((اللَّهُمَّ أَنْتَ رَبِّي لَا إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ، خَلَقْتَنِي وَأَنَا عَبْدُكَ، وَأَنَا عَلَى عَهْدِكَ وَوَعْدِكَ مَا اسْتَطَعْتُ، أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا صَنَعْتُ، أَبُوءُ لَكَ بِنِعْمَتِكَ عَلَيَّ، وَأَبُوءُ بِذَنْبِي فَاغْفِرْ لِي فَإِنَّهُ لاَ يَغْفِرُ الذُّنوبَ إِلاَّ أَنْتَ)).
79. (ऐ अल्लाह! तू ही मेरा रब है। तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं। तूने मुझे पैदा किया, मैं तेरा बन्दा हूं और मैं अपनी ताक़त-भर तेरे वादे पर क़ायम हूं। मैंने जो कुछ किया, उसके शर (बुराई) से तेरी पनाह चाहता हूं। अपने ऊपर तेरी नेमत का इक़रार (1) करता हूं और अपने गुनाहें का इक़रार करता हूं। अतः मुझे बख़्श दे, क्योंकि तेरे सिवा कोई दूसरा गुनाहों को नही बख़्श सकता।) (2) ............................ (1) स्वीकार करता हूं। (2) जो आदमी इस दुआ पर यक़ीन रखते हुए शाम को पढ़े और उसी रात उसकी मृत्यु हो जाए तो वो जन्नत में प्रवेश करेगा और ऐसे ही अगर यह दुआ सुबह़ को पढ़े और उसी दिन मर जाए तो जन्नत में प्रवेश करेगा। बुख़ारीः7/150, हदीस संख्याः6306
सुनें · आवाज़ Hamad al-Duraiham