसार कार्य करके उससे डरते हैं।

كُتِبَ عَلَيْكُمْ إِذَا حَضَرَ أَحَدَكُمُ ٱلْمَوْتُ إِن تَرَكَ خَيْرًا ٱلْوَصِيَّةُ لِلْوَٰلِدَيْنِ وَٱلْأَقْرَبِينَ بِٱلْمَعْرُوفِ ۖ حَقًّا عَلَى ٱلْمُتَّقِينَ ﴿١٨٠﴾

जब तुममें से किसी की मृत्यु के लक्षण तथा कारण सामने आ जाएँ, और यदि उसने बहुत सारा धन छोड़ा है, तो उसपर माता-पिता और रिश्तेदारों के लिए शरीयत की निर्धारित की हुई मात्रा के अनुसार वसीयत करना ज़रूरी है, जो कि एक तिहाई धन से अधिक नहीं होना चाहिए। ऐसा करना उन लोगों पर एक पक्का अधिकार है जो सर्वशक्तिमान अल्लाह से डरने वाले हैं। ज्ञात रहे कि यह हुक्म मीरास की आयतें उतरने से पहले था। जब मीरास की आयतें उतरीं, तो उनके द्वारा स्पष्ट कर दिया गया कि मृतक का वारिस कौन होगा और उसे विरासत में कितना मिलेगा।

فَمَنۢ بَدَّلَهُۥ بَعْدَ مَا سَمِعَهُۥ فَإِنَّمَآ إِثْمُهُۥ عَلَى ٱلَّذِينَ يُبَدِّلُونَهُۥٓ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٌۭ ﴿١٨١﴾

फिर जो व्यक्ति वसीयत के बारे में जानने के बाद, कोई वृद्धि या कमी करके या उसे रोककर वसीयत में बदलाव कर दे; तो उस परिवर्तन का पाप परिवर्तन करने वालों पर होगा, वसीयतकर्ता पर नहीं। निःसंदेह अल्लाह अपने बंदों की बातों को सुनने वाला और उनके कार्यों को जानने वाला है। उनकी स्थितियों में से कोई चीज़ उससे छूटती नहीं है।

فَمَنْ خَافَ مِن مُّوصٍۢ جَنَفًا أَوْ إِثْمًۭا فَأَصْلَحَ بَيْنَهُمْ فَلَآ إِثْمَ عَلَيْهِ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ ﴿١٨٢﴾

जिस व्यक्ति को वसीयत करने वाले के बारे में सत्य से विचलन, या वसीयत में अन्याय (अनुचितता) का पता चले; फिर वह, वसीयतकर्ता ने जो अनुचित किया है उसे सलाह देकर उसका सुधार कर दे, तथा वसीयत के बारे में मतभेद करने वालों के बीच संधि (मेल-मिलाप) करा दे, तो उसपर कोई गुनाह नहीं है। बल्कि उसे संधि कराने का सवाब मिलेगा। निश्चय अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों को क्षमा करने वाला और उनपर दया करने वाला है।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ كُتِبَ عَلَيْكُمُ ٱلصِّيَامُ كَمَا كُتِبَ عَلَى ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ ﴿١٨٣﴾

ऐ अल्लाह पर ईमान लाने वालो और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! तुमपर तुम्हारे पालनहार की ओर से रोज़ा रखना फ़र्ज़ कर दिया गया है, जैसे तुमसे पहले समुदायों पर फ़र्ज़ किया गया था; ताकि तुम अल्लाह से डरो। अर्थात् अपने और उसके दंड के बीच अच्छे कर्मों को बचाव का साधन बना लो, और उनमें से एक महान कार्य रोज़ा रखना है। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

أَيَّامًۭا مَّعْدُودَٰتٍۢ ۚ فَمَن كَانَ مِنكُم مَّرِيضًا أَوْ عَلَىٰ سَفَرٍۢ فَعِدَّةٌۭ مِّنْ أَيَّامٍ أُخَرَ ۚ وَعَلَى ٱلَّذِينَ يُطِيقُونَهُۥ فِدْيَةٌۭ طَعَامُ مِسْكِينٍۢ ۖ فَمَن تَطَوَّعَ خَيْرًۭا فَهُوَ خَيْرٌۭ لَّهُۥ ۚ وَأَن تَصُومُوا۟ خَيْرٌۭ لَّكُمْ ۖ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ ﴿١٨٤﴾

तुमपर अनिवार्य किया गया रोज़ा यह है कि तुमवर्ष में कु छ दिनों के रोज़े रखो। तुममें से जो कोई ऐसी बीमारी से पीड़ित है जिसके साथ रोज़ा रखना मुश्किलहै, या वह एक यात्री है; तो उसके लिए रोज़ा तोड़ देना अनुमेय है, फिर वह उतने दिनों की क़ज़ा करेगा जिनके रोज़े उसने तोड़ दिए हैं। तथा जो लोग रोज़ा रखने की शक्ति रखते हैं, यदि वे रोज़ा तोड़ दें, तो उनपर फ़िदया अनिवार्य है, जो कि हर उस दिन के बदले जिसका वे रोज़ा तोड़ देते हैं, एक ग़रीब व्यक्ति को खाना खिलाना है। परंतु जो व्यक्ति एक से अधिक गरीबों को खाना खिलाए, या रोज़ा रखने के साथ खाना (भी) खिलाए, तो यह उसके लिए बेहतर है। हालाँकि, तुम्हारा रोज़ा रखना तुम्हारे लिए रोज़ा तोड़कर फ़िदया देने से बेहतर है, यदि तुम जानते हो कि रोज़े के क्या गुण हैं। ज्ञात होना चाहिए कि जब अल्लाह ने पहले पहल रोज़ा धर्मसंगत किया था, तो यही हुक्म था। चुनाँचे जो चाहता, रोज़ा रखता और जो चाहता, रोज़ा तोड़ देता और (उसके बदले) खाना खिलाता। फिर उसके बाद, अल्लाह ने रोज़े को अनिवार्य कर दिया और उसे हर व्यस्क (बालिग़) सक्षम व्यक्ति पर फ़र्ज़ क़रार दिया।

شَهْرُ رَمَضَانَ ٱلَّذِىٓ أُنزِلَ فِيهِ ٱلْقُرْءَانُ هُدًۭى لِّلنَّاسِ وَبَيِّنَـٰتٍۢ مِّنَ ٱلْهُدَىٰ وَٱلْفُرْقَانِ ۚ فَمَن شَهِدَ مِنكُمُ ٱلشَّهْرَ فَلْيَصُمْهُ ۖ وَمَن كَانَ مَرِيضًا أَوْ عَلَىٰ سَفَرٍۢ فَعِدَّةٌۭ مِّنْ أَيَّامٍ أُخَرَ ۗ يُرِيدُ ٱللَّهُ بِكُمُ ٱلْيُسْرَ وَلَا يُرِيدُ بِكُمُ ٱلْعُسْرَ وَلِتُكْمِلُوا۟ ٱلْعِدَّةَ وَلِتُكَبِّرُوا۟ ٱللَّهَ عَلَىٰ مَا هَدَىٰكُمْ وَلَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ ﴿١٨٥﴾

ى ه ى रमज़ान का महीना वह है, जिसकी सम्मानित रात (लैलतुल क़द्र) में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर पवित्र क़ु रआन उतरना शुरू हुआ। अल्लाह ने इसे लोगों के लिए मार्गदर्शन के रूप में उतारा है। इसमें मार्गदर्शन तथा सत्य और असत्य के बीच अंतर करने के स्पष्ट प्रमाण हैं। अतः जो व्यक्ति रमज़ान के महीने में उपस्थित हो, इस हाल में कि वह स्वस्थ एवं निवासी हो (यात्रा पर न हो), तो वह अनिवार्य रूप से उसका रोज़ा रखे। तथा जो व्यक्ति ऐसी बीमारी से पीड़ित हो कि उसके लिए रोज़ा रखना कठिन हो, या वह मुसाफ़िर हो; तो उसके लिए रोज़ा न रखना अनुमेय है। यदि वह रोज़ा न रखे, तो उसके लिए अनिवार्य है कि (बाद में) उन दिनों की क़ज़ा करे जिनके रोज़े उसने नहीं रखे थे। अल्लाह के इन विधानों का मक़सद तुम्हारे लिए आसानी पैदा करना है, न कि कठिनाई। और ताकि तुम पूरे महीने के रोज़े की गिनती पूरी करो और ताकि रमज़ान का महीना समाप्त होने के बाद तथा ईद के दिन इस बात पर अल्लाह की महिमा का वर्णन करो कि उसने तुम्हें इसका रोज़ा रखने का सामर्थ्य दिया और उसे पूरा करने पर तुम्हारी मदद की, और ताकि तुमअल्लाह का इस धर्म के लिए तुम्हारा मार्गदर्शन करने पर शुक्रिया अदा करो, जिसे उसने तुम्हारे लिए पसंद किया है।

وَإِذَا سَأَلَكَ عِبَادِى عَنِّى فَإِنِّى قَرِيبٌ ۖ أُجِيبُ دَعْوَةَ ٱلدَّاعِ إِذَا دَعَانِ ۖ فَلْيَسْتَجِيبُوا۟ لِى وَلْيُؤْمِنُوا۟ بِى لَعَلَّهُمْ يَرْشُدُونَ ﴿١٨٦﴾

يرشدون और (ऐ नबी!) जब मेरे बंदे आपसे मेरी निकटता और उनकी दुआ को क़बूल करने के बारे में पूछें; तो निश्चय मैं उनके निकट हूँ, उनकी स्थितियों को जानता हूँ और उनकी दुआओं को सुनता हूँ। इसलिए उन्हें मध्यस्थों (बिचौलियों) की, या अपनी आवाज़ें ऊँ ची करने की आवश्यकता नहीं है। मैं पुकारने वाले की पुकार का जवाब देता हूँ जब वह मुझे अपनी दुआ में निष्ठा के साथ पुकारता है। इसलिए उन्हें चाहिए कि वे मेरा और मेरी आज्ञाओं का पालन करें, और अपने ईमान पर जमे रहें; क्योंकि यह मेरे उत्तर देने का सबसे लाभकारी तरीक़ा है। ताकि वे ऐसा करके अपने धार्मिक और सांसारिक मामलों में मार्गदर्शन के रास्ते पर चलसकें ।

أُحِلَّ لَكُمْ لَيْلَةَ ٱلصِّيَامِ ٱلرَّفَثُ إِلَىٰ نِسَآئِكُمْ ۚ هُنَّ لِبَاسٌۭ لَّكُمْ وَأَنتُمْ لِبَاسٌۭ لَّهُنَّ ۗ عَلِمَ ٱللَّهُ أَنَّكُمْ كُنتُمْ تَخْتَانُونَ أَنفُسَكُمْ فَتَابَ عَلَيْكُمْ وَعَفَا عَنكُمْ ۖ فَٱلْـَٔـٰنَ بَـٰشِرُوهُنَّ وَٱبْتَغُوا۟ مَا كَتَبَ ٱللَّهُ لَكُمْ ۚ وَكُلُوا۟ وَٱشْرَبُوا۟ حَتَّىٰ يَتَبَيَّنَ لَكُمُ ٱلْخَيْطُ ٱلْأَبْيَضُ مِنَ ٱلْخَيْطِ ٱلْأَسْوَدِ مِنَ ٱلْفَجْرِ ۖ ثُمَّ أَتِمُّوا۟ ٱلصِّيَامَ إِلَى ٱلَّيْلِ ۚ وَلَا تُبَـٰشِرُوهُنَّ وَأَنتُمْ عَـٰكِفُونَ فِى ٱلْمَسَـٰجِدِ ۗ تِلْكَ حُدُودُ ٱللَّهِ فَلَا تَقْرَبُوهَا ۗ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ ٱللَّهُ ءَايَـٰتِهِۦ لِلنَّاسِ لَعَلَّهُمْ يَتَّقُونَ ﴿١٨٧﴾

ى ه रोज़ा अनिवार्य होने की शुरुआत में, यदि कोई व्यक्ति रोज़े की रात में सो जाता, फिर फ़ज्र से पहले उठता, तो उसके लिए खाना-पीना अथवा अपनी पत्नी से सहवास करना हराम हो जाता था। तो अल्लाह ने इस हुक्म को निरस्त कर दिया। अब अल्लाह ने (ऐ मोमिनो!) तुम्हारे लिए रोज़े की रातों में अपनी पत्नियों से सहवास करना अनुमेय कर दिया है। क्योंकि वे तुम्हारे लिए परदा एवं सतीत्व की रक्षा का कारण हैं और तुम उनके लिए परदा और सतीत्व की रक्षा का कारण हो। तुम एक-दूसरे से अलग नहीं रह सकते। अल्लाह ने जान लिया कि जिससे उसने तुम्हें मना किया था, उसे करके तुम अपने आपसे ख़यानत करते थे। इसलिए उसने तुम पर दया करते हुए तुम्हारी तौबा क़बूल कर ली और तुम्हें राहत प्रदान की। अतः अब उनके साथ संभोग करो और अल्लाह ने तुम्हारे लिए जो कु छ संतान नियत की है, उसकी खोज करो और بلغ क़ुरआन · तफ़सीर पूरी रात में खाओ और पियो, यहाँ तक कि तुम्हारे लिए फ़ज्र की सफ़े दी और उसके रात के अंधेरे से अलग होने के साथ फ़ज्र-सादिक़ (सुबह सादिक़) का उदय होना स्पष्ट हो जाए। फिर फ़ज्र के उदय होने से सूर्यास्त तक रोज़ा तोड़ने वाली चीज़ों से परहेज़ करके रोज़ा पूरा करो। तथा जब तुम मस्जिदों में एतिकाफ़ में हो, तो स्त्रियों के साथ संभोग न करो; क्योंकि यह इसे अमान्य कर देता है। उपर्युक्त अह़काम हलाल एवं हराम के बीच अल्लाह की सीमाएँ हैं, इसलिए तुम उनके पास बिल्कुल भी न जाओ; क्योंकि जो कोई भी अल्लाह की सीमाओं के क़रीब गया, वह निषिद्ध (हराम) में पड़ने के निकट है। इन अहकाम (प्रावधानों) को इस तरह स्पष्ट रूप से बयान करने की तरह ही अल्लाह अपनी निशानियों को लोगों के सामने स्पष्ट रूप से बयान करता है, ताकि वे उसकी आज्ञा का पालन करके और उसके निषेध से बचकर, उससे डरें।

وَلَا تَأْكُلُوٓا۟ أَمْوَٰلَكُم بَيْنَكُم بِٱلْبَـٰطِلِ وَتُدْلُوا۟ بِهَآ إِلَى ٱلْحُكَّامِ لِتَأْكُلُوا۟ فَرِيقًۭا مِّنْ أَمْوَٰلِ ٱلنَّاسِ بِٱلْإِثْمِ وَأَنتُمْ تَعْلَمُونَ ﴿١٨٨﴾

तुम एक-दूसरे के धन को अवैध रूप से न लो, जैसे चोरी, जबरन क़ब्ज़ा और धोखाधड़ी। तथा उसके झगड़े को शासकों के पास न ले जाओ ताकि लोगों के धन का एक भाग अवज्ञा के साथ रंगे हाथ ले लो, जबकि तुम्हें पता है कि अल्लाह ने इसे ह़राम किया है। क्योंकि यह जानते हुए पाप करना कि यह निषिद्ध है, सबसे जघन्य है और उसका दंड सबसे कठोर है।

۞ يَسْـَٔلُونَكَ عَنِ ٱلْأَهِلَّةِ ۖ قُلْ هِىَ مَوَٰقِيتُ لِلنَّاسِ وَٱلْحَجِّ ۗ وَلَيْسَ ٱلْبِرُّ بِأَن تَأْتُوا۟ ٱلْبُيُوتَ مِن ظُهُورِهَا وَلَـٰكِنَّ ٱلْبِرَّ مَنِ ٱتَّقَىٰ ۗ وَأْتُوا۟ ٱلْبُيُوتَ مِنْ أَبْوَٰبِهَا ۚ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ ﴿١٨٩﴾

ى (ऐ रसूल!) लोग आपसे नये चाँदों के गठन और उनकी स्थितियों में परिवर्तन के बारे में पूछते हैं। आप उन्हें उसकी हिकमत के बारे में उत्तर देते हुए कह दीजिए: वे लोगों के लिए समय के निर्धारण का ज़रिया हैं, जिनके द्वारा वे अपनी इबादतों के समय को जानते हैं; जैसे हज्ज के महीने, रोज़े का महीना और ज़कात अदा करने के लिए साल पूरा होने का ज्ञान। तथा वे लेन-देन में अपना समय जानते हैं; जैसे रक्त धन और क़र्ज़ की अदायगी के समय का निर्धारण। तथा नेकी और अच्छाई यह नहीं है कि तुम ह़ज्ज अथवा उम्रा का एह़राम बाँधने की अवस्था में अपने घरों में उनके पीछे से प्रवेश करो - जैसा कि तुम जाहिलिय्यत (पूर्व-इस्लामिक युग) में गुमान करते थे - बल्कि वास्तविक नेकी उस व्यक्ति की नेकी है, जो परोक्ष और प्रत्यक्ष रूप से अल्लाह से डरे। तथा तुम्हारा घरों में उनके द्वारों से प्रवेश करना तुम्हारे लिए अधिक आसान और कठिनाई से बहुत दूर है। क्योंकि अल्लाह ने तुम्हें किसी ऐसे कार्य का बाध्य नहीं किया है, जिसमें तुम्हारे लिए कष्ट और कठिनाई हो। तथा अपने और अल्लाह के अज़ाब के बीच नेक कार्य को आड़ (बचाव) बना लो; ताकि तुमजो चाहते हो, उसे प्राप्त करने में सफलहो, और जिससे डरते हो उससे बच जाओ।

وَقَـٰتِلُوا۟ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ ٱلَّذِينَ يُقَـٰتِلُونَكُمْ وَلَا تَعْتَدُوٓا۟ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُحِبُّ ٱلْمُعْتَدِينَ ﴿١٩٠﴾

तथा - अल्लाह के कलिमा को ऊँ चा करने के लिए - उन काफ़िरों से युद्ध करो, जो तुम्हें अल्लाह के धर्म से रोकने के लिए तुमसे युद्ध करते हैं। परंतु बच्चों, महिलाओं और बूढ़ों को क़त्ल करके अथवा मरे हुए व्यक्तियों के अंगों को काटकर (शवों का उत्परिवर्तन करके) अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन न करो। निःसंदेह अल्लाह अपने निर्धारित किए हुए नियमों और आदेशों में सीमाओं का उल्लंघन करने वालों से प्रेमनहीं करता।

وَٱقْتُلُوهُمْ حَيْثُ ثَقِفْتُمُوهُمْ وَأَخْرِجُوهُم مِّنْ حَيْثُ أَخْرَجُوكُمْ ۚ وَٱلْفِتْنَةُ أَشَدُّ مِنَ ٱلْقَتْلِ ۚ وَلَا تُقَـٰتِلُوهُمْ عِندَ ٱلْمَسْجِدِ ٱلْحَرَامِ حَتَّىٰ يُقَـٰتِلُوكُمْ فِيهِ ۖ فَإِن قَـٰتَلُوكُمْ فَٱقْتُلُوهُمْ ۗ كَذَٰلِكَ جَزَآءُ ٱلْكَـٰفِرِينَ ﴿١٩١﴾

ى उन्हें जहाँ पाओ, क़त्ल करो और उन्हें उस जगह - अर्थात् मक्का - से निकाल दो, जहाँ से उन्होंने तुम्हें निकाला है। मोमिन को उसके धर्म से रोकने और उसके कुफ़्र की ओर लौटने के परिणामस्वरूप सामने आने वाला फ़ितना क़त्लसे बड़ा है। और मस्जिदे-ह़रामका सम्मान करते हुए उसके पास उनसे लड़ाई की शुरूआत न करो, यहाँ तक कि वे उसमें तुमसे लड़ना शुरू कर दें। यदि वे मस्जिदे-ह़राम में तुमसे लड़ना शुरू कर दें, तो उन्हें क़त्ल करो। इसी तरह का बदला - अर्थात् मस्जिदे-ह़राम में उनके युद्ध करने पर उन्हें क़त्ल करना - काफ़िरों का बदला है।

فَإِنِ ٱنتَهَوْا۟ فَإِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ ﴿١٩٢﴾

यदि वे तुमसे लड़ना बंद कर दें और अपने कु फ़्र से बाज़ आ जाएँ, तो उनसे हाथ उठा लो। निःसंदेह अल्लाह तौबा करने वालों को क्षमा करने वाला है, इसलिए उनके पिछले गुनाहों पर उनकी पकड़ नहीं करता। उनपर दया करने वाला है, उन्हें दंड देने में जल्दी नहीं करता। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

وَقَـٰتِلُوهُمْ حَتَّىٰ لَا تَكُونَ فِتْنَةٌۭ وَيَكُونَ ٱلدِّينُ لِلَّهِ ۖ فَإِنِ ٱنتَهَوْا۟ فَلَا عُدْوَٰنَ إِلَّا عَلَى ٱلظَّـٰلِمِينَ ﴿١٩٣﴾

काफ़िरों से युद्ध करो, यहाँ तक कि वे शिर्क, लोगों को अल्लाह के मार्ग से रोकने और कुफ़्र से बाज़ आ जाएँ, तथा प्रभावी धर्म अल्लाह का धर्म हो जाए। यदि वे अपने कु फ़्र तथा अल्लाह के मार्ग से रोकने से बाज़ आ जाएँ, तो उनसे लड़ाई करना छोड़ दो। क्योंकि कु फ़्र और अल्लाह के मार्ग से रोकने के द्वारा अत्याचार करने वालों के सिवा किसी पर कोई अत्याचार उचित नहीं है।

