((اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ بِأَنَّ لَكَ الْحَمْدَ لَا إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ وَحْدَكَ لاَ شَرِيكَ لَكَ، الْمَنَّانُ، يَا بَدِيعَ السَّمَوَاتِ وَالْأَرْضِ يَا ذَا الْجَلاَلِ وَالْإِكْرَامِ، يَا حَيُّ يَا قَيُّومُ إِنِّي أَسْأَلُكَ الْجَنَّةَ وَأَعُوذُ بِكَ مِنَ النَّارِ)).
64. (ऐ अल्लाह! मैं तुझसे सवाल करता हूं इस बात के द्वारा कि हर प्रकार की तारीफ़ तेरे ही लिए है, तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, तू अकेला है, तेरा कोई शरीक नहीं, तू बेह़द एह़सान करने वाला है। ऐ आस्मानों तथा ज़मीन को बनाने वाले! ऐ बुज़ुर्गी तथा इज़्ज़त वाले! ऐ ज़िन्दा तथा क़ायम रखने वाले! मैं तुझसे जन्नत का सवाल करता हूं और आग से तेरी पनाह चाहता हूं। (1) ........................ (1) अबू दाऊद, हदीस संख्याः1495, तिर्मिज़ी ,हदीस संख्याः3544, इब्ने माजा, हदीस संख्याः3858, नसाई, हदीस संख्याः1299, देखिएः सह़ीह़ इब्ने माजाः2/329
सुनें · आवाज़ Hamad al-Duraiham