((أَصْبَحْنَا وَأَصْبَحَ الْمُلْكُ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ، اللَّهُـمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ خَيْرَ هَذَا الْيَوْمِ:فَتْحَهُ، وَنَصْرَهُ، وَنورَهُ، وَبَرَكَتَهُ، وَهُدَاهُ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا فِيهِ وَشَرِّ مَا بَعْدَهُ)). [وإذا أمسى قال: أمسينا وأمسى الملك للَّه ربّ العالمين اللَّهم إني أسألك خير هذه الليلة: فتحها، ونصرها، ونورها، وبركتها، وهداها، وأعوذ بك من شر ما فيها، وشر ما بعدها.]
89. (हमने सूबह़ की और अल्लाह रब्बुल-आलमीन के मुल्क ने सुबह़ की (1)। सब तारीफ़ अल्लाह के लिए है। ऐ अल्लाह! मैं तुझसे इस दिन (2) की भलाई, इसकी फ़त्ह़ व मदद, इसका नूर, इसकी बरकत और इसकी हिदायत का सवाल करता हूं तथा इस दिन की बुराई एवं इसके बाद वाले दिनों की बुराई से तेरी पनाह मांगता हूं।) (3) ..................................... (1) और जब शाम के वक्त पढ़े तो ये कहेः हमने शाम की और अल्लाह रब्बुल आलमीन के मुल्क ने शाम की। (2) और जब शाम के वक्त पढ़े तो ये कहेः ऐ बल्लाह मैं तुझसे इस रात की भलाई, इसकी फ़त्ह़ व मदद, इसका नूर, इसकी बरकत और इसकी हिदायत का सवाल करता हूं और इस रात की बुराई तथा इसके बाद वाली रातों की बुराई से तेरी पनाह मांगता हूं। (3) अबू दाऊदः4/322, ह़दीस संख्याः5084, और शैख शेऐब और अ़ब्दुर क़ादिर अरनाऊत ने इसकी सनद को ह़सन कहा है। तह़कीक़ ज़ादुल-मआदः2/373
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