((اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِي مَا قَدَّمْتُ، وَمَا أَخَّرْتُ، وَمَا أَسْرَرْتُ، وَمَا أَعْلَنْتُ، وَمَا أَسْرَفْتُ، وَمَا أَنْتَ أَعْلَمُ بِهِ مِنِّي. أَنْتَ الْمُقَدِّمُ، وَأَنْتَ الْمُؤَخِّرُ لاَ إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ)).
58. (ऐ अल्लाह! मुझे बख़्श दे जो मैंने पहले किया, जो बाद में किया, जो मैंने छिपा कर किया और जो सबके सामने किया, जो मैंने ज़्यादती की और जिसे तू मुझसे ज़्यादा जानता है। तू ही आगे ले जाने वाला और तू ही पीछे करने वाला है। तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं।) (1) ............................ (1) मुस्लिमः1/534,हदीस संख्याः771
सुनें · आवाज़ Hamad al-Duraiham