((وَجَّهْتُ وَجْهِيَ لِلَّذِي فَطَرَ السَّمَوَاتِ وَالأَرْضَ حَنِيفَاً وَمَا أَنَا مِنَ الْمُشْرِكِينَ، إِنَّ صَلاَتِي، وَنُسُكِي، وَمَحْيَايَ، وَمَمَاتِي لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ، لاَ شَرِيكَ لَهُ وَبِذَلِكَ أُمِرْتُ وَأَنَا مِنَ الْمُسْلِمِينَ. اللَّهُمَّ أَنْتَ المَلِكُ لاَ إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ، أَنْتَ رَبِّي وَأَنَا عَبْدُكَ، ظَلَمْتُ نَفْسِي وَاعْتَرَفْتُ بِذَنْبِي فَاغْفِرْ لِي ذُنُوبي جَمِيعَاً إِنَّهُ لاَ يَغْفِرُ الذُّنوبَ إِلاَّ أَنْتَ. وَاهْدِنِي لِأَحْسَنِ الأَخْلاقِ لاَ يَهْدِي لِأَحْسَنِها إِلاَّ أَنْتَ، وَاصْرِفْ عَنِّي سَيِّئَهَا، لاَ يَصْرِفُ عَنِّي سَيِّئَهَا إِلاَّ أَنْتَ، لَبَّيْكَ وَسَعْدَيْكَ، وَالخَيْرُ كُلُّهُ بِيَـــــــدَيْكَ، وَالشَّـــــرُّ لَيْسَ إِلَيْــــــكَ، أَنَا بِكَ وَإِلَيْكَ، تَبارَكْتَ وَتَعَالَيْتَ، أَسْتَغْفِرُكَ وَأَتوبُ إِلَيْكَ)).
29. (मैंने अपना चेहरा उस ज़ात की तरफ़ फेर लिया, जिसने यकसू (एकाग्रचित) होकर आस्मानों और ज़मीन को बनाया और मैं मुश्रिकों में से नहीं हूं। मेरी नमाज़, मेरी क़ुर्बानी, मेरी ज़िन्दगी और मेरी, मौत सारे जहान वालों के रब अल्लाह के लिए है। उसका कोई शरीक नहीं। मुझे इसी अक़ीदे पर ईमान रखने का ह़ुक्म दिया गया है औऱ मैं मुसलमानों में से हूं। ऐ अल्लाह! तू ही बादशाह है, तेरे सिवा कोई सच्चा माबूद नहीं, तू ही मेरा रब है और मैं तैरा बंदा हूं। मैंने अपने आप पर ज़ुल्म किया है। अपने गुनाहों का इक़्रार करता हूं। अतः मेरे सारे गुनाहों को बख़्श दे, क्योंकि तेरे सिवा कोई और गुनाहों को बख़्श नहीं सकता। और मुझे सबसे अच्छे अख़्लाक़ (स्वभाव) की ओर हिदायत दे। सबसे अच्छे अख़्लाक़ (स्वभाव) की ओर हिदायत तेरे सिवा कोई नहीं दे सकता। ऐ अल्लाह! मैं इबादत के लिए हीज़िर हूं, तेरी तारीफ़ के लिए हीज़िर हूं। हर प्रकार की भलाई तेरे हाथों में है और बुराई की निस्बत तेरी तरफ नहीं की जा सकती। मैं तेरी तौफ़ीक़ से हूं और तेरी ओर मुतवज्जेह हूं। तू बरकत वाला और बुलंद है। मैं तुझसे माफी मांगता हूं और तौबा करता हूं।) (1) .................... (1) मुस्लिमः1/534, हदीस संख्याः771
सुनें · आवाज़ Hamad al-Duraiham