((اللَّهُمَّ إِنِّي ظَلَمْتُ نَفْسِي ظُلْماً كَثِيراً، وَلاَ يَغْفِرُ الذُّنوبَ إِلاَّ أَنْتَ، فَاغْفِرْ لِي مَغْفِرَةً مِنْ عِنْدِكَ وَارْحَمْنِي، إِنَّكَ أَنْتَ الغَفورُ الرَّحيمُ)).
57. (ऐ अल्लाह! मैंने अपनी जान पर बहुत ज़ुल्म किया और तेरे सिवा कोई और गुनाहों को माफ़ नहीं कर सकता। अतः मुझे अपने ख़ास फ़ज़्ल से बख़्श दे और मुझ पर रह़म कर। बेशक तू बख़्ने वाला और अत्यधिक रह़म करने वाला है।) (1) ..................... (1) बुखारीः8/168, हदीस संख्याः834, मुस्लिमः4/2078, हदीस संख्याः2705
सुनें · आवाज़ Hamad al-Duraiham