((اللَّهُمَّ اغْفِرْ لَهُ وَارْحَمْهُ، وَعَافِهِ، وَاعْفُ عَنْهُ، وَأَكْرِمْ نُزُلَهُ، وَوَسِّعْ مُدْخَلَهُ، وَاغْسِلْهُ بِالْمَاءِ وَالثَّلْجِ وَالْبَرَدِ، وَنَقِّهِ مِنَ الْخَطَايَا كَمَا نَقَّيْتَ الثَّوْبَ الأَبْيَضَ مِنَ الدَّنَسِ، وَأَبْدِلْهُ دَاراً خَيْراً مِنْ دَارِهِ، وَأَهْلاً خَيْراً مِنْ أَهْلِهِ، وَزَوْجَاً خَيْراً مِنْ زَوْجِهِ، وَأَدْخِلْهُ الْجَنَّةَ، وَأَعِذْهُ مِنْ عَذَابِ القَبْرِ [وَعَذَابِ النَّارِ])).
156. (ऐ अल्लाह! इसे बख़्श दे, इस पर रह़म फ़रमा, इसे आफ़ियत दे, इसे माफ़ कर दे, इसकी अच्छी मेहमान नवाज़ी कर, इसकी क़ब्र को फैला दे, इसके गुनाह को पानी, बर्फ और ओले से धो दे और इसे गुनाहों से इस तरह साफ़ कर दे जैसे तूने सफ़ेद कपड़े को मैल से साफ़ कर दिया है। इसे बदले में इसके घर से अच्छा घर दे, इसके घर वालों से अच्छे घर वाले दे और इसके जोड़े से अच्छा जोड़ा दे। इसे जन्नत में दाख़िल फ़रमा और इसे क़ब्र और [जहन्नम के अज़ाब] से बचा।) (1) ................................. (1) मुस्लिमः2/663, हदीस संख्याः963
सुनें · आवाज़ Hamad al-Duraiham