((اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِحَيِّنَا وَمَيِّتِنَا، وَشَاهِدِنَا وَغَائِبِنَا، وَصَغِيرِنَا وَكَبيرِنَا، وَذَكَرِنَا وَأُنْثَانَا. اللَّهُمَّ مَنْ أَحْيَيْتَهُ مِنَّا فَأَحْيِهِ عَلَى الْإِسْلاَمِ، وَمَنْ تَوَفَّيْتَهُ مِنَّا فَتَوَفَّهُ عَلَى الإِيمَانِ، اللَّهُمَّ لاَ تَحْرِمْنَا أَجْرَهُ، وَلاَ تُضِلَّنَا بَعْدَهُ)).
157۔ (ऐ अल्लाह! हमारे ज़िन्दों औऱ मुर्दों, हमारे ह़ाज़िर और ग़ायब, हमारे छोटों और बड़ों और हमारे मर्दों और औरतों को बख़्श दे। ऐ अल्लाह! हम में से जिसे तू ज़िन्दा रख उसे इस्लाम पर ज़िन्दा रख और हम में से जिसे तू मौत दे उसे ईमान पर मौत दे। ऐ अल्लाह! इसके बदले (अज्र) से हमें मह़रूम न रख और इसके बाद हम को गुमराह न कर।) (1) .................................. (1) अबू दाऊद, हदीस संख्याः3201, तिर्मिज़ी ,हदीस संख्याः1024, नसाई, हदीस संख्याः1985, इब्ने माजाः1/480, हदीस संख्याः1498, अह़मदः2/368,हदीस संख्याः8809 देखिएः सह़ीह़ इब्ने माजाः1/251
सुनें · आवाज़ Hamad al-Duraiham