ٱلشَّهْرُ ٱلْحَرَامُ بِٱلشَّهْرِ ٱلْحَرَامِ وَٱلْحُرُمَـٰتُ قِصَاصٌۭ ۚ فَمَنِ ٱعْتَدَىٰ عَلَيْكُمْ فَٱعْتَدُوا۟ عَلَيْهِ بِمِثْلِ مَا ٱعْتَدَىٰ عَلَيْكُمْ ۚ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ مَعَ ٱلْمُتَّقِينَ ﴿١٩٤﴾

वर्ष 7 हिजरी का हुरमत वाला महीना, जिसमें अल्लाह ने तुम्हें हरम में प्रवेश करने और उम्रा अदा करने में सक्षम किया, उस हुरमत वाले महीने के बदले है, जिसमें मुश्रिकों ने तुम्हें वर्ष 6 हिजरी में ह़रम में प्रवेश कने से रोक दिया था। सभी हुरमत वाली चीज़ों - जैसे हुरमत वाले नगर की हुरमत, हुरमत वाले महीने की हुरमत और एह़राम की हुरमत - में ज़्यादती करने वालों पर क़िसास का नियम लागू होगा। अतः जिसने भी इनमें तुमपर ज़्यादती की है, उसके साथ वैसा ही व्यवहार करो जैसा उसने किया है, और समानता की सीमा से आगे न बढ़ो। निश्चय अल्लाह अपनी सीमाओं का उल्लंघन करने वालों से प्रेम नहीं करता। तथा अल्लाह ने तुम्हें जो कु छ करने की अनुमति दी है, उससे आगे न बढ़ो, और जान लो कि अल्लाह सामर्थ्य एवं समर्थन के द्वारा उन लोगों के साथ है, जो उससे डरने वाले हैं।

وَأَنفِقُوا۟ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ وَلَا تُلْقُوا۟ بِأَيْدِيكُمْ إِلَى ٱلتَّهْلُكَةِ ۛ وَأَحْسِنُوٓا۟ ۛ إِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلْمُحْسِنِينَ ﴿١٩٥﴾

अल्लाह की आज्ञाकारिता के कार्यों, जैसे जिहाद आदि में धन खर्च करो, तथा अपने आपको विनाश में न डालो, इस प्रकार कि उसके रास्ते में जिहाद और खर्च करना छोड़ दो, या अपने आपको ऐसी चीज़ में डाल दो जो तुम्हारे विनाश का कारण हो। तथा अपनी इबादतों, मामलों और आचरण में अच्छा बनो। निःसंदेह अल्लाह अपने सभी मामलों में अच्छा करने वालों से प्यार करता है। इसलिए वह उनके सवाब को बढ़ा देता है और उन्हें सीधे रास्ते पर चलने का सामर्थ्य प्रदान करता है।

وَأَتِمُّوا۟ ٱلْحَجَّ وَٱلْعُمْرَةَ لِلَّهِ ۚ فَإِنْ أُحْصِرْتُمْ فَمَا ٱسْتَيْسَرَ مِنَ ٱلْهَدْىِ ۖ وَلَا تَحْلِقُوا۟ رُءُوسَكُمْ حَتَّىٰ يَبْلُغَ ٱلْهَدْىُ مَحِلَّهُۥ ۚ فَمَن كَانَ مِنكُم مَّرِيضًا أَوْ بِهِۦٓ أَذًۭى مِّن رَّأْسِهِۦ فَفِدْيَةٌۭ مِّن صِيَامٍ أَوْ صَدَقَةٍ أَوْ نُسُكٍۢ ۚ فَإِذَآ أَمِنتُمْ فَمَن تَمَتَّعَ بِٱلْعُمْرَةِ إِلَى ٱلْحَجِّ فَمَا ٱسْتَيْسَرَ مِنَ ٱلْهَدْىِ ۚ فَمَن لَّمْ يَجِدْ فَصِيَامُ ثَلَـٰثَةِ أَيَّامٍۢ فِى ٱلْحَجِّ وَسَبْعَةٍ إِذَا رَجَعْتُمْ ۗ تِلْكَ عَشَرَةٌۭ كَامِلَةٌۭ ۗ ذَٰلِكَ لِمَن لَّمْ يَكُنْ أَهْلُهُۥ حَاضِرِى ٱلْمَسْجِدِ ٱلْحَرَامِ ۚ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ شَدِيدُ ٱلْعِقَابِ ﴿١٩٦﴾

अल्लाह तआला की प्रसन्नता की तलाश में, ह़ज्ज और उम्रा संपूर्ण रूप से अदा करो। यदि बीमारी या दुश्मन या इसी प्रकार के अन्य कारणों से उन्हें पूरा करने से तुम्हें रोक दिया जाए; तो तुम्हें अपने एह़राम से हलाल होने के लिए - ऊँ ट या गाय अथवा बकरी में से - जो भी क़ु र्बानी का जानवर उपलब्ध हो, उसे ज़बह़ करना होगा। तथा उस समय तक अपने सिर न मुँडाओ या बाल न कटाओ, जब तक क़ुर्बानी उस स्थान पर न पहुँच जाए, जहाँ उसे ज़बह करना हलाल है। यदि उसे ह़रम पहुँचने से रोक दिया जाए, तो वहीं ज़बह़ कर दिया जाए, जहाँ उसे रोक दिया गया है। यदि ह़रम से नहीं रोका गया है, तो हरम में क़ु र्बानी के दिन और उसके बाद 'तशरीक़ के दिनों' में ज़बह किया जाना चाहिए। फिर तुममें से जो व्यक्ति बीमार हो, अथवा उसके सिर के बालों में कोई तकलीफ़ हो, जैसे जूँ आदि, और इसके कारण वह अपना सिर मुँडा ले, तो उसपर कोई गुनाह नहीं है। लेकिन उसके बदले उसे फ़िदया अदा करना पड़ेगा। फ़िदया के तौर पर या तो तीन रोज़े रखे, या ह़रम के निर्धनों में से तीन निर्धनों को खाना खिलाए, या एक बकरी ज़बह करके हरम के ग़रीबों में बाँट दे। फिर यदि तुम्हें कोई भय न हो, तो तुममें से जो व्यक्ति ह़ज्ज के महीनों में उम्रा अदा करने के बाद एह़राम खोलना चाहे और उसी साल ह़ज्ज का एहराम बाँधने तक उन वस्तुओं से लाभान्वित होना चाहे, जो एह़राम की अवस्था में हराम हैं; तो जो कु छ उसके पास उपलब्ध हो उसे ज़बह करे: एक बकरी ज़बह करे अथवा एक ऊँ ट या गाय में सात आदमी शरीक हो जाएँ। यदि वह क़ु र्बानी न कर सके , तो उसके बदले ह़ज्ज के दिनों में तीन रोज़े रखे और सात रोज़े अपने घर वापस आने के बाद रखे, ताकि कु ल दस दिन पूरे हो जाएँ। क़ु र्बानी अथवा उसकी शक्ति न होने की स्थिति में रोज़े की अनिवार्यता के साथ उम्रा का यह लाभ उठाना उस व्यक्ति के लिए है, जो ह़रम का निवासी और हरम के आस-पास रहने वाला न हो। तथा अल्लाह की शरीयत का अनुसरण करके और उसकी सीमाओं का सम्मान करके उससे डरो और जान लो कि अल्लाह अपने आदेशों का उल्लंघन करने वालों को कठोर दंड देने वाला है। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

ٱلْحَجُّ أَشْهُرٌۭ مَّعْلُومَـٰتٌۭ ۚ فَمَن فَرَضَ فِيهِنَّ ٱلْحَجَّ فَلَا رَفَثَ وَلَا فُسُوقَ وَلَا جِدَالَ فِى ٱلْحَجِّ ۗ وَمَا تَفْعَلُوا۟ مِنْ خَيْرٍۢ يَعْلَمْهُ ٱللَّهُ ۗ وَتَزَوَّدُوا۟ فَإِنَّ خَيْرَ ٱلزَّادِ ٱلتَّقْوَىٰ ۚ وَٱتَّقُونِ يَـٰٓأُو۟لِى ٱلْأَلْبَـٰبِ ﴿١٩٧﴾

ى ह़ज्ज का समय कुछ ज्ञात महीने हैं, जो शव्वाल के महीने से शुरू होते हैं और ज़ुल-ह़िज्जा के दस दिनों के साथ समाप्त हो जाते हैं। जो व्यक्ति इन महीनों में अपने आपको ह़ज्ज के लिए बाध्य कर ले और उसका एहराम बाँध ले; उसके लिए संभोग और संभोग पूर्व क्रीड़ाएँ ह़राम हैं। तथा समय और जगह की महानता के कारण, उसके लिए पाप करके अल्लाह के आज्ञापालन से निकलने का निषेध (दोष) बढ़ जाता है। इसी तरह उसके लिए ऐसी बहस (वाद-विवाद) में पड़ना भी हराम है, जो क्रोध और झगड़े की ओर ले जाती है। तथा तुम जो भी अच्छा कार्य करोगे, अल्लाह उसे जान लेगा और तुम्हें उसका बदला प्रदान करेगा। तथा खाने-पीने की ज़रूरत की चीजें लेकर ह़ज्ज की अदायगी में मदद हासिल करो और जान लो कि तुम्हारे सभी मामलों में तुम्हारी मदद के लिए सबसे अच्छी चीज़ अल्लाह का तक़्वा (डर) है। अतः ऐ स्वस्थ बुद्धि वालो! मेरी आज्ञाओं का पालन करके और मेरे निषेधों से बचकर मुझसे डरो।

لَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَن تَبْتَغُوا۟ فَضْلًۭا مِّن رَّبِّكُمْ ۚ فَإِذَآ أَفَضْتُم مِّنْ عَرَفَـٰتٍۢ فَٱذْكُرُوا۟ ٱللَّهَ عِندَ ٱلْمَشْعَرِ ٱلْحَرَامِ ۖ وَٱذْكُرُوهُ كَمَا هَدَىٰكُمْ وَإِن كُنتُم مِّن قَبْلِهِۦ لَمِنَ ٱلضَّآلِّينَ ﴿١٩٨﴾

ह़ज्ज के दौरान व्यापार और अन्य चीज़ों के माध्यम से ह़लाल जीविका की तलाश करने में तुमपर कोई पाप नहीं है। जब तुम ज़ुल-ह़िज्जा की नौ तारीख़ को अरफ़ा में ठहरने के बाद, दसवीं तारीख़ की रात को वहाँ से मुज़दलिफ़ा की ओर प्रस्थान करो; तो मुज़दलिफ़ा में मश्अरे ह़राम के पास तसबीह़ (सुब्ह़ानल्लाह), तहलील (ला इलाहा इल्लल्लाह) और दुआ करके अल्लाह को याद करो। तथा अल्लाह को इसलिए याद करो कि उसने अपने धर्म के स्थलों और अपने घर के ह़ज्ज के अनुष्ठानों के लिए तुम्हारा मार्गदर्शन किया, क्योंकि इससे पहले तुमउन लोगों में से थे जो उसकी शरीयत से अनजान थे।

ثُمَّ أَفِيضُوا۟ مِنْ حَيْثُ أَفَاضَ ٱلنَّاسُ وَٱسْتَغْفِرُوا۟ ٱللَّهَ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ ﴿١٩٩﴾

फिर तुम अरफ़ात से वापस आओ, जैसे कि इबराहीम अलैहिस्सलाम का अनुसरण करने वाले लोग करते थे, उन जाहिलिय्यत के लोगों की तरह नहीं, जो यहाँ ठहरते ही नहीं थे। तथा तुम अल्लाह के आदेश का पालन करने में अपनी कोताही पर उससे क्षमा माँगो। निःसंदेह अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों को क्षमा करने वाला और उनपर दया करने वाला है।

فَإِذَا قَضَيْتُم مَّنَـٰسِكَكُمْ فَٱذْكُرُوا۟ ٱللَّهَ كَذِكْرِكُمْ ءَابَآءَكُمْ أَوْ أَشَدَّ ذِكْرًۭا ۗ فَمِنَ ٱلنَّاسِ مَن يَقُولُ رَبَّنَآ ءَاتِنَا فِى ٱلدُّنْيَا وَمَا لَهُۥ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ مِنْ خَلَـٰقٍۢ ﴿٢٠٠﴾

जब तुम ह़ज्ज के कार्य पूरे कर लो और उनसे फारिग़ हो जाओ, तो अल्लाह को याद करो और उसकी अत्यधिक प्रशंसा करो, जैसे तुम अपने बाप-दादा पर गर्व और उनकी प्रशंसा किया करते थे, अथवा अल्लाह को अपने बाप-दादा को याद करने से कहीं बढ़कर याद करो। क्योंकि हर वह नेमत जिसका तुम आनंद ले रहे हो, वह अल्लाह ही की दी हुई है। इस विषय में लोग अलग-अलग प्रकार के हैं। उनमें से एक बहुदेववादी काफ़िर है, जो के वल इस सांसारिक जीवन पर विश्वास करता है। इसलिए वह अपने पालनहार से केवल संसार की नेमतों और उसकी शोभा, जैसे स्वास्थ्य, धन और संतान को माँगता है। ऐसे लोगों के लिए, उनके दुनिया की इच्छा रखने और आख़िरत से उपेक्षा करने के कारण, उसमें कोई हिस्सा नहीं है, जो अल्लाह ने अपने मोमिन बंदों के लिए आख़िरत में तैयार कर रखा है।

وَمِنْهُم مَّن يَقُولُ رَبَّنَآ ءَاتِنَا فِى ٱلدُّنْيَا حَسَنَةًۭ وَفِى ٱلْـَٔاخِرَةِ حَسَنَةًۭ وَقِنَا عَذَابَ ٱلنَّارِ ﴿٢٠١﴾

जबकि लोगों का एक समूह अल्लाह पर ईमान रखने वाला है और आख़िरत पर ईमान रखता है। इसलिए वह अपने पालनहार से दुनिया की नेमत और उसमें अच्छे कार्य का सवाल करता है, साथ ही वह उससे जन्नत की प्राप्ति और आग की यातना से सुरक्षित रहने का प्रश्न करता है।

أُو۟لَـٰٓئِكَ لَهُمْ نَصِيبٌۭ مِّمَّا كَسَبُوا۟ ۚ وَٱللَّهُ سَرِيعُ ٱلْحِسَابِ ﴿٢٠٢﴾

दुनिया एवं आख़िरत की भलाइयाँ माँगने वाले ही वे लोग हैं, जिनके लिए उनके दुनिया में किए हुए नेक कार्यों के बदले में बहुत बड़ा सवाब है और अल्लाह कार्यों का बहुत जल्द हिसाब लेने वाला है। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

۞ وَٱذْكُرُوا۟ ٱللَّهَ فِىٓ أَيَّامٍۢ مَّعْدُودَٰتٍۢ ۚ فَمَن تَعَجَّلَ فِى يَوْمَيْنِ فَلَآ إِثْمَ عَلَيْهِ وَمَن تَأَخَّرَ فَلَآ إِثْمَ عَلَيْهِ ۚ لِمَنِ ٱتَّقَىٰ ۗ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّكُمْ إِلَيْهِ تُحْشَرُونَ ﴿٢٠٣﴾

कुछ थोड़े दिनों अर्थात् ज़ुल-ह़िज्जा के ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें दिन में तकबीर (अल्लाहु अकबर) और तहलील (ला इलाहा इल्लल्लाह) के साथ अल्लाह को याद करो। फिर जो जल्दी करे और बारहवीं तारीख़ को कं करी मारने के बाद मिना से निकल जाए, तो उसके लिए ऐसा करना अनुमेय है और उसपर कोई पाप नहीं; क्योंकि अल्लाह ने उसे यह आसानी प्रदान की है। तथा जो तेरहवीं तारीख़ तक देरी करे यहाँ तक कि कं करी मार ले, तो वह ऐसा भी कर सकता है और उसपर कोई आपत्ति की बात नहीं है, बल्कि उसने सबसे पूर्ण रूप अपनाया, और उसने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के कृ त्यका पालन किया। यह सब कु छ उसके लिए है, जो अपने हज्ज में अल्लाह से डरे और उसे अल्लाह के आदेश के अनुसार अदा करे। तथा अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसकी मना की हुई बातों से बचकर उससे डरो और सुनिश्चित रहो कि तुम के वल उसी की ओर लौटाए जाओगे, फिर वह तुम्हें तुम्हारे कार्यों का बदला देगा।

وَمِنَ ٱلنَّاسِ مَن يُعْجِبُكَ قَوْلُهُۥ فِى ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا وَيُشْهِدُ ٱللَّهَ عَلَىٰ مَا فِى قَلْبِهِۦ وَهُوَ أَلَدُّ ٱلْخِصَامِ ﴿٢٠٤﴾

लोगों में कोई व्यक्ति मुनाफ़िक़ भी है, जिसकी बात इस दुनिया के बारे में - ऐ नबी! - आपको अच्छी लगती है। चुनाँचे आप उसे सुभाषी देखते हैं, यहाँ तक कि आपको उसके सच्चे और शुभचिंतक होने का गुमान होता है। जबकि उसका उद्देश्य केवल अपने धन एवं प्राण की रक्षा करना है। तथा उसके दिल में जो ईमान और भलाई है, उसपर वह अल्लाह को गवाह बनाता है - हालाँकि वह झूठा है -, तथा वह मुसलमानों के प्रति बहुत शत्रुतापूर्ण और सख़्त झगड़ालू है।

وَإِذَا تَوَلَّىٰ سَعَىٰ فِى ٱلْأَرْضِ لِيُفْسِدَ فِيهَا وَيُهْلِكَ ٱلْحَرْثَ وَٱلنَّسْلَ ۗ وَٱللَّهُ لَا يُحِبُّ ٱلْفَسَادَ ﴿٢٠٥﴾

जब वह आपके पास से जुदा होता है, तो धरती में दौड़-धूप करता है ताकि गुनाहों से उपद्रव फैलाए, फसलों को नाश करे और पशुओं को मार डाले। जबकि अल्लाह धरती में उपद्रव को और उपद्रव करने वाले को पसंद नहीं करता।

وَإِذَا قِيلَ لَهُ ٱتَّقِ ٱللَّهَ أَخَذَتْهُ ٱلْعِزَّةُ بِٱلْإِثْمِ ۚ فَحَسْبُهُۥ جَهَنَّمُ ۚ وَلَبِئْسَ ٱلْمِهَادُ ﴿٢٠٦﴾

जब उस उपद्रव करने वाले से - सदुपदेश के तौर पर - कहा जाता है: अल्लाह की सीमाओं का सम्मान करके और उसके निषेधों से बचकर उससे डर, तो उसका गर्व और अहंकार उसे सच्चाई की ओर लौटने से रोक देता है और वह पाप में लीन रहता है। अतः उसका बदला जो उसके लिए पर्याप्त है, जहन्नममें प्रवेश है और निश्चय वह उसके वासियों के लिए बहुत बुरा ठिकाना और स्थान है।

وَمِنَ ٱلنَّاسِ مَن يَشْرِى نَفْسَهُ ٱبْتِغَآءَ مَرْضَاتِ ٱللَّهِ ۗ وَٱللَّهُ رَءُوفٌۢ بِٱلْعِبَادِ ﴿٢٠٧﴾

तथा लोगों में एक ईमान वाला भी है, जो अपना प्राण बेच देता है। इसलिए वह अपने पालनहार की आज्ञाकारिता में, उसके मार्ग में जिहाद करते हुए और उसकी खुशी की तलाश में उसे न्योछावरو कर देता है। तथा अल्लाह अपने बंदों पर विशाल दया वाला और उनपर अनंत करुणामय है।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱدْخُلُوا۟ فِى ٱلسِّلْمِ كَآفَّةًۭ وَلَا تَتَّبِعُوا۟ خُطُوَٰتِ ٱلشَّيْطَـٰنِ ۚ إِنَّهُۥ لَكُمْ عَدُوٌّۭ مُّبِينٌۭ ﴿٢٠٨﴾

ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! समग्र इस्लाम में प्रवेश कर जाओ और उसकी किसी भी वस्तु को न छोड़ो, जैसा कि अह्ले-किताब का रवैया रहा है कि किताब के कु छ भाग पर ईमान रखते हैं और कु छ भाग का इनकार करते हैं। और शैतान के मार्गों पर न चलो; क्योंकि वह तुम्हारा स्पष्ट शत्रु है, अपनी शत्रुता को प्रकट करने वाला है।

فَإِن زَلَلْتُم مِّنۢ بَعْدِ مَا جَآءَتْكُمُ ٱلْبَيِّنَـٰتُ فَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌ ﴿٢٠٩﴾

यदि तुम अपने पास संदेह रहित स्पष्ट प्रमाण आ जाने के पश्चात भी किसी त्रुटि और झुकाव में पड़ जाओ; तो जान लो कि अल्लाह अपनी शक्ति एवं वशीकरण में पराक्रमी है, अपने प्रबंधन एवं विधान में पूर्ण हिकमत वाला है। इसलिए उससे डरो और उसका सम्मान करो। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

هَلْ يَنظُرُونَ إِلَّآ أَن يَأْتِيَهُمُ ٱللَّهُ فِى ظُلَلٍۢ مِّنَ ٱلْغَمَامِ وَٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ وَقُضِىَ ٱلْأَمْرُ ۚ وَإِلَى ٱللَّهِ تُرْجَعُ ٱلْأُمُورُ ﴿٢١٠﴾

शैतान के रास्तों पर चलने वाले, सत्य के मार्ग से विचलित ये लोग केवल इस बात की प्रतीक्षा कर रहे हैं कि उनके बीच निर्णय करने के लिए क़ियामत के दिन अल्लाह अपनी महिमा एवं प्रताप के योग्य, बादलों के सायों में उनके पास आ जाए, तथा फ़रिश्ते भी उन्हें चारों ओर से घेरे हुए उनके पास आ जाएँ, और उस समय उनके बारे में अल्लाह के हुक्म को पूरा कर दिया जाएगा और काम तमाम हो जाएगा। तथा लोगों के सारे मामले और विषय अके ले अल्लाह ही की ओर लौटाए जाते हैं।

