((لَا إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ وَحْدَهُ لاَ شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ، وَلَهُ الْحَمدُ، وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ. لاَ حَوْلَ وَلاَ قُوَّةَ إِلاَّ بِاللَّهِ، لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ، وَلاَ نَعْبُدُ إِلاَّ إِيَّاهُ, لَهُ النِّعْمَةُ وَلَهُ الْفَضْلُ وَلَهُ الثَّنَاءُ الْحَسَنُ، لَا إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ وَلَوْ كَرِهَ الكَافِرُونَ)).
68. (अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं। वह अकेला है, उसका कोई शरीक नहीं। बादशाही उसी की है, उसी के लिए सब तारीफ़ है और वह हर चाज़ पर क़ुदरत रखने वाला है। अल्लाह की मदद के बिना न गुनाह से बचने की शक्ति है, न नेकी करने की ताक़त। अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं और उसके सिवा हम किसी की इबादत नहीं करते। उसी के लिए नेमत है, उसी के लिए फ़ज़्ल और उसी के लिए अच्छी तारीफ़ है। अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं। हम अपनी इबादत उसी के लिए विशुद्ध करते हैं, चाहे काफिरों को बुरा ही लगे। (1) .......................... (1) मुस्लिमः1/415, हदीस संख्याः594
सुनें · आवाज़ Hamad al-Duraiham