((اللَّهُمَّ مَا أَصْبَحَ بِي مِنْ نِعْمَةٍ أَوْ بِأَحَدٍ مِنْ خَلْقِكَ فَمِنْكَ وَحْدَكَ لاَ شَرِيكَ لَكَ، فَلَكَ الْحَمْدُ وَلَكَ الشُّكْرُ)). [وإذا أمسى قال: اللَّهم ما أمسى بي...]
81. (ऐ अल्लाह! मुझ पर या तेरी मख़्लूक में किसी पर जिस नेमत ने भी सुबह़ की है (1), वह केवल तेरी तरफ से है। तू अकेला है, तेरा कोई शरीक नहीं। अतः तेरे ही लिए सब तारीफ़ है और तेरे ही लिए शुक्र है।) (2) ................................ (1) और जब शाम के वक़्त पढ़े तो कहेः ऐ अल्लाह! मुझ पर या तेरी मख़्लूक में किसी पर जिस नेमत ने भी शाम की है۔۔۔۔۔ (2) जिसने यह दुआ सुबह़ के समय पढ़ी, उसने उस दिन का शुक्र अदा कर लिया और जिसने यह दुआ शाम के समय पढ़ी, उसने उस रात का शुक्र अदा कर लिया। अबू दाऊदः 4/318, हदीस संख्याः5075, नसाई की अ़मलुल-यौमे वल-लैला,हदीस संख्याः7, इब्नुस्-सुन्नी, हदीस संख्याः41, इब्ने ह़िब्बान (मवारिद) हदीस संख्याः2361, शैख़ इब्ने बाज़ ने इसकी सनद को तोह़फतुल-अख़्यार पृष्ठ संख्याः24 में ह़सन कहा है।
सुनें · आवाज़ Hamad al-Duraiham