سَلْ بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ كَمْ ءَاتَيْنَـٰهُم مِّنْ ءَايَةٍۭ بَيِّنَةٍۢ ۗ وَمَن يُبَدِّلْ نِعْمَةَ ٱللَّهِ مِنۢ بَعْدِ مَا جَآءَتْهُ فَإِنَّ ٱللَّهَ شَدِيدُ ٱلْعِقَابِ ﴿٢١١﴾

(ऐ नबी!) बनी इसराईल से उनकी भर्त्सना करते हुए पूछिए: अल्लाह ने तुम्हारे सामने नबियों की सच्चाई को उजागर करने वाली कितनी स्पष्ट निशानियाँ रखीं?! तो तुमने उन्हें झुठला दिया और उनसे मुँह फे र लिया। तथा जो अल्लाह की नेमत को उसे पहचान लेने और उसके स्पष्ट हो जाने के पश्चात झुठला दे और इनकार कर दे; तो (ज्ञात होना चाहिए कि) निःसंदेह अल्लाह झुठलाने वाले काफ़िरों को कठिन यातना देने वाला है।

زُيِّنَ لِلَّذِينَ كَفَرُوا۟ ٱلْحَيَوٰةُ ٱلدُّنْيَا وَيَسْخَرُونَ مِنَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ۘ وَٱلَّذِينَ ٱتَّقَوْا۟ فَوْقَهُمْ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ ۗ وَٱللَّهُ يَرْزُقُ مَن يَشَآءُ بِغَيْرِ حِسَابٍۢ ﴿٢١٢﴾

अल्लाह का इनकार करने वालों के लिए सांसारिक जीवन और उसमें मौजूद क्षणिक सुखों और समाप्त हो जाने वाली खुशियों को सुंदर बना दिया गया है। तथा वे अल्लाह और अंतिम दिन पर ईमान रखने वालों का मज़ाक़ उड़ाते हैं। जबकि जो लोग अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों को त्याग करके अल्लाह से डरते हैं, वे आख़िरत में इन काफ़िरों से ऊपर होंगे। क्योंकि अल्लाह उन्हें हमेशा रहने वाली जन्नतों में ठहराएगा और अल्लाह अपनी मख़्लूक़ में से जिसे चाहता है, बिना गिनती और गणना के प्रदान करता है।

كَانَ ٱلنَّاسُ أُمَّةًۭ وَٰحِدَةًۭ فَبَعَثَ ٱللَّهُ ٱلنَّبِيِّـۧنَ مُبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ وَأَنزَلَ مَعَهُمُ ٱلْكِتَـٰبَ بِٱلْحَقِّ لِيَحْكُمَ بَيْنَ ٱلنَّاسِ فِيمَا ٱخْتَلَفُوا۟ فِيهِ ۚ وَمَا ٱخْتَلَفَ فِيهِ إِلَّا ٱلَّذِينَ أُوتُوهُ مِنۢ بَعْدِ مَا جَآءَتْهُمُ ٱلْبَيِّنَـٰتُ بَغْيًۢا بَيْنَهُمْ ۖ فَهَدَى ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لِمَا ٱخْتَلَفُوا۟ فِيهِ مِنَ ٱلْحَقِّ بِإِذْنِهِۦ ۗ وَٱللَّهُ يَهْدِى مَن يَشَآءُ إِلَىٰ صِرَٰطٍۢ مُّسْتَقِيمٍ ﴿٢١٣﴾

ه (शुरू में) लोग एक ही समुदाय थे, अपने पिता आदम के धर्म पर (रहते हुए) मार्गदर्शन पर सहमत थे, यहाँ तक कि शैतान ने उन्हें गुमराह कर दिया, तो वे मतभेद के शिकार होकर मोमिन और काफिर में बँट गए। इस कारण से, अल्लाह ने रसूलों को भेजा, जो ईमान वालों और आज्ञाकारियों को उस चीज़ की शुभ सूचना देने वाले थे जो अल्लाह ने अपनी दया में से उनके लिए तैयार कर रखी है, तथा कु फ़्र का मार्ग अपनाने वालों को अल्लाह की कठिन यातना से डराने वाले थे जिसकी उसने उन्हें धमकी दी है। तथा अल्लाह ने अपने रसूलों के साथ संदेह रहित सत्य पर आधारित किताबें उतारीं; ताकि वे लोगों के बीच उनके विवादित मामलों का निर्णय करें। और उस पुस्तक में जिसे अल्लाह ने अवतरित किया - और वह तौरात है - उन्हीं लोगों ने मतभेद किया जो यहूदियों में से उसका ज्ञान दिए गए थे, इसके बाद कि उनके पास अल्लाह के प्रमाण आ चुके थे कि वह अल्लाह की ओर से सच्ची (पुस्तक) है, जिसमें उनके लिए मतभेद करना संभव नहीं था, उन्होंने ऐसा अत्याचार करते हुए किया। इसलिए अल्लाह ने अपनी अनुमति और इच्छा से मोमिनों को गुमराही से मार्गदर्शन को पहचानने का सामर्थ्य प्रदान किया। तथा अल्लाह जिसे चाहता है सीधा मार्ग दिखाता है, जिसमें कोई टेढ़ापन नहीं है और वह ईमान का मार्ग है।

أَمْ حَسِبْتُمْ أَن تَدْخُلُوا۟ ٱلْجَنَّةَ وَلَمَّا يَأْتِكُم مَّثَلُ ٱلَّذِينَ خَلَوْا۟ مِن قَبْلِكُم ۖ مَّسَّتْهُمُ ٱلْبَأْسَآءُ وَٱلضَّرَّآءُ وَزُلْزِلُوا۟ حَتَّىٰ يَقُولَ ٱلرَّسُولُ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ مَعَهُۥ مَتَىٰ نَصْرُ ٱللَّهِ ۗ أَلَآ إِنَّ نَصْرَ ٱللَّهِ قَرِيبٌۭ ﴿٢١٤﴾

ى या (ऐ मोमिनो!) तुमने समझ रखा है कि तुम जन्नत में प्रवेश कर जाओगे, जबकि तुम अभी तक अपने से पहले गुज़रे हुए लोगों के परीक्षा की तरह किसी परीक्षा से पीड़ित नहीं हुए। वे सख़्त ग़रीबी और गंभीर बीमारी से प्रभावित हुए और डर ने उन्हें हिलाकर रख दिया, यहाँ तक कि उनपर विपत्ति इस हद तक पहुँच गई कि वे अल्लाह की मदद के जल्दी आने की कामना करने लगे। चुनाँचे रसूल और उनके साथ ईमान लाने वाले कहने लगे: अल्लाह की मदद कब आएगी? सुन लो, अल्लाह की मदद उसपर ईमान रखने वालों और उसपर भरोसा करने वालों से क़रीब ही है। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

يَسْـَٔلُونَكَ مَاذَا يُنفِقُونَ ۖ قُلْ مَآ أَنفَقْتُم مِّنْ خَيْرٍۢ فَلِلْوَٰلِدَيْنِ وَٱلْأَقْرَبِينَ وَٱلْيَتَـٰمَىٰ وَٱلْمَسَـٰكِينِ وَٱبْنِ ٱلسَّبِيلِ ۗ وَمَا تَفْعَلُوا۟ مِنْ خَيْرٍۢ فَإِنَّ ٱللَّهَ بِهِۦ عَلِيمٌۭ ﴿٢١٥﴾

(ऐ नबी!) आपके साथी आपसे पूछते हैं: वे अपने विभिन्न प्रकार के धनों में से क्या ख़र्च करें और कहाँ ख़र्च करें? तो आप उन्हें जवाब देते हुए कह दीजिए: तुम ख़ैर - अर्थात् हलाल एवं पवित्र धन - में से जो भी ख़र्च करो, तो उसे माता-पिता पर, आवश्यकता के अनुसार अपने निकटतम रिश्तेदारों पर, ज़रूरतमंद यतीमों पर, उन बेसहारा लोगों पर जिनके पास कोई धन नहीं, तथा उस यात्री पर ख़र्च करना चाहिए जो यात्रा के कारण अपने परिवार और स्वदेश से कट गया है। (ऐ मोमिनो!) तुम जो भी भलाई करोगे,ر चाहे वह कम हो या अधिक, निःसंदेह अल्लाह उसे जानने वाला है, उससे कु छ भी छिपा नहीं है, और वह तुम्हें उसका बदला देगा।

كُتِبَ عَلَيْكُمُ ٱلْقِتَالُ وَهُوَ كُرْهٌۭ لَّكُمْ ۖ وَعَسَىٰٓ أَن تَكْرَهُوا۟ شَيْـًۭٔا وَهُوَ خَيْرٌۭ لَّكُمْ ۖ وَعَسَىٰٓ أَن تُحِبُّوا۟ شَيْـًۭٔا وَهُوَ شَرٌّۭ لَّكُمْ ۗ وَٱللَّهُ يَعْلَمُ وَأَنتُمْ لَا تَعْلَمُونَ ﴿٢١٦﴾

(ऐ मोमिनो!) तुमपर अल्लाह के रास्ते में लड़ाई करना अनिवार्य कर दिया गया है, हालाँकि स्वाभाविक रूप से दिल उसे नापसंद करता है; क्योंकि इसमें जान एवं माल दोनों ख़र्च करना पड़ता है। और शायद तुम किसी चीज़ को नापसंद करो और वह वास्तव में तुम्हारे हक़ में बेहतर और लाभदायक हो; जैसे कि अल्लाह के मार्ग में लड़ाई करना। क्योंकि इसके प्रतिफल की महानता के साथ, इसमें शत्रुओं पर विजय और अल्लाह के धर्म की सर्वोपरि है। तथा शायद तुम किसी चीज़ को पसंद करो और वह चीज़ तुम्हारे लिए बुरी और विपत्ति (संकट) का करण हो; जैसे कि जिहाद से पीछे रहना। क्योंकि इसमें निःसहायता और दुश्मनों का प्रभुत्व है। और अल्लाह अच्छी और बुरी बातों को भली-भाँति जानता है, और तुम उसे नहीं जानते, सो तुम उसकी आज्ञा का पालन करो; क्योंकि इसी में तुम्हारे लिए भलाई है।

يَسْـَٔلُونَكَ عَنِ ٱلشَّهْرِ ٱلْحَرَامِ قِتَالٍۢ فِيهِ ۖ قُلْ قِتَالٌۭ فِيهِ كَبِيرٌۭ ۖ وَصَدٌّ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ وَكُفْرٌۢ بِهِۦ وَٱلْمَسْجِدِ ٱلْحَرَامِ وَإِخْرَاجُ أَهْلِهِۦ مِنْهُ أَكْبَرُ عِندَ ٱللَّهِ ۚ وَٱلْفِتْنَةُ أَكْبَرُ مِنَ ٱلْقَتْلِ ۗ وَلَا يَزَالُونَ يُقَـٰتِلُونَكُمْ حَتَّىٰ يَرُدُّوكُمْ عَن دِينِكُمْ إِنِ ٱسْتَطَـٰعُوا۟ ۚ وَمَن يَرْتَدِدْ مِنكُمْ عَن دِينِهِۦ فَيَمُتْ وَهُوَ كَافِرٌۭ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ حَبِطَتْ أَعْمَـٰلُهُمْ فِى ٱلدُّنْيَا وَٱلْـَٔاخِرَةِ ۖ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ أَصْحَـٰبُ ٱلنَّارِ ۖ هُمْ فِيهَا خَـٰلِدُونَ ﴿٢١٧﴾

ى (ऐ नबी!) लोग आपसे सम्मानित महीनों: ज़ुल-क़ादा, ज़ुल-ह़िज्जा, मुहर्रम और रजब में युद्ध करने के बारे में पूछते हैं। आप उन्हें जवाब देते हुए कह दीजिए: इन महीनों में युद्ध करना अल्लाह के यहाँ बहुत गंभीर और नापसंदीदा (निंदनीय) है, जिस तरह कि मुश्रिकों का अल्लाह की राह से रोकना भी नापसंदीदा (निंदनीय) है। जबकि मोमिनों को मस्जिदे-हराम से रोकना और मस्जिदे-हराम के वासियों को वहाँ से निकालना अल्लाह के निकट सम्मानित महीनों में युद्ध करने की तुलना में अधिक गंभीर (पाप) है। तथा वह शिर्क जिसमें वे लिप्त हैं, क़त्लसे भी अधिक गंभीर है। तथा ये अनेके श्वरवादी (मुश्रिक लोग) अपने अत्याचार के उपरांत - ऐ ईमान वालो! - तुमसे लड़ते रहेंगे यहाँ तक कि तुम्हें तुम्हारे सच्चे धर्म से हटाकर अपने असत्य धर्म की ओर फेर दें, यदि वे ऐसा करने में सक्षम हों। परंतु तुममें से जो व्यक्ति अपने धर्म से फिर जाए और अल्लाह के इनकार ही की हालत में मर जाए; तो निश्चय उसका अच्छा कार्य बेकार हो गया और आख़िरत में उसका परिणाम आग में दाख़िल होना और हमेशा के लिए उसी में रहना है।

إِنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَٱلَّذِينَ هَاجَرُوا۟ وَجَـٰهَدُوا۟ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ أُو۟لَـٰٓئِكَ يَرْجُونَ رَحْمَتَ ٱللَّهِ ۚ وَٱللَّهُ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ ﴿٢١٨﴾

निःसंदेह जो लोग अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाए, और जिन्होंने अपने घर-बार छोड़कर अल्लाह और उसके रसूल की ओर हिजरत की तथा अल्लाह के धर्म को सर्वोच्च करने के लिए जिहाद किया; वही लोग अल्लाह की रहमत और उसकी क्षमा की उम्मीद रखते हैं और अल्लाह अपने बंदों के गुनाहों को बहुत क्षमा करने वाला, उनपर बेहद दया करने वाला है।

۞ يَسْـَٔلُونَكَ عَنِ ٱلْخَمْرِ وَٱلْمَيْسِرِ ۖ قُلْ فِيهِمَآ إِثْمٌۭ كَبِيرٌۭ وَمَنَـٰفِعُ لِلنَّاسِ وَإِثْمُهُمَآ أَكْبَرُ مِن نَّفْعِهِمَا ۗ وَيَسْـَٔلُونَكَ مَاذَا يُنفِقُونَ قُلِ ٱلْعَفْوَ ۗ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ ٱللَّهُ لَكُمُ ٱلْـَٔايَـٰتِ لَعَلَّكُمْ تَتَفَكَّرُونَ ﴿٢١٩﴾

(ऐ नबी!) आपके साथी आपसे शराब (अर्थात् हर वह चीज़ जो अक़्ल को ढाँप ले और उससे बुद्धि चली जाए) के बारे में पूछते हैं; वे आपसे उसके पीने, बेचने और खरीदने के हुक्मके बारे में पूछते हैं। तथा वे आपसे जुए के हुक्मके बारे में पूछते हैं (जुआ से अभिप्राय वह धन है जो उन प्रतियोगिताओं के माध्यमसे प्राप्त किया जाता है जिनमें प्रतियोगिता में शामिलदोनों पक्षों की ओर से मुआवज़ा रखा जाता है) तो आप उन्हें जवाब देते हुए कह दीजिए: इन दोनों में बहुत-से सांसारिक एवं धार्मिक بلغ क़ुरआन · तफ़सीर नुक़सान और बुराइयाँ हैं; जैसे- बुद्धि और धन की हानि, दुश्मनी और द्वेष में पड़ना। जबकि उन दोनों में थोड़े लाभ भी हैं, जैसे- कु छ धन की प्राप्ति। परंतु इनका नुक़सान और इनके द्वारा होने वाला पाप इनके लाभ से अधिक है। और जिस चीज़ का नुक़सान उसके लाभ से अधिक हो; बुद्धिमान व्यक्ति उससे बचता है। अल्लाह की ओर से यह वर्णन शराब के निषेध की प्रस्तावना है। तथा (ऐ नबी!) आपके सह़ाबा आपसे पूछते हैं कि वे अपने धन की कितनी मात्रा स्वेच्छा से और दान के रूप में खर्च करें? आप उन्हें जवाब देते हुए कह दीजिए: अपने धन में से उसे ख़र्च करो, जो तुम्हारी ज़रूरत से अधिक हो। (यह शुरू इस्लाममें था, फिर उसके बाद अल्लाह ने विशिष्ट धनों और निर्धारित निसाबों में अनिवार्य ज़कात का क़ानून बना दिया।) इसी तरह के स्पष्ट बयान के साथ, अल्लाह तुम्हारे लिए शरीयत के आदेशों को बयान करता है, ताकि तुम सोच-विचार करो।

فِى ٱلدُّنْيَا وَٱلْـَٔاخِرَةِ ۗ وَيَسْـَٔلُونَكَ عَنِ ٱلْيَتَـٰمَىٰ ۖ قُلْ إِصْلَاحٌۭ لَّهُمْ خَيْرٌۭ ۖ وَإِن تُخَالِطُوهُمْ فَإِخْوَٰنُكُمْ ۚ وَٱللَّهُ يَعْلَمُ ٱلْمُفْسِدَ مِنَ ٱلْمُصْلِحِ ۚ وَلَوْ شَآءَ ٱللَّهُ لَأَعْنَتَكُمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌۭ ﴿٢٢٠﴾

ه ه यह (उक्त विधान) इसलिए निर्धारित किया गया है ताकि तुम सोच-विचार करो कि दुनिया एवं आख़िरत में कौन-सी चीज़ तुम्हारे लिए लाभदायक है। तथा (ऐ नबी!) आपके साथी आपसे अनाथों के अभिभावक बनने के बारे में पूछते हैं कि: वे उनके साथ कै सा व्यवहार करें?क्या वे अनाथों के धन को ख़र्च, खाने-पीने और रहने-सहने में अपने धन के साथ मिला लें? आप उन्हें जवाब देते हुए कह दीजिए: यदि तुम बिना मुआवज़े के या उनके धन को अपने धन में मिलाए बिना उनके धन के सुधार के लिए काम करो, तो तुम्हारे लिए अल्लाह के निकट सबसे अच्छा और अधिक अज्र व सवाब वाला है, तथा यह उनके लिए उनके धन में उत्तम है; क्योंकि इसमें उनके धन का संरक्षण है। और यदि तुम उनके धन को अपने धन के साथ मिलाकर खाने-पीने और आवास आदि में उनके साथ साझा कर लो; तो इसमें कोई आपत्ति की बात नहीं है। क्योंकि वे तुम्हारे धार्मिक भाई हैं और भाई एक-दूसरे की मदद करते हैं और एक-दूसरे के मामलों की देख-भाल करते हैं। और अल्लाह खूब जानता है कि कौन अभिभावक अनाथों के धन को अपने साथ मिलाकर उसमें सुधार चाहता है और कौन बिगाड़ चाहता है। यदि अल्लाह यतीमों के बारे में तुम्हें परेशानी में डालना चाहता, तो वह तुम्हें अवश्य परेशानी में डाल देता। लेकिन अल्लाह ने तुम्हारे लिए उनके साथ व्यवहार का रास्ता आसान कर दिया; क्योंकि उसकी शरीयत आसानी पर आधारित है। निःसंदेह अल्लाह सब पर प्रभुत्वशाली है, उसे कोई चीज़ परास्त नहीं कर सकती। वह अपनी रचना, प्रबंधन और विधान में हिकमत वाला है।

وَلَا تَنكِحُوا۟ ٱلْمُشْرِكَـٰتِ حَتَّىٰ يُؤْمِنَّ ۚ وَلَأَمَةٌۭ مُّؤْمِنَةٌ خَيْرٌۭ مِّن مُّشْرِكَةٍۢ وَلَوْ أَعْجَبَتْكُمْ ۗ وَلَا تُنكِحُوا۟ ٱلْمُشْرِكِينَ حَتَّىٰ يُؤْمِنُوا۟ ۚ وَلَعَبْدٌۭ مُّؤْمِنٌ خَيْرٌۭ مِّن مُّشْرِكٍۢ وَلَوْ أَعْجَبَكُمْ ۗ أُو۟لَـٰٓئِكَ يَدْعُونَ إِلَى ٱلنَّارِ ۖ وَٱللَّهُ يَدْعُوٓا۟ إِلَى ٱلْجَنَّةِ وَٱلْمَغْفِرَةِ بِإِذْنِهِۦ ۖ وَيُبَيِّنُ ءَايَـٰتِهِۦ لِلنَّاسِ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ ﴿٢٢١﴾

ى ه (ऐ मोमिनो!) अल्लाह के साथ शिर्क करने वाली स्त्रियों से शादी न करो, यहाँ तक कि वे एक अल्लाह पर ईमान ले आएँ और इस्लाम में प्रवेश कर जाएँ। निश्चय अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान रखने वाली दासी, एक मूर्ति की पूजा करने वाली आज़ाद स्त्री से उत्तम है, भले ही वह अपनी सुंदरता और धन के कारण आपको पसंद हो। इसी तरह मुसलमान स्त्रियों का निकाह मुश्रिक मर्दों से न करो, निश्चय अल्लाह और उसके रसूल पर विश्वास रखने वाला एक मोमिन ग़ुलाम, एक आज़ाद मुश्रिक से उत्तम है, भले ही वह तुम्हें अच्छा लगे। ये शिर्क में लिप्त लोग - पुरुष और महिलाएँ - अपने शब्दों और कार्यों के साथ उसकी ओर बुलाते हैं, जो जहन्नममें प्रवेश करने की ओर ले जाता है। जबकि अल्लाह अच्छे कार्यों की ओर बुलाता है, जो उसकी अनुमति और अनुग्रह से जन्नत में प्रवेश करने और पापों की क्षमा का कारण बनते हैं। तथा वह अपनी आयतों को लोगों के लिए स्पष्ट करता है, ताकि वे उसपर विचार कर सकें जो उनसे इंगित होता है, फिर उसके अनुसार कार्य करें।

