((يَا حَيُّ يَا قَيُّومُ بِرَحْمَتِكَ أَسْتَغيثُ أَصْلِحْ لِي شَأْنِيَ كُلَّهُ وَلاَ تَكِلْنِي إِلَى نَفْسِي طَرْفَةَ عَيْنٍ)).
88. (ऐ जिन्दा रहने वाले! ऐ क़ायम रहने वाले! मैं तेरी ही रह़मत से फरयाद करता हूं, तू मेरे तमाम काम दुरुस्त कर दे और आंख झपकने के बरार भी मुझे मेरे नफ़्स के ह़वाले न कर।) (1) ..................................... (1) ह़ाकीम ने इसे रिवायत करके सह़ीह़ कहा है और ज़हबी ने सहमति व्यक्त की है, 1/545, देखिएः सह़ीह़ुत्-तरग़ीब वत्-तरहीबः1/273
सुनें · आवाज़ Hamad al-Duraiham