((اللَّهُمَّ عَافِنِي فِي بَدَنِي، اللَّهُمَّ عَافِنِي فِي سَمْعِي، اللَّهُمَّ عَافِنِي فِي بَصَرِي، لاَ إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ. اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْكُفْرِ، وَالفَقْرِ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ عَذَابِ القَبْرِ، لاَ إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ)) (ثلاثَ مرَّاتٍ).
82. (ऐ अल्लाह! मुझे मेरे बदन में आफ़ियत दे। ऐ अल्लाह! मुझे मेरे कानों में आफ़ियत दे। ऐ अल्लाह! मुझे मेरी आंखों में आफ़ियत दे। तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं। ऐ अल्लाह! मैं कुफ़्र और फ़क़्र (ग़रीबी) से तेरी पनाह चाहता हूं और क़ब्र के अ़ज़ाब से तेरी पनाह चाहता हूं। तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं।) (तीन बार) (1) ............................................ (1) अबू दाऊदः 4/324, हदीस संख्याः5092, नसाई की अ़मलुल-यौमे वल-लैला,हदीस संख्याः22, इब्नुस्-सुन्नी, हदीस संख्याः69, बुख़ारी की अल-अदबुल-मुफ़रद, हदीस संख्याः701, शैख़ इब्ने बाज़ ने इसकी सनद को तोह़फतुल-अख़्यार पृष्ठ संख्याः26 में ह़सन कहा है।
सुनें · आवाज़ Hamad al-Duraiham