وَيَسْـَٔلُونَكَ عَنِ ٱلْمَحِيضِ ۖ قُلْ هُوَ أَذًۭى فَٱعْتَزِلُوا۟ ٱلنِّسَآءَ فِى ٱلْمَحِيضِ ۖ وَلَا تَقْرَبُوهُنَّ حَتَّىٰ يَطْهُرْنَ ۖ فَإِذَا تَطَهَّرْنَ فَأْتُوهُنَّ مِنْ حَيْثُ أَمَرَكُمُ ٱللَّهُ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلتَّوَّٰبِينَ وَيُحِبُّ ٱلْمُتَطَهِّرِينَ ﴿٢٢٢﴾

ه (ऐ नबी!) आपके साथी आपसे मासिक धर्म (यह एक प्राकृ तिक रक्त है जो विशिष्ट समय पर महिला के गर्भाशय से निकलता है) के बारे में पूछते हैं। आप उन्हें जवाब देते हुए कह दीजिए: मासिक धर्म पुरुष और महिला दोनों के लिए कष्टदायक (हानिकारक) है, इसलिए उसके समय पर महिलाओं के साथ संभोग करने से बचो, तथा संभोग के उद्देश्य से उनके पास न जाओ, यहाँ तक कि उनका रक्त बंद हो जाए और वे स्नान करके उससे अच्छी तरह पाक-साफ़ हो जाएँ। जब रक्त बंद हो जाए और वे उससे पवित्र हो जाएँ, तो उनसे उस तरीक़े से संभोग करो, जो अल्लाह ने तुम्हारे लिए अनुमेय किया है: इस हाल में कि वे पाक हों और उनकी योनि में संभोग किया जाए। अल्लाह उन लोगों से प्रेमकरता है, जो गुनाहों से बहुत ज़्यादा तौबा करने वाले और गंदगियों से पवित्रता हासिलकरने में अतिशयोक्ति से कामलेने वाले हैं। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

نِسَآؤُكُمْ حَرْثٌۭ لَّكُمْ فَأْتُوا۟ حَرْثَكُمْ أَنَّىٰ شِئْتُمْ ۖ وَقَدِّمُوا۟ لِأَنفُسِكُمْ ۚ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّكُم مُّلَـٰقُوهُ ۗ وَبَشِّرِ ٱلْمُؤْمِنِينَ ﴿٢٢٣﴾

तुम्हारी पत्नियाँ तुम्हारे लिए रोपण स्थान हैं, वे तुम्हारे लिए बच्चे जनती हैं; वैसे ही जैसे भूमि फल देती है। इसलिए रोपने के स्थान पर - जो कि योनि है - जिस दिशा से भी चाहो और जिस तरह भी चाहो आओ, बशर्ते कि वह योनि में हो। तथा अपने लिए अच्छे कार्य आगे भेजो, जिसमें यह भी शामिल है कि आदमी अपनी पत्नी के साथ अल्लाह की निकटता प्राप्त करने और नेक संतान की उम्मीद में संभोग करे। तथा अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर, उससे डरो। जिसमें वह भी शामिल है जो उसने महिलाओं के बारे में तुम्हारे लिए निर्धारित किया है। और जान लो कि तुम क़ियामत के दिन उससे मिलने वाले हो, उसके सामने खड़े होने वाले हो और वह तुम्हें तुम्हारे कार्यों का बदला देने वाला है। और - ऐ नबी! - मोमिनों को शुभ समाचार सुना दीजिए कि उन्हें अपने पालनहार से मुलाक़ात के समय हमेशा बाक़ी रहने वाली नेमतें मिलेंगी और अल्लाह के सम्मानित चेहरे को देखने का सौभाग्य प्राप्त होगा।

وَلَا تَجْعَلُوا۟ ٱللَّهَ عُرْضَةًۭ لِّأَيْمَـٰنِكُمْ أَن تَبَرُّوا۟ وَتَتَّقُوا۟ وَتُصْلِحُوا۟ بَيْنَ ٱلنَّاسِ ۗ وَٱللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌۭ ﴿٢٢٤﴾

अल्लाह की क़सम को नेकी करने, परहेज़गारी तथा लोगों के बीच मेल-मिलाप कराने के विरुद्ध तर्क मत बनाओ। बल्कि अगर तुम भलाई न करने की क़सम खा लो; तो भलाई का कार्य करो और अपनी क़समों का कफ़्फ़ारा अदा कर दो। तथा अल्लाह तुम्हारी बातों को सुनने वाला, तुम्हारे कार्यों को जानने वाला है, और वह तुम्हें उनका बदला देगा।

لَّا يُؤَاخِذُكُمُ ٱللَّهُ بِٱللَّغْوِ فِىٓ أَيْمَـٰنِكُمْ وَلَـٰكِن يُؤَاخِذُكُم بِمَا كَسَبَتْ قُلُوبُكُمْ ۗ وَٱللَّهُ غَفُورٌ حَلِيمٌۭ ﴿٢٢٥﴾

अल्लाह तुम्हें उन क़समों के कारण नहीं पकड़ता, जो बिना इरादे के तुम्हारी ज़बानों पर आ जाती हैं, जैसे तुममें से किसी व्यक्ति का: 'ला वल्लाह' (नहीं, अल्लाह की क़सम!) और 'बला वल्लाह' (हाँ, अल्लाह की क़सम!) कहना। इन क़समों में तुमपर न कोई कफ़्फ़ारा (प्रायश्चित) है और न कोई दंड। परंतु उन क़समों में से जिसका तुमने इरादा किया है, उसपर वह तुम्हारी पकड़ करेगा। तथा अल्लाह अपने बंदों के गुनाहों को बहुत क्षमा करने वाला, अत्यंत सहनशील है, उन्हें सज़ा देने में जल्दी नहीं करता।

لِّلَّذِينَ يُؤْلُونَ مِن نِّسَآئِهِمْ تَرَبُّصُ أَرْبَعَةِ أَشْهُرٍۢ ۖ فَإِن فَآءُو فَإِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ ﴿٢٢٦﴾

जो लोग अपनी पत्नियों से संभोग न करने की क़सम खा लेते हैं, उन्हें क़सम खाने के समय से लेकर अधिकतम चार महीने तक प्रतीक्षा करना है। जिसे 'ईला' के नाम से जाना जाता है। यदि वे संभोग न करने की क़सम खाने के बाद चार महीने या उससे कम की अवधि के भीतर अपनी पत्नियों के साथ संभोग करने की ओर वापस लौट आएँ; तो अल्लाह बहुत क्षमा करने वाला है, जो कुछ उनसे हुआ है (अल्लाह) उसे उनके लिए क्षमा कर देगा, तथा उनपर बहुत दया करने वाला है क्योंकि उसने उनके लिए इस क़सम से बाहर निकलने के लिए कफ़्फ़ारा निर्धारित किया है।

وَإِنْ عَزَمُوا۟ ٱلطَّلَـٰقَ فَإِنَّ ٱللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٌۭ ﴿٢٢٧﴾

तथा यदि वे अपनी स्त्रियों के साथ संभोग को छोड़ना जारी रखते हुए और उसकी ओर वापस न लौटकर तलाक़ का इरादा कर लें, तो अल्लाह उनकी बातों को सुनने वाला है, जिनमें से तलाक़ भी शामिल है, उनकी स्थितियों और उनके इरादों को जानता है और उन्हें उनका बदला देगा। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

وَٱلْمُطَلَّقَـٰتُ يَتَرَبَّصْنَ بِأَنفُسِهِنَّ ثَلَـٰثَةَ قُرُوٓءٍۢ ۚ وَلَا يَحِلُّ لَهُنَّ أَن يَكْتُمْنَ مَا خَلَقَ ٱللَّهُ فِىٓ أَرْحَامِهِنَّ إِن كُنَّ يُؤْمِنَّ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ ۚ وَبُعُولَتُهُنَّ أَحَقُّ بِرَدِّهِنَّ فِى ذَٰلِكَ إِنْ أَرَادُوٓا۟ إِصْلَـٰحًۭا ۚ وَلَهُنَّ مِثْلُ ٱلَّذِى عَلَيْهِنَّ بِٱلْمَعْرُوفِ ۚ وَلِلرِّجَالِ عَلَيْهِنَّ دَرَجَةٌۭ ۗ وَٱللَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌ ﴿٢٢٨﴾

तलाक़शुदा औरतें तीन मासिक धर्म तक प्रतीक्षा करेंगी, जिसके दौरान वे शादी नहीं करेंगी। तथा उनके लिए यह जायज़ नहीं है कि वे उस गर्भ को छिपाएँ, जो अल्लाह ने उनके गर्भाशयों में पैदा किया है, यदि वे अल्लाह तथा अंतिम दिन पर अपने ईमान में सच्ची हैं। तथा उन्हें तलाक़ देने वाले उनके पतियों को प्रतीक्षा अवधि के दौरान उन्हें लौटाने का अधिक अधिकार है, यदि उनके लौटाने का उद्देश्य प्यार-मोहब्बत (से रहना) और तलाक़ के कारण पैदा होने वाले मनमुटाव को दूर करना हो। तथा पत्नियों के लिए भी परंपरा के अनुसार उसी प्रकार अधिकार और कर्तव्य हैं, जिस तरह उनके पतियों के लिए उनके ऊपर हैं। जबकि पुरुषों को स्त्रियों पर एक दर्जा (वरीयता) प्राप्त है, जैसे संरक्षकता और तलाक़ का अधिकार। और अल्लाह सब पर प्रभुत्वशाली है, उसे कोई चीज़ परास्त नहीं कर सकती। वह अपनी शरीयत (विधान) और प्रबंधन में हिकमत वाला है।

ٱلطَّلَـٰقُ مَرَّتَانِ ۖ فَإِمْسَاكٌۢ بِمَعْرُوفٍ أَوْ تَسْرِيحٌۢ بِإِحْسَـٰنٍۢ ۗ وَلَا يَحِلُّ لَكُمْ أَن تَأْخُذُوا۟ مِمَّآ ءَاتَيْتُمُوهُنَّ شَيْـًٔا إِلَّآ أَن يَخَافَآ أَلَّا يُقِيمَا حُدُودَ ٱللَّهِ ۖ فَإِنْ خِفْتُمْ أَلَّا يُقِيمَا حُدُودَ ٱللَّهِ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَا فِيمَا ٱفْتَدَتْ بِهِۦ ۗ تِلْكَ حُدُودُ ٱللَّهِ فَلَا تَعْتَدُوهَا ۚ وَمَن يَتَعَدَّ حُدُودَ ٱللَّهِ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلظَّـٰلِمُونَ ﴿٢٢٩﴾

ऐसा तलाक़ जिसमें पति अपनी पत्नी को लौटाने का अधिकार रखता है, दो बार है। इस प्रकार कि वह तलाक़ दे, फिर लौटा ले, फिर (दूसरी बार) तलाक़ दे, फिर लौटा ले। फिर दो तलाक़ों के बाद या तो उसे अच्छे सहवास के साथ अपने पत्नीत्व में रखे, या उसके साथ भलाई करते हुए और उसके अधिकारों को पूरा करते हुए उसे तीसरा तलाक़ दे दे। तथा - ऐ पतियो! - तुम्हारे लिए अपनी पत्नियों को दी हुई महर में से कु छ भी लेना हलाल नहीं है। हाँ, यदि पत्नी अपने पति को उसके चरित्र अथवा रंग-रूप के कारण नापसंद करती हो और दंपति इस नफरत के कारण सोचते हैं कि वे अपने अधिकारों को पूरा नहीं कर सकें गे, तो वे अपना मामला उस व्यक्ति के सामने पेश करें जिसके साथ उनकी रिश्तेदारी या संबंध हो। अब अगर अभिभावकों को डर है कि वे दोनों आपस में अपने वैवाहिक अधिकारों को पूरा नहीं कर सकें गे, तो दोनों पर कोई पाप नहीं है कि पत्नी अपने पति को उसे अलग करने के बदले में कु छ धन भुगतान करके ख़ुला' ले ले। ये शरई अहकाम, हलालएवं हराम(अनुमेय और निषिद्ध) के बीच विभाजक हैं, इसलिए उनसे आगे न बढ़ो, और जो कोई भी हलाल एवं हराम के बीच अल्लाह की सीमाओं को पार करता है; तो वही लोग अपने आपको विनाश के साधनों पर लाकर और उन्हें अल्लाह के क्रोध और दंड का भागी बनाकर स्वयं पर अत्याचार करने वाले हैं।

فَإِن طَلَّقَهَا فَلَا تَحِلُّ لَهُۥ مِنۢ بَعْدُ حَتَّىٰ تَنكِحَ زَوْجًا غَيْرَهُۥ ۗ فَإِن طَلَّقَهَا فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَآ أَن يَتَرَاجَعَآ إِن ظَنَّآ أَن يُقِيمَا حُدُودَ ٱللَّهِ ۗ وَتِلْكَ حُدُودُ ٱللَّهِ يُبَيِّنُهَا لِقَوْمٍۢ يَعْلَمُونَ ﴿٢٣٠﴾

यदि उसका पति उसे तीसरा तलाक़ दे दे, तो पति के लिए उससे पुनर्विवाह करने की अनुमति नहीं है, यहाँ तक कि वह स्त्री किसी अन्य पुरुष से विवाह करे, जो (जीवन बसर करने की) इच्छा से, एक वैध विवाह हो, (प्रथम पति के लिए) हलाल करने के उद्देश्य से न हो, और वह इस विवाह में उसके साथ संभोग करे। फिर यदि दूसरा पति उसे तलाक़ दे दे या मर जाए; तो उस स्त्री और उसके प्रथम पति पर कोई पाप नहीं है कि वे एक नए अनुबंध और नयी महर के साथ आपस में रुजू' (दोबारा मिलाप) कर लें, अगर उन्हें प्रबलगुमान है कि वे अपने प्रति अनिवार्य शरई नियमों का पालन करेंगे। इन शरई नियमों को अल्लाह उन लोगों के लिए खोलकर बयान करता है, जो उसके नियमों और सीमाओं को जानते हैं; क्योंकि वही लोग इनसे लाभ उठाते हैं।

وَإِذَا طَلَّقْتُمُ ٱلنِّسَآءَ فَبَلَغْنَ أَجَلَهُنَّ فَأَمْسِكُوهُنَّ بِمَعْرُوفٍ أَوْ سَرِّحُوهُنَّ بِمَعْرُوفٍۢ ۚ وَلَا تُمْسِكُوهُنَّ ضِرَارًۭا لِّتَعْتَدُوا۟ ۚ وَمَن يَفْعَلْ ذَٰلِكَ فَقَدْ ظَلَمَ نَفْسَهُۥ ۚ وَلَا تَتَّخِذُوٓا۟ ءَايَـٰتِ ٱللَّهِ هُزُوًۭا ۚ وَٱذْكُرُوا۟ نِعْمَتَ ٱللَّهِ عَلَيْكُمْ وَمَآ أَنزَلَ عَلَيْكُم مِّنَ ٱلْكِتَـٰبِ وَٱلْحِكْمَةِ يَعِظُكُم بِهِۦ ۚ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمٌۭ ﴿٢٣١﴾

ه ه जब तुम अपनी पत्नियों को तलाक़ दे दो और वे अपनी प्रतीक्षा अवधि के अंत होने के क़रीब हो जाएँ; तो तुम्हारे लिए अनुमेय है कि उन्हें लौटा लो, अथवा उन्हें बिना लौटाए उचित तरीक़े से छोड़ दो यहाँ तक कि उनकी इद्दत ख़त्म हो जाए। तथा उनपर अत्याचार करने और उन्हें नुक़सान पहुँचाने के उद्देश्य से न लौटाओ, जैसा कि जाहिलिय्यत (पूर्व-इस्लामिक युग) में किया जाता था। जो कोई भी ऐसा उन्हें नुक़सान पहुँचाने के इरादे से करे; तो निश्चय उसने अपने आपको पाप और दंड का भागी बनाकर खुद पर अत्याचार किया। तथा अल्लाह की आयतों को उनके साथ खिलवाड़ करके और उनके विरुद्ध साहस दिखाकर उपहास का विषय न बनाओ। और अपने بلغ क़ुरआन · तफ़सीर ऊपर अल्लाह की नेमतों को याद करो, जिनमें से सबसे बड़ी नेमत उसका तुमपर क़ु रआन एवं सुन्नत का उतारना है। वह तुम्हें इसके द्वारा प्रलोभन और धमकी के रूप में उपदेश देता है। तथा अल्लाह से, उसके आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर, डरो और जान लो कि अल्लाह हर चीज़ को जानने वाला है। अतः उससे कोई चीज़ छिपी नहीं है और वह तुम्हें तुम्हारे कर्मों का बदला देगा।

وَإِذَا طَلَّقْتُمُ ٱلنِّسَآءَ فَبَلَغْنَ أَجَلَهُنَّ فَلَا تَعْضُلُوهُنَّ أَن يَنكِحْنَ أَزْوَٰجَهُنَّ إِذَا تَرَٰضَوْا۟ بَيْنَهُم بِٱلْمَعْرُوفِ ۗ ذَٰلِكَ يُوعَظُ بِهِۦ مَن كَانَ مِنكُمْ يُؤْمِنُ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ ۗ ذَٰلِكُمْ أَزْكَىٰ لَكُمْ وَأَطْهَرُ ۗ وَٱللَّهُ يَعْلَمُ وَأَنتُمْ لَا تَعْلَمُونَ ﴿٢٣٢﴾

ه जब तुम अपनी पत्नियों को तीन से कम तलाक़ दो और उनकी प्रतीक्षा अवधि (इद्दत) समाप्त हो जाए, तो - ऐ अभिभावको! - उन्हें उस समय नए निकाह के साथ अपने पतियों के पास लौटने से न रोको, यदि वे ऐसा करना चाहें और अपने पतियों के साथ उसपर सहमत हो जाएँ। उन्हें मना करने के निषेध पर आधारित इस हुक्मका उपदेश उसे दिया जा रहा है, जो तुम में से अल्लाह तथा अंतिम दिन (प्रलय) पर ईमान रखता है। इससे तुम्हारे बीच भलाई को अधिक बढ़ावा मिलेगा तथा तुम्हारी इस्मतें और तुम्हारे कर्म गंदगियों से अधिक पवित्र रहेंगे। अल्लाह सारे मामलों के तथ्यों और उनके परिणामों से अवगत है, और तुमइनसे अनभिज्ञ हो।

۞ وَٱلْوَٰلِدَٰتُ يُرْضِعْنَ أَوْلَـٰدَهُنَّ حَوْلَيْنِ كَامِلَيْنِ ۖ لِمَنْ أَرَادَ أَن يُتِمَّ ٱلرَّضَاعَةَ ۚ وَعَلَى ٱلْمَوْلُودِ لَهُۥ رِزْقُهُنَّ وَكِسْوَتُهُنَّ بِٱلْمَعْرُوفِ ۚ لَا تُكَلَّفُ نَفْسٌ إِلَّا وُسْعَهَا ۚ لَا تُضَآرَّ وَٰلِدَةٌۢ بِوَلَدِهَا وَلَا مَوْلُودٌۭ لَّهُۥ بِوَلَدِهِۦ ۚ وَعَلَى ٱلْوَارِثِ مِثْلُ ذَٰلِكَ ۗ فَإِنْ أَرَادَا فِصَالًا عَن تَرَاضٍۢ مِّنْهُمَا وَتَشَاوُرٍۢ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَا ۗ وَإِنْ أَرَدتُّمْ أَن تَسْتَرْضِعُوٓا۟ أَوْلَـٰدَكُمْ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ إِذَا سَلَّمْتُم مَّآ ءَاتَيْتُم بِٱلْمَعْرُوفِ ۗ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌۭ ﴿٢٣٣﴾

माताएँ अपने बच्चों को पूरे दो साल तक दूध पिलाएँ। दो साल की यह समय सीमा उसके लिए है, जो दूध पिलाने की अवधि पूरी करना चाहता हो। बच्चे के पिता पर तलाक़शुदा दूध पिलाने वाली माताओं के ख़र्च और उनके कपड़ों की ज़िम्मेदारी है, उसके अनुसार जो लोगों में प्रचलित है, जो शरीयत के विरुद्ध न हो। अल्लाह किसी व्यक्ति पर उसकी क्षमता एवं शक्ति से अधिक बोझ नहीं डालता। माता-पिता में से किसी के लिए जायज़ नहीं है कि बच्चे को दूसरे को नुक़सान पहुँचाने का माध्यम बना ले। यदि बाप न हो और बच्चे के पास धन न हो, तो बच्चे के वारिस (उत्तराधिकारी) पर भी उसी प्रकार के अधिकार हैं जो पिता पर होते हैं। यदि माता-पिता दो साल पूरे होने से पहले ही बच्चे का दूध छु ड़ाना चाहें और दोनों बच्चे के हित को ध्यान में रखते हुए आपसी परामर्श और सहमति के बाद यह क़दम उठाएँ, तो उनपर कोई गुनाह नहीं है। फिर यदि तुम अपने बच्चों के लिए उनकी माताओं के अलावा अन्य दूध पिलाने वालियाँ रखना चाहो, तो तुमपर कोई गुनाह नहीं, यदि दूध पिलाने वाली के साथ जिस पारिश्रमिक पर सहमत हुए हो, उसे बिना कमी-बेशी अथवा टाल-मटोल के अदा कर दो। अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से दूर रहकर उससे डरो, और जान लो कि जो कु छ तुम करते हो, अल्लाह उसे देखता है, चुनाँचे उसमें से कु छ भी उससे छिपा नहीं है, और वह तुम्हारे किए हुए कामों के लिए तुम्हें प्रतिफल देगा।

