((بِاسْمِكَ رَبِّي وَضَعْتُ جَنْبِي، وَبِكَ أَرْفَعُهُ، فَإِن أَمْسَكْتَ نَفْسِي فارْحَمْهَا، وَإِنْ أَرْسَلْتَهَا فَاحْفَظْهَا، بِمَا تَحْفَظُ بِهِ عِبَادَكَ الصَّالِحِينَ)).
102. (ऐ मेरे रब! तेरे नाम से (1) मैंने अपना पहलू (करवट) रखा और तेरी ही तौफ़ीक़ से इसे उठाऊंगा। इस लिए अगर तू मेरी जान (प्राण) को रोक ले तो उस पर रह़म कर और अगर उसे छोड़ दे तो तू उसकी ह़िफ़ाज़त कर, जैसा कि तू अपने नेक बन्दों की ह़िफ़ाज़त करतार है।) (2) .................................. (1) (जब तुम में से कोई आदमी अपने बिस्तर से उठे और फिर दोबारा उसकी जाए तो उसे अपने तहबन्द के किनारे से तीन बार झाड़ ले और बिस्मिल्लाह कहे, क्योंकि उसे पता नहीं कि उसके बाद उसपर कौन सी चीज़ आ गई हो और जब बिस्तर पर लेटे तो यह दुआ पढ़े...।) (2) बुखारी फ़त्ह़ुल-बारी के साथः11/126, हदीस संख्याः6320, मुस्लिमः4/2084, हदीस संख्याः2714,
सुनें · आवाज़ Hamad al-Duraiham