((اللَّهُمَّ رَبَّ جِبْرَائِيلَ، وَمِيْكَائِيلَ، وَإِسْرَافِيلَ، فَاطِرَ السَّمَوَاتِ وَالأَرْضِ، عَالِمَ الغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ أَنْتَ تَحْكُمُ بَيْنَ عِبَادِكَ فِيمَا كَانُوا فِيهِ يَخْتَلِفُونَ. اهْدِنِي لِمَا اخْتُلِفَ فِيهِ مِنَ الْحَقِّ بِإِذْنِكَ إِنَّكَ تَهْدِي مَنْ تَشَاءُ إِلَى صِرَاطٍ مُسْتَقيمٍ)).
30. (ऐ अल्लाह! ऐ जिब्राईल, मीकाईल और इस्राफ़ील के रब! आस्मानों और ज़मीन के पैदा करने वाले! ग़ायब और ह़ाज़िर को जानने वाले! अपने बंदों के बीच तू ही उस चीज़ के बारे में फ़ैस्ला करेगा, जिसमें वे इख़्तिलाफ़ करते थे। ह़क़ की जिन बातों में इख़्तिलाफ़ हो गया है, तू अपनी इजाज़त से मुझे उनके सम्बंध में च्चाई की ओर हिदायत दे दे। बेशक तू जिसे चाहता है, सीधी राह की तरफ हिदायत देता है।) (1) ................... (1) मुस्लिमः1/534, हदीस संख्याः770
सुनें · आवाज़ Hamad al-Duraiham