وَٱلَّذِينَ يُتَوَفَّوْنَ مِنكُمْ وَيَذَرُونَ أَزْوَٰجًۭا يَتَرَبَّصْنَ بِأَنفُسِهِنَّ أَرْبَعَةَ أَشْهُرٍۢ وَعَشْرًۭا ۖ فَإِذَا بَلَغْنَ أَجَلَهُنَّ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ فِيمَا فَعَلْنَ فِىٓ أَنفُسِهِنَّ بِٱلْمَعْرُوفِ ۗ وَٱللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌۭ ﴿٢٣٤﴾

जो लोग मर जाते हैं और अपने पीछे अगर्भवती पत्नियाँ छोड़ जाते हैं; वे पत्नियाँ अनिवार्य रूप से चार महीने और दस दिन की अवधि के लिए अपने आपको प्रतीक्षा में रखेंगी, जिसके दौरान वे पति के घर से निकलने, श्रृंगार करने और विवाह से बचेंगी। जब यह अवधि समाप्त हो जाए; तो - ऐ अभिभावको! - तुमपर कोई पाप नहीं कि वे शरई और प्रथागत तरीक़े के अनुसार, वह कार्य करें जो उस अवधि के दौरान उनके लिए वर्जित था। तथा अल्लाह उससे, जो कु छ तुम करते हो, भली-भाँति अवगत है। उससे तुम्हारे प्रोक्ष और प्रत्यक्ष में से कोई चीज़ छिपी नहीं है और वह तुम्हें उसका बदला देगा।

وَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ فِيمَا عَرَّضْتُم بِهِۦ مِنْ خِطْبَةِ ٱلنِّسَآءِ أَوْ أَكْنَنتُمْ فِىٓ أَنفُسِكُمْ ۚ عَلِمَ ٱللَّهُ أَنَّكُمْ سَتَذْكُرُونَهُنَّ وَلَـٰكِن لَّا تُوَاعِدُوهُنَّ سِرًّا إِلَّآ أَن تَقُولُوا۟ قَوْلًۭا مَّعْرُوفًۭا ۚ وَلَا تَعْزِمُوا۟ عُقْدَةَ ٱلنِّكَاحِ حَتَّىٰ يَبْلُغَ ٱلْكِتَـٰبُ أَجَلَهُۥ ۚ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ يَعْلَمُ مَا فِىٓ أَنفُسِكُمْ فَٱحْذَرُوهُ ۚ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌ حَلِيمٌۭ ﴿٢٣٥﴾

ى शादी करने की इच्छा घोषित किए बिना, पति की मृत्यु अथवा 'तलाक़े बाइन' की इद्दत गुज़ारने वाली स्त्री को शादी के संदेश का संके त देने में तुमपर कोई पाप नहीं है; जैसे कि वह कहे: जब तुम्हारी प्रतीक्षा अवधि समाप्त हो जाए, तो मुझे बताओ। तथा इसमें भी तुमपर कोई गुनाह नहीं है कि तुमने इद्दत गुज़ारने वाली स्त्री से उसकी بلغ क़ुरआन · तफ़सीर प्रतीक्षा अवधि समाप्त होने के बाद निकाह करने की इच्छा को अपने दिल में छिपाए रखा है। अल्लाह जानता है कि तुम उनके लिए अपनी तीव्र इच्छा के कारण उन्हें अवश्य याद करोगे, इसलिए उसने तुम्हें बिना घोषणा किए संकेत देने की अनुमति प्रदान की। तथा जब वे प्रतीक्षा अवधि में हों, तो एक-दूसरे से गुप्त रूप से शादी का वादा करने से सावधान रहो। सिवाय प्रथागत बात के और वह सांके तिक रूप से बात कहना है। तथा प्रतीक्षा अवधि के दौरान विवाह का अनुबंध पक्का न करो। और यह जान लो कि अल्लाह जानता है कि उसने तुम्हारे लिए जो कु छ हलाल किया है और जो कु छ तुमपर हराम ठहराया है, उसमें से कौन-सी बात तुम अपने दिलों में छिपाए हुए हो। इसलिए उससे सावधान रहो और उसकी आज्ञा का उल्लंघन न करो। तथा जान लो कि अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों को क्षमा करने वाला, अत्यंत सहनशीलहै, सज़ा देने में जल्दी नहीं करता।

لَّا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ إِن طَلَّقْتُمُ ٱلنِّسَآءَ مَا لَمْ تَمَسُّوهُنَّ أَوْ تَفْرِضُوا۟ لَهُنَّ فَرِيضَةًۭ ۚ وَمَتِّعُوهُنَّ عَلَى ٱلْمُوسِعِ قَدَرُهُۥ وَعَلَى ٱلْمُقْتِرِ قَدَرُهُۥ مَتَـٰعًۢا بِٱلْمَعْرُوفِ ۖ حَقًّا عَلَى ٱلْمُحْسِنِينَ ﴿٢٣٦﴾

जिन पत्नियों से तुमने निकाह किया है, यदि तुम उन्हें उनके साथ संभोग करने से पहले तथा उनके लिए एक विशिष्ट महर निर्धारित करने से पहले तलाक़ दे दो, तो तुमपर कोई पाप नहीं है। यदि तुम उन्हें इस स्थिति में तलाक़ देते हो, तो तुमपर उनके लिए कोई महर वाजिब नहीं होगी। लेकिन आदमी धनी हो या निर्धन उस पर यह ज़रूरी होगा कि अपनी क्षमता के अनुसार उन्हें कु छ दे दे, जिससे वे लाभ उठा सकें और उनके टूटे हुए दिलकी सांत्वना हो जाए। यह देना उन लोगों पर एक निश्चित अधिकार है, जो अपने कार्यों और लेनदेन में सदाचारी हैं।

وَإِن طَلَّقْتُمُوهُنَّ مِن قَبْلِ أَن تَمَسُّوهُنَّ وَقَدْ فَرَضْتُمْ لَهُنَّ فَرِيضَةًۭ فَنِصْفُ مَا فَرَضْتُمْ إِلَّآ أَن يَعْفُونَ أَوْ يَعْفُوَا۟ ٱلَّذِى بِيَدِهِۦ عُقْدَةُ ٱلنِّكَاحِ ۚ وَأَن تَعْفُوٓا۟ أَقْرَبُ لِلتَّقْوَىٰ ۚ وَلَا تَنسَوُا۟ ٱلْفَضْلَ بَيْنَكُمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ ﴿٢٣٧﴾

ى ه यदि तुमअपनी उन पत्नियों को जिनसे तुमने निकाह किया है, उनके साथ संभोग करने से पहले तलाक़ दे दो, जबकि तुमउनके लिए एक विशिष्ट महर निर्धारित कर चुके हो, तो तुम्हें उन्हें निर्धारित महर का आधा भुगतान करना होगा, परंतु यह कि वे - यदि वे समझदार हों - उसे तुम्हारे लिए माफ़ कर दें, अथवा पतिगण स्वयं उन्हें पूरा महर दे दें। तुम्हारा अपने बीच अधिकारों के प्रति सहिष्णु होना अल्लाह के भय और उसकी आज्ञाकारिता के अधिक निकट है। तथा - ऐ लोगो! - तुम एक-दूसरे पर उपकार करना और अधिकारों के बारे में क्षमा से कामलेना न छोड़ो। क्योंकि अल्लाह जो तुमकरते हो, उसे देख रहा है। इसलिए ख़ूब भलाई करो, ताकि उसपर अल्लाह का बदला पाओ।

حَـٰفِظُوا۟ عَلَى ٱلصَّلَوَٰتِ وَٱلصَّلَوٰةِ ٱلْوُسْطَىٰ وَقُومُوا۟ لِلَّهِ قَـٰنِتِينَ ﴿٢٣٨﴾

नमाज़ों को अल्लाह के आदेश के अनुसार पूर्ण रूप से अदा करके, उनका संरक्षण (पाबंदी) करो और समस्त नमाज़ों के बीच मध्य नमाज़ अर्थात् अस्र की नमाज़ का संरक्षण (पाबंदी) करो और अपनी नमाज़ में अल्लाह के आज्ञाकारी बनकर विनयपूर्वक खड़े रहो।

فَإِنْ خِفْتُمْ فَرِجَالًا أَوْ رُكْبَانًۭا ۖ فَإِذَآ أَمِنتُمْ فَٱذْكُرُوا۟ ٱللَّهَ كَمَا عَلَّمَكُم مَّا لَمْ تَكُونُوا۟ تَعْلَمُونَ ﴿٢٣٩﴾

यदि तुम्हें किसी शत्रु आदि का भय हो और नमाज़ को संपूर्ण रूप से अदा करने में सक्षम न हो, तो अपने पैरों पर चलते हुए, या ऊँट और घोड़े आदि पर सवार होकर, अथवा जिस तरह भी तुम सक्षम हो, नमाज़ पढ़ो। फिर जब तुम्हारा डर दूर हो जाए, तो सभी प्रकार के ज़िक्र के साथ अल्लाह को याद करो, जिसमें नमाज़ को पूर्ण रूप से अदा करना भी शामिल है, जैसे उसने तुम्हें उस प्रकाश और मार्गदर्शन की शिक्षा दी, जिसे तुम नहीं जानते थे।

وَٱلَّذِينَ يُتَوَفَّوْنَ مِنكُمْ وَيَذَرُونَ أَزْوَٰجًۭا وَصِيَّةًۭ لِّأَزْوَٰجِهِم مَّتَـٰعًا إِلَى ٱلْحَوْلِ غَيْرَ إِخْرَاجٍۢ ۚ فَإِنْ خَرَجْنَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ فِى مَا فَعَلْنَ فِىٓ أَنفُسِهِنَّ مِن مَّعْرُوفٍۢ ۗ وَٱللَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌۭ ﴿٢٤٠﴾

तुममें से जो मर जाते हैं और अपने पीछे पत्नियाँ छोड़ जाते हैं, वे आवश्यक रूप से अपनी पत्नियों के लिए वसीयत कर जाएँ कि उनके लिए पूरे एक वर्ष के आवास और खर्च (रखरखाव) का प्रबंध किया जाए, और तुम्हारे वारिस उन्हें घर से न निकालें। ऐसा आदेश उन्हें पहुँचने वाली मुसीबत की क्षतिपूर्ति के लिए और मृतक के प्रति वफ़ादारी निभाने के लिए दिया गया है। यदि वे एक साल पूरा होने से पहले अपनी मर्ज़ी से निकल जाएँ, तो न तो तुमपर पाप है और न ही उन पर, जो वे अपने आप में बनाव-शृंगार और सुगंध का इस्तेमाल करें। अल्लाह सब पर प्रभुत्वशाली है, उसपर किसी का ज़ोर नहीं चलता। वह अपने प्रबंधन, विधान और नियति में हिकमतم वाला है। जमहूर (बहुसंख्यक) मुफ़स्सिरीन का मानना है कि इस आयत का हुक्म अल्लाह तआला के इस कथन द्वारा निरस्त कर दिया गया है: {ونريذو منك فونيتو ينالذو दस और महीने चार आपको अपने (पत्नियाँ) वे ,जाएँ छोड़ पत्नियाँ और जाएँ मर से तुममें लोग जो ''और )البقرة: ٢٣٤( } أزواجا يتربص ن بأنفس هن أربعة أش هر وعش را بلغ क़ुरआन · तफ़सीर दिन प्रतीक्षा में रखें।'' (सूरतुल्-बक़रा: 234)

وَلِلْمُطَلَّقَـٰتِ مَتَـٰعٌۢ بِٱلْمَعْرُوفِ ۖ حَقًّا عَلَى ٱلْمُتَّقِينَ ﴿٢٤١﴾

तलाक़शुदा महिलाओं को, पति की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए रीति के अनुसार, कपड़ा या पैसा या अन्य चीज़ों के रूप में, कु छ न कु छ सामग्री देना चाहिए; ताकि तलाक़ के कारण उनके टूटे हुए दिलों की सांत्वना हो सके । यह हुक्म उन लोगों पर एक निश्चित (अनिवार्य) अधिकार है, जो अल्लाह से, उसके आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर, डरने वाले हैं।

كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ ٱللَّهُ لَكُمْ ءَايَـٰتِهِۦ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ ﴿٢٤٢﴾

उक्त स्पष्टीकरण की तरह, अल्लाह तुम्हारे लिए - ऐ मोमिनो! - अपनी सीमाओं और आदेशों पर आधारित आयतों को स्पष्ट करता है; ताकि तुम उन्हें समझो और उनपर अमल करो, जिसके परिणामस्वरूप तुम्हें दुनिया एवं आख़िरत में भलाई प्राप्त हो।

۞ أَلَمْ تَرَ إِلَى ٱلَّذِينَ خَرَجُوا۟ مِن دِيَـٰرِهِمْ وَهُمْ أُلُوفٌ حَذَرَ ٱلْمَوْتِ فَقَالَ لَهُمُ ٱللَّهُ مُوتُوا۟ ثُمَّ أَحْيَـٰهُمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَذُو فَضْلٍ عَلَى ٱلنَّاسِ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَ ٱلنَّاسِ لَا يَشْكُرُونَ ﴿٢٤٣﴾

(ऐ नबी!) क्या आपके संज्ञान में उन लोगों की ख़बर नहीं आई, जो महामारी या किसी और कारण मौत के डर से, अपने घरों को छोड़कर निकल पड़े, जबकि वे बहुत बड़ी संख्या में थे। वे बनी इसराईलका एक समूह थे। अल्लाह ने उनसे कहा: मर जाओ; सो वे मर गए। फिर अल्लाह ने उन्हें जीवित कर दिया। ताकि उनके लिए यह तथ्य स्पष्ट कर दे कि सारा मामला उसी महिमावान् के हाथ में है और यह कि वे अपने लिए किसी लाभ या हानि के मालिक नहीं हैं। निःसंदेह अल्लाह लोगों के प्रति उदार और अनुग्रहकारी है, परंतु अधिकांश लोग अल्लाह का उसकी नेमतों पर शुक्रिया अदा नहीं करते।

وَقَـٰتِلُوا۟ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٌۭ ﴿٢٤٤﴾

(ऐ मोमिनो!) अल्लाह के धर्म के समर्थन और उसके वचन को सर्वोच्च करने के लिए, उसके शत्रुओं से युद्ध करो और जान लो कि अल्लाह तुम्हारी बातों को सुनने वाला, तुम्हारे इरादों और कार्यों को जानने वाला है, और वह तुम्हें उनका बदला देगा।

مَّن ذَا ٱلَّذِى يُقْرِضُ ٱللَّهَ قَرْضًا حَسَنًۭا فَيُضَـٰعِفَهُۥ لَهُۥٓ أَضْعَافًۭا كَثِيرَةًۭ ۚ وَٱللَّهُ يَقْبِضُ وَيَبْصُۜطُ وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ ﴿٢٤٥﴾

वह कौन व्यक्ति है जो क़र्ज़ देने वाले का कार्य करे, चुनाँचे वह अच्छे इरादे और अच्छे मन के साथ अल्लाह के मार्ग में अपना धन ख़र्च करे, ताकि वह उसके पास बहुत अधिक गुना होकर वापस आए? अल्लाह अपनी हिकमत और न्याय के साथ जीविका, स्वास्थ्य और अन्य में (कभी) तंगी करता है, तथा (कभी) उन सब में विस्तार करता है। तथा आख़िरत में तुम उसी की ओर लौटाए जाओगे, फिर वह तुम्हें तुम्हारे कार्यों का बदला प्रदान करेगा।

أَلَمْ تَرَ إِلَى ٱلْمَلَإِ مِنۢ بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ مِنۢ بَعْدِ مُوسَىٰٓ إِذْ قَالُوا۟ لِنَبِىٍّۢ لَّهُمُ ٱبْعَثْ لَنَا مَلِكًۭا نُّقَـٰتِلْ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ ۖ قَالَ هَلْ عَسَيْتُمْ إِن كُتِبَ عَلَيْكُمُ ٱلْقِتَالُ أَلَّا تُقَـٰتِلُوا۟ ۖ قَالُوا۟ وَمَا لَنَآ أَلَّا نُقَـٰتِلَ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ وَقَدْ أُخْرِجْنَا مِن دِيَـٰرِنَا وَأَبْنَآئِنَا ۖ فَلَمَّا كُتِبَ عَلَيْهِمُ ٱلْقِتَالُ تَوَلَّوْا۟ إِلَّا قَلِيلًۭا مِّنْهُمْ ۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌۢ بِٱلظَّـٰلِمِينَ ﴿٢٤٦﴾

(ऐ नबी!) क्या आपके संज्ञान में मूसा अलैहिस्सलाम के समय के बाद बनी इसराईल के प्रमुखों की ख़बर नहीं आई, जब उन्होंने अपने एक नबी से कहा: हमारे लिए एक बादशाह स्थापित कर दीजिए, जिसके साथ मिलकर हम अल्लाह के रास्ते में युद्ध करें। तो उनके नबी ने उनसे कहा: हो सकता है कि यदि तुमपर युद्ध करना अनिवार्य कर दिया जाए, तो तुम अल्लाह के मार्ग में युद्ध न करो! उन्होंने अपने बारे में नबी के गुमान का खंडन करते हुए कहा: कौन सी बाधा हमें अल्लाह के मार्ग में लड़ने से रोकती है जबकि ऐसे कारण मौजूद हैं जो हमसे ऐसा करने की अपेक्षा करते हैं? क्योंकि हमारे शत्रुओं ने हमें हमारे घर से निकाल दिया, और हमारे बच्चों को बंदी बना लिया। इसलिए हम अपनी मातृभूमि को बहाल करने और अपने क़ै दियों को मुक्त कराने के लिए लड़ेंगे। परंतु जब अल्लाह ने उनपर युद्ध फ़र्ज़ कर दिया, तो वे पीछे हट गए, क्योंकि उनमें से कु छ को छोड़कर, उन्होंने जो वादा किया था उसे पूरा नहीं किया। तथा अल्लाह उन अत्याचारियों को खूब जानने वाला है, जो उसकी आज्ञा से मुकर जाने वाले, उसके वचन को तोड़ देने वाले हैं, और वह उन्हें उसका बदला देगा। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

وَقَالَ لَهُمْ نَبِيُّهُمْ إِنَّ ٱللَّهَ قَدْ بَعَثَ لَكُمْ طَالُوتَ مَلِكًۭا ۚ قَالُوٓا۟ أَنَّىٰ يَكُونُ لَهُ ٱلْمُلْكُ عَلَيْنَا وَنَحْنُ أَحَقُّ بِٱلْمُلْكِ مِنْهُ وَلَمْ يُؤْتَ سَعَةًۭ مِّنَ ٱلْمَالِ ۚ قَالَ إِنَّ ٱللَّهَ ٱصْطَفَىٰهُ عَلَيْكُمْ وَزَادَهُۥ بَسْطَةًۭ فِى ٱلْعِلْمِ وَٱلْجِسْمِ ۖ وَٱللَّهُ يُؤْتِى مُلْكَهُۥ مَن يَشَآءُ ۚ وَٱللَّهُ وَٰسِعٌ عَلِيمٌۭ ﴿٢٤٧﴾

उनके नबी ने उनसे कहा: अल्लाह ने तालूत को तुमपर बादशाह निर्धारित किया है, ताकि तुमउसके झंडे तले लड़ो। उनके प्रमुखों ने इसचयन का खंडन करते और इसपर आपत्ति जताते हुए कहा: वह हमपर राज्य कै से कर सकता है, जबकि हमराज्य के उससे अधिक योग्य हैं; क्योंकि वह राजाओं के पुत्रों में से नहीं है और न ही उसे कोई बड़ी संपत्ति दी गई है, जिससे वह राज-काज पर सहायता ले सके ?! उनके नबी ने उनसे कहा: अल्लाह ने उसे तुम्हारे ऊपर चुन लिया है और तुमसे अधिक ज्ञान में विस्तार तथा शारीरिक बल प्रदान किया है। और अल्लाह अपनी हिकमत और दया से जिसे चाहता है उसे अपना राज्य प्रदान करता है। अल्लाह बहुत विस्तृत अनुग्रह वाला है, वह जिसे चाहता है देता है, वह जानता है कि उसकी सृष्टि में कौन उसका हक़दार है।

وَقَالَ لَهُمْ نَبِيُّهُمْ إِنَّ ءَايَةَ مُلْكِهِۦٓ أَن يَأْتِيَكُمُ ٱلتَّابُوتُ فِيهِ سَكِينَةٌۭ مِّن رَّبِّكُمْ وَبَقِيَّةٌۭ مِّمَّا تَرَكَ ءَالُ مُوسَىٰ وَءَالُ هَـٰرُونَ تَحْمِلُهُ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَةًۭ لَّكُمْ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ ﴿٢٤٨﴾

उनके नबी ने उनसे कहा: उसके तुम्हारे ऊपर राजा चुने जाने की सच्चाई की निशानी यह है कि अल्लाह तुम्हें वह ताबूत - यह एक संदूक़ था जिसका बनी इसराईल सम्मान करते थे, जो उनसे छीन लिया गया था - लौटा देगा, जिसमें एक संतोष है जो उसके साथ है, तथा मूसा और हारून के घरानों द्वारा छोड़े गए अवशेष हैं, जैसे लाठी और कु छ तख़्तियाँ। निःसंदेह इसमें तुम्हारे लिए एक स्पष्ट निशानी है, यदि तुमसच में ईमान वाले हो।

