((اللَّهُمَّ إِنَّكَ خَلَقْتَ نَفْسِي وَأَنْتَ تَوَفَّاهَا، لَكَ مَمَاتُهَا وَمَحْياهَا، إِنْ أَحْيَيْتَهَا فَاحْفَظْهَا، وَإِنْ أَمَتَّهَا فَاغْفِرْ لَهَا. اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ العَافِيَةَ)).
103. (ऐ अल्लाह! तूने ही मेरी जीन (प्राण) पैदा की और तू ही इसे मौत देगा। तेरे ही क़ब्ज़् में इसे मारना औऱ ज़िन्दा रखना है। अगर तू इसे ज़िन्दा रखे तो इसकी ह़िफ़़ीज़त कर और अगर इसे मौत दे तो इसे बख़्श दे। ऐ अल्लाह, मैं तुझसे आफ़ियत का सवाल करता हूं।) (1) ............................. (1) मुस्लिमः4/2083, हदीस संख्याः2712, शब्द अह़मद के हैंः2/79, हदीस संख्याः5502
सुनें · आवाज़ Hamad al-Duraiham