فَلَمَّا فَصَلَ طَالُوتُ بِٱلْجُنُودِ قَالَ إِنَّ ٱللَّهَ مُبْتَلِيكُم بِنَهَرٍۢ فَمَن شَرِبَ مِنْهُ فَلَيْسَ مِنِّى وَمَن لَّمْ يَطْعَمْهُ فَإِنَّهُۥ مِنِّىٓ إِلَّا مَنِ ٱغْتَرَفَ غُرْفَةًۢ بِيَدِهِۦ ۚ فَشَرِبُوا۟ مِنْهُ إِلَّا قَلِيلًۭا مِّنْهُمْ ۚ فَلَمَّا جَاوَزَهُۥ هُوَ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ مَعَهُۥ قَالُوا۟ لَا طَاقَةَ لَنَا ٱلْيَوْمَ بِجَالُوتَ وَجُنُودِهِۦ ۚ قَالَ ٱلَّذِينَ يَظُنُّونَ أَنَّهُم مُّلَـٰقُوا۟ ٱللَّهِ كَم مِّن فِئَةٍۢ قَلِيلَةٍ غَلَبَتْ فِئَةًۭ كَثِيرَةًۢ بِإِذْنِ ٱللَّهِ ۗ وَٱللَّهُ مَعَ ٱلصَّـٰبِرِينَ ﴿٢٤٩﴾

ه जब तालूत सेनाओं के साथ नगर से निकले, तो उनसे कहा: निःसंदेह अल्लाह तुम्हें एक नहर द्वारा आज़माने वाला है। सो जिसने उसमें से पी लिया, वह मेरे मार्ग पर नहीं है और युद्ध में मेरे साथ नहीं चलेगा। और जिसने उसमें से नहीं पिया, वह मेरे मार्ग पर है और युद्ध में मेरे साथ चलेगा। परंतु जो कोई मजबूर हो जाए और एक चुल्लू भर पानी पी ले, तो उस पर कुछ भी नहीं है। लेकिन सभी सैनिकों ने उससे पानी पी लिया सिवाय उनमें से थोड़े लोगों के, जिन्होंने सख़्त प्यास के बावजूद न पीने पर धैर्य से काम लिया। फिर जब तालूत और उसके साथ ईमान वालों ने नहर पार किया, तो उसके कुछ सैनिकों ने कहा: आज हमारे पास जालूत और उसके सैनिकों से लड़ने की कोई क्षमता नहीं है। उस समय उन लोगों ने, जो क़ियामत के दिन अल्लाह से मिलने पर विश्वास रखते थे, कहा: कितने ईमान वाले दल, जिनकी संख्या कम थी, अल्लाह की अनुमति और सहायता से, अधिक संख्या वाले काफ़िर दलों पर विजय प्राप्त कर चुके हैं। इसलिए विजय में ईमान का एतिबार है, अधिकता का नहीं। और अल्लाह अपने धैर्य रखने वाले बंदों के साथ है, उनका समर्थन करता और उनकी मदद करता है।

وَلَمَّا بَرَزُوا۟ لِجَالُوتَ وَجُنُودِهِۦ قَالُوا۟ رَبَّنَآ أَفْرِغْ عَلَيْنَا صَبْرًۭا وَثَبِّتْ أَقْدَامَنَا وَٱنصُرْنَا عَلَى ٱلْقَوْمِ ٱلْكَـٰفِرِينَ ﴿٢٥٠﴾

जब वे जालूत और उसकी सेना का सामना करने के लिए निकले, तो उन्होंने अल्लाह की ओर मुतवज्जेह होकर दुआ करते हुए कहा: ऐ हमारे पालनहार! हमारे दिलों पर सब्र उँडेल दे, और हमारे पाँवों को जमा दे ताकि हम भागें नहीं और न अपने दुश्मन के सामने पराजित हों, तथा अपनी शक्ति और समर्थन के साथ काफ़िर क़ौम पर हमारी मदद कर।

فَهَزَمُوهُم بِإِذْنِ ٱللَّهِ وَقَتَلَ دَاوُۥدُ جَالُوتَ وَءَاتَىٰهُ ٱللَّهُ ٱلْمُلْكَ وَٱلْحِكْمَةَ وَعَلَّمَهُۥ مِمَّا يَشَآءُ ۗ وَلَوْلَا دَفْعُ ٱللَّهِ ٱلنَّاسَ بَعْضَهُم بِبَعْضٍۢ لَّفَسَدَتِ ٱلْأَرْضُ وَلَـٰكِنَّ ٱللَّهَ ذُو فَضْلٍ عَلَى ٱلْعَـٰلَمِينَ ﴿٢٥١﴾

उन्होंने अल्लाह के हुक्म से उन्हें पराजित कर दिया और दाऊद ने उनके सरदार जालूत को क़त्ल कर दिया। फिर अल्लाह ने दाऊद को बादशाहत और नुबुव्वत प्रदान की और उन्हें जिस प्रकार के भी ज्ञान चाहता था, सिखाया। इस तरह दुनिया और आख़िरत के लिए जो भी चीज़ उपयुक्त थी, उनके लिए एकत्रित कर दिया। यदि अल्लाह का بلغ क़ुरआन · तफ़सीर यह नियम न होता कि वह कु छ लोगों द्वारा कु छ लोगों के उपद्रव को हटाता है; तो निश्चय धरती उसमें उपद्रव (भ्रष्टाचार) करने वालों के प्रभुत्व से भ्रष्ट हो जाती। लेकिन, अल्लाह सभी प्राणियों पर अनुग्रह वाला है।

تِلْكَ ءَايَـٰتُ ٱللَّهِ نَتْلُوهَا عَلَيْكَ بِٱلْحَقِّ ۚ وَإِنَّكَ لَمِنَ ٱلْمُرْسَلِينَ ﴿٢٥٢﴾

ये अल्लाह की खुली हुई स्पष्ट आयतें हैं, जो हम - ऐ नबी! - आपको सुनाते हैं, जिनमें सच्ची सूचनाएँ और न्यायसंगत विधान मौजूद हैं। और निःसंदेह आप सर्व संसार के पालनहार की ओर से भेजे गए रसूलों में से हैं।

۞ تِلْكَ ٱلرُّسُلُ فَضَّلْنَا بَعْضَهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍۢ ۘ مِّنْهُم مَّن كَلَّمَ ٱللَّهُ ۖ وَرَفَعَ بَعْضَهُمْ دَرَجَـٰتٍۢ ۚ وَءَاتَيْنَا عِيسَى ٱبْنَ مَرْيَمَ ٱلْبَيِّنَـٰتِ وَأَيَّدْنَـٰهُ بِرُوحِ ٱلْقُدُسِ ۗ وَلَوْ شَآءَ ٱللَّهُ مَا ٱقْتَتَلَ ٱلَّذِينَ مِنۢ بَعْدِهِم مِّنۢ بَعْدِ مَا جَآءَتْهُمُ ٱلْبَيِّنَـٰتُ وَلَـٰكِنِ ٱخْتَلَفُوا۟ فَمِنْهُم مَّنْ ءَامَنَ وَمِنْهُم مَّن كَفَرَ ۚ وَلَوْ شَآءَ ٱللَّهُ مَا ٱقْتَتَلُوا۟ وَلَـٰكِنَّ ٱللَّهَ يَفْعَلُ مَا يُرِيدُ ﴿٢٥٣﴾

ه ये रसूल जिनका हमने आपसे वर्णन किया है, उनमें से कुछ को हमने वह़्य, अनुयायियों और दर्जों के मामले में दूसरों पर श्रेष्ठता प्रदान की है। उनमें से कुछ वे हैं जिनसे अल्लाह ने बात की, जैसे- मूसा अलैहिस्सलाम, और उनमें से कु छ को ऊँ चे पद प्रदान किए, जैसे मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम; क्योंकि आपको सभी मानव जाति के लिए भेजा गया तथा आपपर नुबुव्वत (ईश्दूतत्व) की मुहर लगा दी गई (और ईश्दूतत्व का क्रम समाप्त हो गया) और आपकी उम्मत को दूसरी उम्मतों पर श्रेष्ठता दी गई। और हमने मरयम के पुत्र ईसा को, उनकी नुबुव्वत (ईश्दूतत्व) को प्रमाणित करने वाले स्पष्ट चमत्कार दिए; जैसे मरे हुए व्यक्ति को पुनर्जीवित करना और जन्मजात अंधे और कोढ़ी को ठीक करना। तथा अल्लाह के आदेश को पूरा करने के लिए शक्ति प्रदान करने हेतु, हमने जिबरील अलैहिस्सलाम के द्वारा उनका समर्थन किया। अगर अल्लाह चाहता, तो रसूलों के बाद आने वाले लोग, उनके पास स्पष्ट निशानियाँ आ जाने के पश्चात आपस में न लड़ते। परंतु उन लोगों ने विवाद किया और वे विभाजित हो गए; उनमें से कु छ अल्लाह पर ईमान लाए और कु छ ने उसका इनकार किया। अगर अल्लाह चाहता कि वे आपस में न लड़ें, तो वे आपस में न लड़ते, लेकिन अल्लाह जो चाहता है, करता है। अतः वह जिसे चाहता है अपनी दया और अनुग्रह से ईमान की हिदायत देता है और जिसे चाहता है अपने न्याय और हिकमत से गुमराह कर देता है।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ أَنفِقُوا۟ مِمَّا رَزَقْنَـٰكُم مِّن قَبْلِ أَن يَأْتِىَ يَوْمٌۭ لَّا بَيْعٌۭ فِيهِ وَلَا خُلَّةٌۭ وَلَا شَفَـٰعَةٌۭ ۗ وَٱلْكَـٰفِرُونَ هُمُ ٱلظَّـٰلِمُونَ ﴿٢٥٤﴾

ऐ अल्लाह पर ईमान लाने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! हमने तुम्हें विभिन्न हलाल (वैध) धन में से जो कु छ प्रदान किया है, उसमें से खर्च करो, इससे पहले कि क़ियामत का दिन आ जाए। उस समय, वहाँ न कोई क्रय-विक्रय होगा कि जिससे मनुष्य वह चीज़ प्राप्त कर सके जो उसे लाभ दे, न कोई दोस्ती होगी जो उसे संकट के समय में लाभ दे, और न ही कोई मध्यस्थता (सिफ़ारिश) होगी जो हानि को दूर करे या लाभ पहुँचाए। सिवाय इसके कि जब अल्लाह जिसे चाहे और जिससे वह प्रसन्न हो, अनुमति प्रदान कर दे। और काफ़िर लोग ही वास्तव में अत्याचारी हैं क्योंकि वे सर्वशक्तिमान अल्लाह का इनकार करते हैं।

ٱللَّهُ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ٱلْحَىُّ ٱلْقَيُّومُ ۚ لَا تَأْخُذُهُۥ سِنَةٌۭ وَلَا نَوْمٌۭ ۚ لَّهُۥ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ ۗ مَن ذَا ٱلَّذِى يَشْفَعُ عِندَهُۥٓ إِلَّا بِإِذْنِهِۦ ۚ يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ ۖ وَلَا يُحِيطُونَ بِشَىْءٍۢ مِّنْ عِلْمِهِۦٓ إِلَّا بِمَا شَآءَ ۚ وَسِعَ كُرْسِيُّهُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ ۖ وَلَا يَـُٔودُهُۥ حِفْظُهُمَا ۚ وَهُوَ ٱلْعَلِىُّ ٱلْعَظِيمُ ﴿٢٥٥﴾

अल्लाह वह है जिस अके ले के सिवा कोई भी वास्तविक रूप से इबादत के लायक़ नहीं है। वह जीवित है, एक पूर्ण जीवन वाला है जिसमें कोई मृत्यु या कमी नहीं है। हर चीज़ को सँभालने वाला है, जो स्वयं क़ायम है, अतः वह अपनी सारी सृष्टि से बेनियाज़ है। तथा उसी से सारी सृष्टि क़ायम है, इसलिए वे अपनी सभी स्थितियों में उससे बेनियाज़ नहीं हो सकते। उसके जीवन की पूर्णता और उसके संपूर्ण रूप से हर चीज़ को संभालने के कारण, उसे न कुछ ऊँघ आती है और न कोई नींद। जो कुछ आकाशों में और जो कु छ धरती में है, सबका अके ला वही मालिक है। उसकी अनुमति और सहमति के बिना किसी को भी उसके पास किसी के लिए सिफ़ारिश करने का अधिकार नहीं है। वह जानता है अपनी सृष्टि के पिछले मामलों को जो घटित हो चुके और जिनका वे भविष्य में सामना करने वाले हैं, जो अभी घटित नहीं हुए। और वे उस सर्वशक्तिमान के ज्ञान में से किसी भी चीज़ को अपने ज्ञान से नहीं घेर सकते, सिवाय उसके जिससे वह उन्हें स्वयं अवगत कराना चाहे। उसकी कु र्सी ने (जो उसके पाँव रखने का स्थान है) आकाशों और धरती को, उनकी विशालता और महानता के बावजूद घेर रखा है। उन दोनों का संरक्षण करना उसके लिए कु छ कठिन या भारी नहीं है। वह अपने अस्तित्व, अपनी नियति और अपने प्रभुत्व में सबसे ऊँ चा, अपने राज्य और अधिकार में सबसे महान है। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

لَآ إِكْرَاهَ فِى ٱلدِّينِ ۖ قَد تَّبَيَّنَ ٱلرُّشْدُ مِنَ ٱلْغَىِّ ۚ فَمَن يَكْفُرْ بِٱلطَّـٰغُوتِ وَيُؤْمِنۢ بِٱللَّهِ فَقَدِ ٱسْتَمْسَكَ بِٱلْعُرْوَةِ ٱلْوُثْقَىٰ لَا ٱنفِصَامَ لَهَا ۗ وَٱللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ ﴿٢٥٦﴾

इस्लामधर्म में प्रवेश करने के लिए किसी को भी मजबूर नहीं किया जाएगा; क्योंकि यह स्पष्ट सत्य धर्म है। अतः किसी को इसे ग्रहण करने के लिए मजबूर करने की कोई आवश्यकता नहीं है। हिदायत, गुमराही से बिल्कुल स्पष्ट हो चुकी है। इसलिए जो व्यक्ति अल्लाह के अलावा पूजा की जाने वाली हर चीज़ का इनकार करे और उससे अलगाव प्रकट करे और केवल अल्लाह पर ईमान रखे; तो उसने क़ियामत के दिन मोक्ष के लिए धर्म की सबसे मज़बूत रस्सी पकड़ ली है, जो कभी नहीं टूटेगी। और अल्लाह अपने बंदों की बातों को सुनने वाला, उनके कर्मों को जानने वाला है और वह उन्हें उनका बदला देगा।

ٱللَّهُ وَلِىُّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ يُخْرِجُهُم مِّنَ ٱلظُّلُمَـٰتِ إِلَى ٱلنُّورِ ۖ وَٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ أَوْلِيَآؤُهُمُ ٱلطَّـٰغُوتُ يُخْرِجُونَهُم مِّنَ ٱلنُّورِ إِلَى ٱلظُّلُمَـٰتِ ۗ أُو۟لَـٰٓئِكَ أَصْحَـٰبُ ٱلنَّارِ ۖ هُمْ فِيهَا خَـٰلِدُونَ ﴿٢٥٧﴾

अल्लाह उन लोगों की देखभाल (संरक्षण) करता है जो उस पर ईमान लाए हैं, वह उन्हें सामर्थ्य प्रदान करता और उनकी सहायता करता है, तथा उन्हें कु फ़्र और अज्ञानता के अंधकार से निकालकर ईमान और ज्ञान के प्रकाश में लाता है। और जिन लोगों ने कु फ़्र किया, उनके संरक्षक वे मूर्तियाँ और साझेदार हैं, जिन्होंने उनके लिए कु फ़्र को सुशोभित किया है। और उन्हें ईमान और ज्ञान के प्रकाश से निकालकर कु फ़्र और अज्ञानता के अँधियारों में डाल दिया है। वे लोग आग (दोज़ख़) वाले हैं, वे हमेशा उसी में रहेंगे।

أَلَمْ تَرَ إِلَى ٱلَّذِى حَآجَّ إِبْرَٰهِـۧمَ فِى رَبِّهِۦٓ أَنْ ءَاتَىٰهُ ٱللَّهُ ٱلْمُلْكَ إِذْ قَالَ إِبْرَٰهِـۧمُ رَبِّىَ ٱلَّذِى يُحْىِۦ وَيُمِيتُ قَالَ أَنَا۠ أُحْىِۦ وَأُمِيتُ ۖ قَالَ إِبْرَٰهِـۧمُ فَإِنَّ ٱللَّهَ يَأْتِى بِٱلشَّمْسِ مِنَ ٱلْمَشْرِقِ فَأْتِ بِهَا مِنَ ٱلْمَغْرِبِ فَبُهِتَ ٱلَّذِى كَفَرَ ۗ وَٱللَّهُ لَا يَهْدِى ٱلْقَوْمَ ٱلظَّـٰلِمِينَ ﴿٢٥٨﴾

ه (ऐ नबी!) क्या आपने उस सरकश की जुर्अत (दुःसाहस) से अधिक आश्चर्यजनक चीज़ देखी, जिसने इबराहीम अलैहिस्सलाम से अल्लाह की रुबूबियत (ईश्वरत्व) और तौहीद (एकेश्वरवाद) के संबंध में बहस की? उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि अल्लाह ने उसे राज्य प्रदान किया, जिससे वह सरकश हो गया। इसपर इबराहीम अलैहिस्सलाम ने उससे अपने पालनहार की विशेषताओं का वर्णन करते हुए कहा: मेरा रब वह है, जो प्राणियों को जीवन और मृत्यु देता है। उस सरकश ने दुराग्रह से कहा: मैं भी जीवन और मृत्यु देता हूँ, इस प्रकार कि मैं जिसे चाहता हूँ, क़त्ल कर देता हूँ और जिसे चाहता हूँ, छोड़ देता हूँ। तब इबराहीम अलैहिस्सलाम ने एक दूसरा उससे बड़ा तर्क प्रस्तुत किया, आपने उससे कहा: मेरा पालनहार, जिसकी मैं इबादत करता हूँ, पूर्व दिशा से सूर्य लाता है, अतः तू उसे पश्चिम की दिशा से ले आ। इसपर वह सरकश चकित रह गया और उससे कोई जवाब नहीं बन पड़ा, तथा तर्क की शक्ति से पराजित हो गया। और अल्लाह अत्याचारियों को, उनके अत्याचार और सरकशी के कारण, अपने पथ पर चलने की तौफीक़ नहीं देता। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

أَوْ كَٱلَّذِى مَرَّ عَلَىٰ قَرْيَةٍۢ وَهِىَ خَاوِيَةٌ عَلَىٰ عُرُوشِهَا قَالَ أَنَّىٰ يُحْىِۦ هَـٰذِهِ ٱللَّهُ بَعْدَ مَوْتِهَا ۖ فَأَمَاتَهُ ٱللَّهُ مِا۟ئَةَ عَامٍۢ ثُمَّ بَعَثَهُۥ ۖ قَالَ كَمْ لَبِثْتَ ۖ قَالَ لَبِثْتُ يَوْمًا أَوْ بَعْضَ يَوْمٍۢ ۖ قَالَ بَل لَّبِثْتَ مِا۟ئَةَ عَامٍۢ فَٱنظُرْ إِلَىٰ طَعَامِكَ وَشَرَابِكَ لَمْ يَتَسَنَّهْ ۖ وَٱنظُرْ إِلَىٰ حِمَارِكَ وَلِنَجْعَلَكَ ءَايَةًۭ لِّلنَّاسِ ۖ وَٱنظُرْ إِلَى ٱلْعِظَامِ كَيْفَ نُنشِزُهَا ثُمَّ نَكْسُوهَا لَحْمًۭا ۚ فَلَمَّا تَبَيَّنَ لَهُۥ قَالَ أَعْلَمُ أَنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرٌۭ ﴿٢٥٩﴾

ى या क्या आपने उस व्यक्ति की तरह कोई आदमी देखा है, जिसका गुज़र एक ऐसी बस्ती से हुआ, जिसकी छतें गिर गई थीं, उसकी दीवारें ढह गई थीं और उसके निवासी नष्ट हो गए थे, इसलिए वह एक सुनसान उजाड़ बन गई थी? उस आदमी ने आश्चर्य से कहा: अल्लाह इस बस्ती के लोगों को मरने के बाद कैसे पुनर्जीवित करेगा?! तो अल्लाह ने उसे एक सौ साल के लिए मौत दे दी, फिर उसे जीवित किया और उससे पूछा: तू कितने समय तक मरा हुआ रहा? उसने उत्तर दिया: मैं एक दिन या उसका कु छ भाग रहा हूँ। अल्लाह ने उससे कहा: बल्कि, तू पूरे सौ साल रहा है। इसलिए तेरे साथ जो खाना और पानी था उसे देख। वह अपनी हालत पर बाक़ी है, उसमें कोई बदलाव नही आया। हालाँकि सबसे तेज़ बदलाव खाना और पानी में होता है। तथा तू अपने मरे हुए गधे को देख। हमने ऐसा इसलिए किया, ताकि हम तुझे लोगों के लिए इस बात की स्पष्ट निशानी बना दें कि अल्लाह उन्हें दोबारा ज़िंदा करने की पूरी शक्ति रखता है। तथा तू अपने गधे की हड्डियों को देख जो बिखरी हुई और अलग हो गई हैं, हम उन्हें कै से उठाते हैं और उन्हें एक साथ जोड़ते हैं, फिर उसके बाद उनपर माँस चढ़ाते हैं और उन्हें फिर से जीवित कर देते हैं। जब उसने यह देखा, तो उसके लिए मामले की वास्तविकता स्पष्ट हो गई और उसने अल्लाह की शक्ति को जान लिया। इसलिए उसने इसे स्वीकारते हुए कहा: मैं जानता हूँ कि अल्लाह हर चीज़ पर सर्वशक्तिमान है।

وَإِذْ قَالَ إِبْرَٰهِـۧمُ رَبِّ أَرِنِى كَيْفَ تُحْىِ ٱلْمَوْتَىٰ ۖ قَالَ أَوَلَمْ تُؤْمِن ۖ قَالَ بَلَىٰ وَلَـٰكِن لِّيَطْمَئِنَّ قَلْبِى ۖ قَالَ فَخُذْ أَرْبَعَةًۭ مِّنَ ٱلطَّيْرِ فَصُرْهُنَّ إِلَيْكَ ثُمَّ ٱجْعَلْ عَلَىٰ كُلِّ جَبَلٍۢ مِّنْهُنَّ جُزْءًۭا ثُمَّ ٱدْعُهُنَّ يَأْتِينَكَ سَعْيًۭا ۚ وَٱعْلَمْ أَنَّ ٱللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌۭ ﴿٢٦٠﴾

ه عزيز حكيم (ऐ नबी!) उस समय को याद कीजिए जब इबराहीम अलैहिस्सलाम ने कहा: ऐ मेरे रब! मुझे मेरी दृष्टि से दिखा कि मुर्दों को पुनर्जीवित करना कै से होगा? अल्लाह ने उनसे कहा: क्या तुमने इस बात पर विश्वास नहीं किया? इबराहीम ने उत्तर दिया: क्यों नहीं, मैंने विश्वास किया, परंतु यह मेरे दिल के आश्वासन में वृद्धि के उद्देश्य से है। अल्लाह ने उन्हें आदेश किया और फरमाया: चार पक्षियों को ले लो, फिर उन्हें अपने से अच्छी तरह परचा लो और उनके टुकड़े-दुकड़े कर दो, फिर अपने आस-पास के पहाड़ों में से हर पहाड़ पर उनका एक हिस्सा रख दो, फिर उन्हें बुलाओ। वे तुम्हारे पास दोड़ते हुए आएँगे, उनमें जीवन लौट आया होगा। और ऐ इबराहीम! जान लो कि अल्लाह अपने राज्य में बहुत प्रभुत्वशाली और अपने आदेश, विधान और रचना में पूर्ण हिकमत वाला है।

مَّثَلُ ٱلَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمْوَٰلَهُمْ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ كَمَثَلِ حَبَّةٍ أَنۢبَتَتْ سَبْعَ سَنَابِلَ فِى كُلِّ سُنۢبُلَةٍۢ مِّا۟ئَةُ حَبَّةٍۢ ۗ وَٱللَّهُ يُضَـٰعِفُ لِمَن يَشَآءُ ۗ وَٱللَّهُ وَٰسِعٌ عَلِيمٌ ﴿٢٦١﴾

अल्लाह के मार्ग में अपना धन खर्च करने वाले मोमिनों के सवाब का उदहारण एक दाने की तरह है, जिसे किसान एक अच्छी भूमि में डालता है, फिर उससे सात बालियाँ निकलती हैं, जिनमें से प्रत्येक बाली में एक सौ दाने होते हैं। अल्लाह अपने बंदों में से जिसका चाहता है, सवाब बढ़ा देता है, चुनाँचे वह उन्हें उनका प्रतिफल बिना हिसाब देता है। और अल्लाह अनुग्रह और देने में बहुत विस्तार वाला है, वहنख़ूब जानता है कि कौन कई गुना बढ़ाकर दिए जाने का हक़दार है।

ٱلَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمْوَٰلَهُمْ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ ثُمَّ لَا يُتْبِعُونَ مَآ أَنفَقُوا۟ مَنًّۭا وَلَآ أَذًۭى ۙ لَّهُمْ أَجْرُهُمْ عِندَ رَبِّهِمْ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ ﴿٢٦٢﴾

عليهم ولا هم يحزنون जो लोग अपना धन अल्लाह की आज्ञाकारिता और उसकी प्रसन्नता की चीज़ों में खर्च करते हैं, फिर अपने खर्च करने के बाद कोई ऐसा काम नहीं करते, जो उसके प्रतिफल को नष्ट करने वाला हो, जैसे कि अपने शब्द या कर्म से लोगों पर उपकार जताना, उनके लिए उनका प्रतिफल उनके पालनहार के पास है। वे जिस चीज़ का सामना करने वाले है उसमें उनके लिए कोई भय नहीं है, और न ही वे, उन्हें प्राप्त नेमतों की महानता के कारण, बीत चुकी चीज़ों पर शोक करेंगे। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

۞ قَوْلٌۭ مَّعْرُوفٌۭ وَمَغْفِرَةٌ خَيْرٌۭ مِّن صَدَقَةٍۢ يَتْبَعُهَآ أَذًۭى ۗ وَٱللَّهُ غَنِىٌّ حَلِيمٌۭ ﴿٢٦٣﴾

एक अच्छी बात जिससे आप किसी ईमान वाले के दिल में खुशी ले आएँ, और जिस व्यक्ति ने आपके साथ दुर्व्यवहार किया है, क्षमा कर दें; यह उस दान से बेहतर है, जिसके बाद उस आदमी पर उपकार जताकर कष्ट दिया जाए, जिसपर दान किया गया है। और अल्लाह अपने बंदों से बहुत बेनियाज़, अत्यंत सहनशील है उन्हें दंड देने में जल्दी नहीं करता है।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تُبْطِلُوا۟ صَدَقَـٰتِكُم بِٱلْمَنِّ وَٱلْأَذَىٰ كَٱلَّذِى يُنفِقُ مَالَهُۥ رِئَآءَ ٱلنَّاسِ وَلَا يُؤْمِنُ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ ۖ فَمَثَلُهُۥ كَمَثَلِ صَفْوَانٍ عَلَيْهِ تُرَابٌۭ فَأَصَابَهُۥ وَابِلٌۭ فَتَرَكَهُۥ صَلْدًۭا ۖ لَّا يَقْدِرُونَ عَلَىٰ شَىْءٍۢ مِّمَّا كَسَبُوا۟ ۗ وَٱللَّهُ لَا يَهْدِى ٱلْقَوْمَ ٱلْكَـٰفِرِينَ ﴿٢٦٤﴾

ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! जिसे दान दिया गया है, उसपर एहसान जताकर और उसे कष्ट पहुँचाकर अपने दान का प्रतिफल खराब न करो। क्योंकि ऐसा करने वाले का उदाहरण उस व्यक्ति के समान है जो अपना धन इस इरादे से खर्च करता है कि लोग उसे देखें और उसकी प्रशंसा करें। और वह एक काफ़िर व्यक्ति है, जो न अल्लाह पर और न क़ियामत के दिन और उसमें मौजूद सवाब एवं सज़ा पर ईमान रखता है। तो इसका उदाहरण एक चिकने पत्थर जैसा है, जिसपर मिट्टी पड़ी हो, फिर उसपर तेज़ बारिश हो जाए और वह पत्थर से मिट्टी को हटा दे और उसे चिकना छोड़ दे, उसपर कोई चीज़ न हो। इसी तरह दिखावा करने वालों का मामला है, उनके कार्यों और खर्च का सवाब समाप्त हो जाता है और उसमें से कुछ भी अल्लाह के पास बाक़ी नहीं रहता। और अल्लाह काफ़िरों को उसकी हिदायत नहीं देता, जिससे वह सर्वशक्तिमान प्रसन्न होता है और जो उन्हें उनके कार्यों और उनके खर्च में लाभ पहुँचाए।

وَمَثَلُ ٱلَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمْوَٰلَهُمُ ٱبْتِغَآءَ مَرْضَاتِ ٱللَّهِ وَتَثْبِيتًۭا مِّنْ أَنفُسِهِمْ كَمَثَلِ جَنَّةٍۭ بِرَبْوَةٍ أَصَابَهَا وَابِلٌۭ فَـَٔاتَتْ أُكُلَهَا ضِعْفَيْنِ فَإِن لَّمْ يُصِبْهَا وَابِلٌۭ فَطَلٌّۭ ۗ وَٱللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ ﴿٢٦٥﴾

ه उन ईमान वालों का उदाहरण, जो अपना धन अल्लाह की प्रसन्नता की तलाश में खर्च करते हैं, इस हाल में कि उनके दिल बिना किसी मजबूरी के अल्लाह के वादे की सच्चाई से आश्वस्त होते हैं, उस बाग़ के उदाहरण जैसा है, जो किसी अच्छे ऊँ चे स्थान पर हो। जिसपर एक भारी बारिश बरसे, तो वह (बाग़) दुगना फल उत्पन्न करे। फिर यदि उसपर भारी वर्षा न हो, तो उस पर एक हल्की वर्षा हो, जो उस भूमि के अच्छी होने के कारण उसके लिए काफी हो। इसी तरह, निष्ठावान लोगों के खर्च को अल्लाह स्वीकार करता और उनके प्रतिफल को कई गुना कर देता है, भले ही वह कम हो। और अल्लाह जो कु छ तुम करते हो, उसे देख रहा है। उससे दिखावा करने वालों और निष्ठा के साथ खर्च करने वालों का हाल छिपा हुआ नहीं है और वह प्रत्येक को वह बदला देगा, जिसका वह योग्य है।

أَيَوَدُّ أَحَدُكُمْ أَن تَكُونَ لَهُۥ جَنَّةٌۭ مِّن نَّخِيلٍۢ وَأَعْنَابٍۢ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ لَهُۥ فِيهَا مِن كُلِّ ٱلثَّمَرَٰتِ وَأَصَابَهُ ٱلْكِبَرُ وَلَهُۥ ذُرِّيَّةٌۭ ضُعَفَآءُ فَأَصَابَهَآ إِعْصَارٌۭ فِيهِ نَارٌۭ فَٱحْتَرَقَتْ ۗ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ ٱللَّهُ لَكُمُ ٱلْـَٔايَـٰتِ لَعَلَّكُمْ تَتَفَكَّرُونَ ﴿٢٦٦﴾

क्या तुममें से किसी को पसंद है कि उसके पास खजूरों और अँगूरों का एक बाग़ हो, जिसके बीच से मीठा पानी बहता हो। उस बाग़ में उसके लिए प्रत्येक प्रकार के अच्छे फल हों। उस बाग़ के मालिक को बुढ़ापा आ पहुँचे और वह इतना बूढ़ा हो गया हो कि काम करने और कमाने में असमर्थ हो, तथा उसके कमज़ोर छोटे-छोटे बच्चे हों, जो काम न कर सकते हों। फिर उस बाग़ पर एक आँधी चले, जिसमें एक तेज़ आग हो और सारा बाग़ जलकर खाक हो जाए। हालाँकि अपने बुढ़ापे और अपने बच्चों की कमज़ोरी के कारण उसे इसकी सख़्त ज़रूरत थी?! अतः लोगों को दिखाने के लिए अपना धन खर्च करने वाले की स्थिति इसी आदमी की तरह है; वह क़ियामत के दिन अल्लाह के पास बिना नेकियों के आएगा, एक ऐसे समय में जब उसे उनकी सबसे अधिक आवश्यकता होगी। इसी प्रकार अल्लाह तुम्हारे लिए वे चीज़ें खोल-खोलकर बयान करती है, जो दुनिया और आख़िरत में तुम्हें लाभ पहुँचाने वाली हैं, ताकि तुम उनपर चिंतन करो।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ أَنفِقُوا۟ مِن طَيِّبَـٰتِ مَا كَسَبْتُمْ وَمِمَّآ أَخْرَجْنَا لَكُم مِّنَ ٱلْأَرْضِ ۖ وَلَا تَيَمَّمُوا۟ ٱلْخَبِيثَ مِنْهُ تُنفِقُونَ وَلَسْتُم بِـَٔاخِذِيهِ إِلَّآ أَن تُغْمِضُوا۟ فِيهِ ۚ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ غَنِىٌّ حَمِيدٌ ﴿٢٦٧﴾

ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! जो अच्छा हलाल (वैध) धन तुमने कमाया है, उसमें से खर्च करो, और जो कु छ हमने तुम्हारे लिए पृथ्वी के पौधों में से निकाला है, उसमें से खर्च करो, और उसमें से रद्दी (दोषपूर्ण) चीज़ का इरादा न करो कि तुम उसे खर्च करो, हालाँकि यदि वह तुमको दी जाए, तो तुम उसे नहीं लोगो, सिवाय इसके कि तुमउसकी बुराई (ख़राबी) की उनदेखी कर जाओ। तो तुमअल्लाह के लिए वह चीज़ कै से पसंद करते हो, जो तुमअपने लिए पसंद नहीं بلغ क़ुरआन · तफ़सीर करते?! और जान लो कि अल्लाह तुम्हारे खर्च से बेनियाज़ है, अपने अस्तित्व और अपने कार्यों में प्रशंसनीय है।

ٱلشَّيْطَـٰنُ يَعِدُكُمُ ٱلْفَقْرَ وَيَأْمُرُكُم بِٱلْفَحْشَآءِ ۖ وَٱللَّهُ يَعِدُكُم مَّغْفِرَةًۭ مِّنْهُ وَفَضْلًۭا ۗ وَٱللَّهُ وَٰسِعٌ عَلِيمٌۭ ﴿٢٦٨﴾

शैतान तुम्हें ग़रीबी से डराता और कं जूसी पर उभारता है, तथा तुम्हें पाप और अवज्ञा करने के लिए बुलाता है। जबकि अल्लाह तुम्हारे पापों के लिए बड़ी क्षमा तथा व्यापक जीविका का वादा करता है। और अल्लाह विशाल अनुग्रह वाला, अपने बंदों की स्थितियों के बारे में ख़ूब जानने वाला है।

يُؤْتِى ٱلْحِكْمَةَ مَن يَشَآءُ ۚ وَمَن يُؤْتَ ٱلْحِكْمَةَ فَقَدْ أُوتِىَ خَيْرًۭا كَثِيرًۭا ۗ وَمَا يَذَّكَّرُ إِلَّآ أُو۟لُوا۟ ٱلْأَلْبَـٰبِ ﴿٢٦٩﴾

अल्लाह अपने बंदों में से जिसे चाहता है, उसे कथन में सत्यता एवं कार्य में शुद्धता प्रदान करता है और जिसे यह विशेषता दे दी गई, तो वास्तव में उसे बहुत भलाई दी गई। तथा अल्लाह की निशानियों से के वल वे पूर्ण बुद्धि वाले उपदेश ग्रहण करते हैं, जो अल्लाह के प्रकाश से प्रकाश प्राप्त करते और उसके मार्गदर्शन से निर्देश हासिल करते हैं।

وَمَآ أَنفَقْتُم مِّن نَّفَقَةٍ أَوْ نَذَرْتُم مِّن نَّذْرٍۢ فَإِنَّ ٱللَّهَ يَعْلَمُهُۥ ۗ وَمَا لِلظَّـٰلِمِينَ مِنْ أَنصَارٍ ﴿٢٧٠﴾

तुम अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए जो भी थोड़ा हो या बहुत खर्च करो, या तुम अपनी ओर से अल्लाह की आज्ञाकारिता का कोई कार्य करने के लिए प्रतिबद्ध हो जाओ, जिसके लिए तुम बाध्य नहीं किए गए हो; तो निःसंदेह अल्लाह वह सब जानता है। अतः उसमें से कोई भी चीज़ उसके पास बर्बाद नहीं होगी और वह तुम्हें उसका सबसे बड़ा बदला देगा। तथा उन अत्याचारियों के लिए, जो अपने ऊपर अनिवार्य चीज़ों को रोकने वाले, अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन करने वाले हैं, कोई मदद करने वाले नहीं होंगे, जो उनसे क़ियामत के दिन की सज़ा को दूर कर सकें ।

إِن تُبْدُوا۟ ٱلصَّدَقَـٰتِ فَنِعِمَّا هِىَ ۖ وَإِن تُخْفُوهَا وَتُؤْتُوهَا ٱلْفُقَرَآءَ فَهُوَ خَيْرٌۭ لَّكُمْ ۚ وَيُكَفِّرُ عَنكُم مِّن سَيِّـَٔاتِكُمْ ۗ وَٱللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌۭ ﴿٢٧١﴾

بما تعملون خبير तुमजो कु छ भी दान में धन देते हो, यदि उसे दिखाकर दो तो तुम्हारा यह दान देना अच्छा है, परंतु यदि तमु उसे गुप्त रखते हुए ग़रीबों को दो, तो यह तुम्हारे लिए दिखाने से बेहतर है। क्योंकि यह इख़्लास (निष्ठा) के अधिक निकट है। तथा निष्ठावानों के दान में उनके पापों के लिए एक आवरण और उनके लिए क्षमा है। तथा अल्लाह तुम्हारे कार्यों से अवगत है। अतः तुम्हारी हालतों में से कु छ भी उससे छिपा नहीं है।

۞ لَّيْسَ عَلَيْكَ هُدَىٰهُمْ وَلَـٰكِنَّ ٱللَّهَ يَهْدِى مَن يَشَآءُ ۗ وَمَا تُنفِقُوا۟ مِنْ خَيْرٍۢ فَلِأَنفُسِكُمْ ۚ وَمَا تُنفِقُونَ إِلَّا ٱبْتِغَآءَ وَجْهِ ٱللَّهِ ۚ وَمَا تُنفِقُوا۟ مِنْ خَيْرٍۢ يُوَفَّ إِلَيْكُمْ وَأَنتُمْ لَا تُظْلَمُونَ ﴿٢٧٢﴾

(ऐ नबी!) उन्हें सत्य को स्वीकार करने और उसका पालन करने की हिदायत देना और उन्हें उसपर तत्पर करना आपके ज़िम्मे नहीं है। आपका काम के वल उन्हें सत्य के लिए मार्गदर्शन करना और उन्हें उसके बारे में परिचय देना है। क्योंकि सत्य की तौफ़ीक़ देना और उसकी हिदायत प्रदान करना अल्लाह के हाथ में है। वह जिसे चाहता है, हिदायत प्रदान करता है। तथा तुम जो भी धन खर्च करोगे, उसका लाभ तुम्हारे पास ही आएगा, क्योंकि अल्लाह उससे बेनियाज़ है। और तुम्हारा खर्च के वल अल्लाह के लिए होना चाहिए। क्योंकि सच्चे ईमान वाले के वल अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए ही खर्च करते हैं। तथा तुम जो कु छ भी खर्च करोगे, चाहे थोड़ा या बहुत, तुम्हें उसका भरपूर बदला दिया जाएगा, उसमें कोई कमी नहीं की जाएगी। क्योंकि अल्लाह किसी पर अत्याचार नहीं करता।

لِلْفُقَرَآءِ ٱلَّذِينَ أُحْصِرُوا۟ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ لَا يَسْتَطِيعُونَ ضَرْبًۭا فِى ٱلْأَرْضِ يَحْسَبُهُمُ ٱلْجَاهِلُ أَغْنِيَآءَ مِنَ ٱلتَّعَفُّفِ تَعْرِفُهُم بِسِيمَـٰهُمْ لَا يَسْـَٔلُونَ ٱلنَّاسَ إِلْحَافًۭا ۗ وَمَا تُنفِقُوا۟ مِنْ خَيْرٍۢ فَإِنَّ ٱللَّهَ بِهِۦ عَلِيمٌ ﴿٢٧٣﴾

यह दान उन ग़रीबों को दो, जिन्हें अल्लाह के मार्ग में जिहाद ने आजीविका की तलाश में यात्रा करने से रोक दिया है। उनकी स्थिति से अनभिज्ञ व्यक्ति उन्हें उनके माँगने से बचने के कारण धनवान् समझता है। हालाँकि जो व्यक्ति उनसे परिचित है, वह उन्हें उनके लक्षणों से पहचानता है, क्योंकि उनके शरीर और कपड़ों पर आवश्यकता स्पष्ट दिखाई देती है। उनकी पहचान यह भी है कि वे अन्य ग़रीब लोगों की तरह नहीं हैं, जो लोगों से माँगते हुए उनके पीछे पड़ जाते हैं। तथा तुम अपने धन इत्यादि में से जो कु छ भी ख़र्च करोगे, तो निश्चय अल्लाह उसे भली-भाँति जानता है और वह तुम्हें उसका बहुत बड़ा बदला देगा। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर ر

ٱلَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمْوَٰلَهُم بِٱلَّيْلِ وَٱلنَّهَارِ سِرًّۭا وَعَلَانِيَةًۭ فَلَهُمْ أَجْرُهُمْ عِندَ رَبِّهِمْ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ ﴿٢٧٤﴾

जो लोग रात और दिन, छिपे और खुले, बिना किसी दिखावा और ख्याति के अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए अपना धन खर्च करते हैं, तो उनके लिए उनका प्रतिफल क़ियामत के दिन उनके पालनहार के पास है। उनको अपने भविष्य के बारे में कोई डर नहीं है और न ही वे संसार की छू टी हुई चीज़ों का शोक करेंगे। यह सब अल्लाह की ओर से एक अनुग्रह और कृ पा के तौर पर है।

ٱلَّذِينَ يَأْكُلُونَ ٱلرِّبَوٰا۟ لَا يَقُومُونَ إِلَّا كَمَا يَقُومُ ٱلَّذِى يَتَخَبَّطُهُ ٱلشَّيْطَـٰنُ مِنَ ٱلْمَسِّ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَالُوٓا۟ إِنَّمَا ٱلْبَيْعُ مِثْلُ ٱلرِّبَوٰا۟ ۗ وَأَحَلَّ ٱللَّهُ ٱلْبَيْعَ وَحَرَّمَ ٱلرِّبَوٰا۟ ۚ فَمَن جَآءَهُۥ مَوْعِظَةٌۭ مِّن رَّبِّهِۦ فَٱنتَهَىٰ فَلَهُۥ مَا سَلَفَ وَأَمْرُهُۥٓ إِلَى ٱللَّهِ ۖ وَمَنْ عَادَ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ أَصْحَـٰبُ ٱلنَّارِ ۖ هُمْ فِيهَا خَـٰلِدُونَ ﴿٢٧٥﴾

जो लोग ब्याज का लेन-देन करते और उसे लेते हैं, वे क़ियामत के दिन अपनी क़ब्रों से ऐसे उठेंगे, जैसे वह आदमी उठता है जिसे शैतान ने छू लिया हो। चुनाँचे वह अपनी क़ब्र से ऐसे लड़खड़ाते हुए उठेगा, जैसे मिर्गी से ग्रस्त व्यक्ति अपने उठने-बैठने में लड़खड़ाता है। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि उन्होंने सूद का उपभोग करना जायज़ ठहरा लिया और उन्होंने अल्लाह के हलालकिए हुए व्यापार के मुनाफे और ब्याज के बीच कोई अंतर नहीं किया। उन्होंने कहा: व्यापार तो हलालहोने में ब्याज ही की तरह है। क्योंकि दोनों से धन में वृद्धि और बढ़ोतरी होती है। तो अल्लाह ने उनका खंडन किया, उनके क़यास को अमान्य करते हुए उन्हें झुठला दिया और यह स्पष्ट कर दिया कि अल्लाह ने व्यापार को ह़लाल किया है; क्योंकि उसमें सामान्य और विशिष्ट लाभ है और ब्याज को हराम (अवैध) किया है; क्योंकि उसमें अत्याचार और लोगों का धन बिना मुआवज़े के अनुचित तरीक़े से खाना शामिलहै। फिर जिसके पास उसके पालनहार की ओर से कोई उपदेश आए, जिसमें ब्याज से निषेध और उससे सावधान किया गया हो, तो वह उससे रुक जाए और अल्लाह से तौबा कर ले; तो इससे पहले जो कु छ ब्याज वह ले चुका है, उसके बारे में उसपर कोई पाप नहीं है। तथा उसके बाद भविष्य में जो कु छ वह करता है, उसका मामला अल्लाह के हवाले है। परंतु जो व्यक्ति अल्लाह की ओर से निषेधाज्ञा पहुँच जाने के बाद तथा उसपर तर्क स्थापित हो जाने के पश्चात दोबारा ब्याज लेने की ओर लौट आया; तो वह जहन्नम में प्रवेश करने और उसमें हमेशा रहने का भागी बन गया। यहाँ जहन्नम में हमेशा रहने का मतलब सूद को हलाल समझते हुए उसका उपभोग करना है या इसका अभिप्राय उसमें लंबे समय तक रहना है। क्योंकि जहन्नम में हमेशा के लिए के वल काफ़िरों को रहना है। तौहीद पर क़ायम रहने वाले लोग उसमें हमेशा के लिए नहीं रहेंगे।

يَمْحَقُ ٱللَّهُ ٱلرِّبَوٰا۟ وَيُرْبِى ٱلصَّدَقَـٰتِ ۗ وَٱللَّهُ لَا يُحِبُّ كُلَّ كَفَّارٍ أَثِيمٍ ﴿٢٧٦﴾

अल्लाह ब्याज के धन को नष्ट और समाप्त कर देता है; या तो ज़ाहिरी तौर पर उसे विनष्ट कर देता है या आंतरिक तौर पर उससे बरकत को छीन लेता है। तथा वह दान के प्रतिफल को कई गुना करके , उसे बढ़ाता और विकसित करता है। चुनाँचे वह एक नेकी को दस गुना से सात सौ गुना तक बल्कि उससे भी अधिक गुना तक कर देता है और दान करने वालों के धन में बरकत देता है। तथा अल्लाह किसी ऐसे व्यक्ति से प्रेम नहीं करता जो हठी काफिर हो, जो हराम को हलाल ठहराने वाला, अवज्ञा और कु कर्मों में लिप्त रहने वाला हो।

إِنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ وَأَقَامُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتَوُا۟ ٱلزَّكَوٰةَ لَهُمْ أَجْرُهُمْ عِندَ رَبِّهِمْ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ ﴿٢٧٧﴾

ولا هم يحزنون निःसंदेह जो लोग अल्लाह पर ईमान लाए, उसके रसूल का अनुसरण किया,अच्छे काम किए और अल्लाह ने जैसा निर्धारित किया है, उसके अनुसार पूरी तरह से नमाज़ अदा की और उन लोगों को अपने धन की ज़कात दी जो उसके हक़दार हैं; उनका प्रतिफल उनके रब के पास है, उन्हें भविष्य में अपने मामलों के बारे में किसी चीज़ का भय नहीं है और न ही वे दुनिया की छू टी हुई चीज़ों और उसकी नेमतों पर दुःखी होंगे।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَذَرُوا۟ مَا بَقِىَ مِنَ ٱلرِّبَوٰٓا۟ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ ﴿٢٧٨﴾

ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! अल्लाह से डरो; इस तौर पर कि उसके आदेशों का पालन करो और उसके निषेधों से बचो, तथा लोगों के पास ब्याज के धन से जो कु छ बचा है, उसे माँगना छोड़ दो, यदि तुम वास्तव में अल्लाह पर और उसपर विश्वास रखते हो जो अल्लाह ने तुम्हें ब्याज से मना किया है। بلغ क़ुरआन · तफ़सीर

فَإِن لَّمْ تَفْعَلُوا۟ فَأْذَنُوا۟ بِحَرْبٍۢ مِّنَ ٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ ۖ وَإِن تُبْتُمْ فَلَكُمْ رُءُوسُ أَمْوَٰلِكُمْ لَا تَظْلِمُونَ وَلَا تُظْلَمُونَ ﴿٢٧٩﴾

अगर तुम वह काम न करो, जिसका तुम्हें आदेश दिया गया है, तो तुम जान लो और यक़ीन कर लो कि अल्लाह और उसके रसूल की ओर से युद्ध की घोषणा है। अगर तुम अल्लाह के समक्ष तौबा कर लो और ब्याज छोड़ दो, तो तुम्हें उधार दी हुई मूल पूँजी वसूल करने का अधिकार है। अपनी मूल पूँजी से अधिक लेकर न तुम किसी पर अत्याचार करोगे और न उसमें कमी करके तुमपर अत्याचार किया जाएगा।

وَإِن كَانَ ذُو عُسْرَةٍۢ فَنَظِرَةٌ إِلَىٰ مَيْسَرَةٍۢ ۚ وَأَن تَصَدَّقُوا۟ خَيْرٌۭ لَّكُمْ ۖ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ ﴿٢٨٠﴾

और यदि तुम जिससे क़र्ज़ चुकाने की माँग कर रहे हो वह दिवालिया हो, अपना क़र्ज़ चुकाने में समर्थ न हो, तो उससे क़र्ज़ की माँग को विलंबित कर दो यहाँ तक कि उसके पास धन उपलब्ध हो जाए और वह क़र्ज़ का भुगतान करने में सक्षमहो जाए। और यह कि तुमक़र्ज़ चुकाने का मुतालबा त्यागकर या उसमें से कु छ हिस्सा छोड़कर उसपर दान कर दो, तो तुम्हारे लिए बेहतर है, यदि तुम जानते हो कि अल्लाह के पास इसकी क्या फज़ीलत है।

وَٱتَّقُوا۟ يَوْمًۭا تُرْجَعُونَ فِيهِ إِلَى ٱللَّهِ ۖ ثُمَّ تُوَفَّىٰ كُلُّ نَفْسٍۢ مَّا كَسَبَتْ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ ﴿٢٨١﴾

उस दिन की यातना से डरो, जब तुम सब अल्लाह की ओर लौटाए जाओगे और उसके सामने खड़े हो जाओगे, फिर हर प्राणी को उसके किए हुए का बदला दिया जाएगा, चाहे वह अच्छा हो या बुरा। उनके अच्छे कर्मों के प्रतिफल को कम करके , या उनकेم बुरे कर्मों की सज़ा को बढ़ाकर उन पर अत्याचार नहीं किया जाएगा।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ إِذَا تَدَايَنتُم بِدَيْنٍ إِلَىٰٓ أَجَلٍۢ مُّسَمًّۭى فَٱكْتُبُوهُ ۚ وَلْيَكْتُب بَّيْنَكُمْ كَاتِبٌۢ بِٱلْعَدْلِ ۚ وَلَا يَأْبَ كَاتِبٌ أَن يَكْتُبَ كَمَا عَلَّمَهُ ٱللَّهُ ۚ فَلْيَكْتُبْ وَلْيُمْلِلِ ٱلَّذِى عَلَيْهِ ٱلْحَقُّ وَلْيَتَّقِ ٱللَّهَ رَبَّهُۥ وَلَا يَبْخَسْ مِنْهُ شَيْـًۭٔا ۚ فَإِن كَانَ ٱلَّذِى عَلَيْهِ ٱلْحَقُّ سَفِيهًا أَوْ ضَعِيفًا أَوْ لَا يَسْتَطِيعُ أَن يُمِلَّ هُوَ فَلْيُمْلِلْ وَلِيُّهُۥ بِٱلْعَدْلِ ۚ وَٱسْتَشْهِدُوا۟ شَهِيدَيْنِ مِن رِّجَالِكُمْ ۖ فَإِن لَّمْ يَكُونَا رَجُلَيْنِ فَرَجُلٌۭ وَٱمْرَأَتَانِ مِمَّن تَرْضَوْنَ مِنَ ٱلشُّهَدَآءِ أَن تَضِلَّ إِحْدَىٰهُمَا فَتُذَكِّرَ إِحْدَىٰهُمَا ٱلْأُخْرَىٰ ۚ وَلَا يَأْبَ ٱلشُّهَدَآءُ إِذَا مَا دُعُوا۟ ۚ وَلَا تَسْـَٔمُوٓا۟ أَن تَكْتُبُوهُ صَغِيرًا أَوْ كَبِيرًا إِلَىٰٓ أَجَلِهِۦ ۚ ذَٰلِكُمْ أَقْسَطُ عِندَ ٱللَّهِ وَأَقْوَمُ لِلشَّهَـٰدَةِ وَأَدْنَىٰٓ أَلَّا تَرْتَابُوٓا۟ ۖ إِلَّآ أَن تَكُونَ تِجَـٰرَةً حَاضِرَةًۭ تُدِيرُونَهَا بَيْنَكُمْ فَلَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَلَّا تَكْتُبُوهَا ۗ وَأَشْهِدُوٓا۟ إِذَا تَبَايَعْتُمْ ۚ وَلَا يُضَآرَّ كَاتِبٌۭ وَلَا شَهِيدٌۭ ۚ وَإِن تَفْعَلُوا۟ فَإِنَّهُۥ فُسُوقٌۢ بِكُمْ ۗ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ ۖ وَيُعَلِّمُكُمُ ٱللَّهُ ۗ وَٱللَّهُ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمٌۭ ﴿٢٨٢﴾

ى ى ى ه ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! जब तुम आपस में उधार का लेन-देन करो, इस प्रकार कि तुममें से एक व्यक्ति दूसरे को एक निश्चित अवधि के लिए उधार दे, तो उस उधार को लिख लो। और एक लिखने वाला तुम्हारे बीच शरीयत के अनुसार सच्चाई और न्याय के साथ लिखे। तथा लिखने वाला उधार को उसके अनुसार लिखने से इनकार न करे जो अल्लाह ने उसे न्याय के साथ लिखना सिखाया है। अतः उसे चाहिए कि देनदार जो कु छ लिखवा रहा हो, उसे लिख दे; ताकि यह देनदार की ओर से एक स्वीकृ ति हो जाए। लिखवाने वाले को चाहिए कि अल्लाह से डरे और लिखवाने में उधार की मात्रा, या उसके प्रकार या उसके विवरण में से कु छ भी कमन करे। यदि जिसके ज़िम्मे अधिकार है, वह अच्छी तरह से अपने कार्य का नियंत्रण करने में अक्षमहै, या वह अपनी बालावस्था या पागलपन के कारण कमज़ोर है, या अपने गूँगेपन के कारण बोलकर लिखवाने में सक्षमनहीं है, तो इन जैसी परिस्थितियों में उसकी तरफ से उसका वह अभिभावक सच्चाई और न्याय के साथ लिखवाए, जो उसके बारे में ज़िम्मेदार है। तथा दो समझदार और न्यायप्रिय पुरुषों को गवाह बना लो। अगर दो पुरुष न मिलें, तो एक पुरुष और दो महिलाओं को गवाह बना लो, जिनके धर्म और ईमानदारी से तुम संतुष्ट हो, ताकि यदि एक महिला भूल जाए, तो उसकी बहन उसे याद दिला दे। और गवाहों से जब क़र्ज पर गवाही देने के लिए कहा जाए, तो पीछे न हटें। और अगर उन्हें ऐसा करने के लिए बुलाया जाए तो उनके लिए गवाही देना अनिवार्य है। तथा क़र्ज़ को, चाहे वह थोड़ा हो या बहुत, उसकी निर्धारित अवधि के लिए लिखने में तुम ऊब से ग्रस्त न हो। क्योंकि क़र्ज़ का लिख लेना, अल्लाह की शरीयत में अधिक न्यायसंगत है, गवाही को क़ायम करने और उसकी अदायगी में अधिक प्रभावी है और क़र्ज़ के प्रकार, उसकी मात्रा और उसकी अवधि के बारे में किसी भी संदेह को दूर करने के अधिक निकट है। परंतु यदि तुम्हारे बीच अनुबंध वर्तमान सामान और वर्तमान मूल्य में व्यापार पर हो; तो उस समय लिखना छोड़ देने में तुमपर कोई पाप नहीं, क्योंकि इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन विवाद के कारणों को रोकने के लिए, तुम्हारे लिए गवाह रखना धर्मसंगत है। तथा लिखने वालों और गवाहों को नुक़सान पहुँचाना जायज़ नहीं है। इसी तरह लिखने वालों तथा गवाहों के लिए उस व्यक्ति को नुक़सान पहुँचाना जायज़ नहीं है, जो उनसे लिखने या गवाही देने के लिए कहे। अगर तुम्हारी ओर से उन्हें नुक़सान पहुँचाया जाता है, بلغ क़ुरआन · तफ़सीर तो यह अल्लाह की आज्ञाकारिता से उसकी अवज्ञा की ओर निकलना है। तथा - ऐ ईमान वालो! - अल्लाह से डरो, इस तौर पर कि उसके आदेशों का पालन करो और उसके निषेधों से बचो। अल्लाह तुम्हें वह बातें सिखाता है, जिनमें तुम्हारी दुनिया और आख़िरत की बेहतरी व भलाई है। और अल्लाह हर चीज़ को ख़ूब जानने वाला है। अतः उससे कोई चीज़ छिपी नहीं है।

۞ وَإِن كُنتُمْ عَلَىٰ سَفَرٍۢ وَلَمْ تَجِدُوا۟ كَاتِبًۭا فَرِهَـٰنٌۭ مَّقْبُوضَةٌۭ ۖ فَإِنْ أَمِنَ بَعْضُكُم بَعْضًۭا فَلْيُؤَدِّ ٱلَّذِى ٱؤْتُمِنَ أَمَـٰنَتَهُۥ وَلْيَتَّقِ ٱللَّهَ رَبَّهُۥ ۗ وَلَا تَكْتُمُوا۟ ٱلشَّهَـٰدَةَ ۚ وَمَن يَكْتُمْهَا فَإِنَّهُۥٓ ءَاثِمٌۭ قَلْبُهُۥ ۗ وَٱللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ عَلِيمٌۭ ﴿٢٨٣﴾

यदि तुम यात्रा कर रहे हो और तुम्हें कोई लिखने वाला न मिले, जो तुम्हारे लिए क़र्ज़ की दस्तावेज़ लिखे, तो देनदार के लिए इतना काफी है कि कोई सामान गिरवी रख दे, जिसे ऋण देने वाला अपने क़ब्ज़े में ले लेगा, जो उसके अधिकार की गारंटी होगी, यहाँ तक कि देनदार अपने क़र्ज़ का भुगतान कर दे। अगर तुममें से कोई व्यक्ति किसी पर भरोसा करे, तो ऐसी स्थिति में लिखने, या गवाह बनाने या गिरवी रखने की आवश्यकता नहीं है। उस समय क़र्ज़ देनदार के ज़िम्मे एक अमानत के तौर पर रहेगा, उसपर उसे अपने लेनदार को चुकाना अनिवार्य है। उसे चाहिए कि इस अमानत के बारे में अल्लाह से डरे और उसमें से किसी भी चीज़ का इनकार न करे। अगर वह इनकार करता है, तो लेन-देन को देखने वाले को गवाही देनी चाहिए। और उसके लिए गवाही छिपाना जायज़ नहीं है। और जो कोई गवाही छिपाता है, तो उसका दिल एक पापी (दुष्ट) दिलहै। याद रखो कि जो कु छ तुमकरते हो, अल्लाह उसे जानता है, उससे कोई चीज़ छिपी नहीं है। और वह तुम्हें तुम्हारे कार्यों का बदला देगा।

لِّلَّهِ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ ۗ وَإِن تُبْدُوا۟ مَا فِىٓ أَنفُسِكُمْ أَوْ تُخْفُوهُ يُحَاسِبْكُم بِهِ ٱللَّهُ ۖ فَيَغْفِرُ لِمَن يَشَآءُ وَيُعَذِّبُ مَن يَشَآءُ ۗ وَٱللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرٌ ﴿٢٨٤﴾

ى जो कु छ आकाशों में और जो कु छ पृथ्वी पर है, सबका पैदा करने वाला, मालिक और प्रबंधन करने वाला के वल अल्लाह है। यदि तुम अपने दिलों में जो कु छ है उसे प्रकट करो या उसे छिपाओ, अल्लाह उसे जानता है और वह तुमसे उसका हिसाब लेगा। फिर उसके बाद अपनी कृ पा और दया से जिसे चाहेगा, क्षमा कर देगा और जिसे चाहेगा, अपने न्याय और हिकमत से यातना देगा। और अल्लाह हर चीज़ पर सर्वशक्तिमान है।

ءَامَنَ ٱلرَّسُولُ بِمَآ أُنزِلَ إِلَيْهِ مِن رَّبِّهِۦ وَٱلْمُؤْمِنُونَ ۚ كُلٌّ ءَامَنَ بِٱللَّهِ وَمَلَـٰٓئِكَتِهِۦ وَكُتُبِهِۦ وَرُسُلِهِۦ لَا نُفَرِّقُ بَيْنَ أَحَدٍۢ مِّن رُّسُلِهِۦ ۚ وَقَالُوا۟ سَمِعْنَا وَأَطَعْنَا ۖ غُفْرَانَكَ رَبَّنَا وَإِلَيْكَ ٱلْمَصِيرُ ﴿٢٨٥﴾

रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हर उस चीज़ पर ईमान लाए, जो उनके पालनहार की ओर से उनकी तरफ़ उतारी गई और इसी प्रकार मोमिन भी ईमान लाए। वे सभी अल्लाह पर ईमान लाए, तथा उसके सभी फरिश्तों पर, उसकी सभी उन किताबों पर जो उसने नबियों पर उतारी और उसके भेजे हुए सभी रसूलों पर ईमान लाए। वे उनपर यह कहते हुए ईमान लाए: हम अल्लाह के रसूलों में से किसी के बीच भी अंतर नहीं करते। तथा उन लोगों ने कहा: हमने उसे सुना जिसका तूने हमें आदेश दिया और जिससे हमें मना किया, तथा जिस चीज़ का तूने आदेश दिया उसे अंजाम देकर और जिससे तूने मना किया उसे त्यागकर हमने तेरी आज्ञा का पालन किया। ऐ हमारे रब! हमतुझसे प्रार्थना करते हैं कि तू हमें क्षमा कर दे। क्योंकि हमारे सभी मामलों में हमारा लौटना के वलतेरी ही ओर है।

لَا يُكَلِّفُ ٱللَّهُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَا ۚ لَهَا مَا كَسَبَتْ وَعَلَيْهَا مَا ٱكْتَسَبَتْ ۗ رَبَّنَا لَا تُؤَاخِذْنَآ إِن نَّسِينَآ أَوْ أَخْطَأْنَا ۚ رَبَّنَا وَلَا تَحْمِلْ عَلَيْنَآ إِصْرًۭا كَمَا حَمَلْتَهُۥ عَلَى ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِنَا ۚ رَبَّنَا وَلَا تُحَمِّلْنَا مَا لَا طَاقَةَ لَنَا بِهِۦ ۖ وَٱعْفُ عَنَّا وَٱغْفِرْ لَنَا وَٱرْحَمْنَآ ۚ أَنتَ مَوْلَىٰنَا فَٱنصُرْنَا عَلَى ٱلْقَوْمِ ٱلْكَـٰفِرِينَ ﴿٢٨٦﴾

अल्लाह किसी प्राणी पर केवल उसी का भार डालता है जिसके करने में वह सक्षम हो।क्योंकि अल्लाह का दीन (धर्म) आसानी पर आधारित है, इसलिए उसमें कोई कठिनाई नहीं है। अतः जिसने अच्छा कार्य किया, उसे अपने किए का प्रतिफल मिलेगा, उसमें कोई कमी नहीं की जाएगी। तथा जिसना बुरा कार्य किया, उसे अपने किए हुए पाप का दंड मिलेगा, उसकी ओर से कोई दूसरा उसका भार नहीं उठाएगा। रसूल और ईमान वालों ने कहा: ऐ हमारे पालनहार! अगर हम भूल गए हों या बिना इरादे के किसा कार्य या बात में हमसे कोई गलती हो गई हो, तो हमें सज़ा न दे। ऐ हमारे पालनहार! और हम पर उस चीज़ का भार न डाल, जो हमारे लिए कठिन हो और हम उसे सहन न कर सकें, जैसा कि तूने हमसे पहले उन लोगों पर भार डाला था, जिन्हें तूने उनके अत्याचार के कारण दंडित किया था, जैसे यहूदी लोग। तथा हमपर ऐसे आदेशों और निषेधों का बोझ न डाल, जो हमारे लिए कठिन हों और हमउन्हें करने में सक्षमन हों। तथा हमारे पापों को क्षमा कर दे और हमें माफ़ी प्रदान कर, तथा अपनी कृ पा से हमपर दया कर। तू ही हमारा संरक्षक और सहायक है, अतः हमें काफ़िरों पर विजय प्रदान कर। स्रोत:अल-मुख़्तसर फ़ी तफ़सीरिल क़ु रआनिल करीम

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