((اللَّهُ أَكْبَرُ، اللَّهُ أَعَزُّ مِنْ خَلْقِهِ جَمِيعاً، اللَّهُ أَعَزُّ مِمَّا أَخَافُ وَأَحْذَرُ، أَعُوذُ بِاللَّهِ الَّذِي لاَ إِلَهَ إِلاَّ هُوَ، الْمُمْسِكِ السَّمَوَاتِ السَّبْعِ أَنْ يَقَعْنَ عَلَى الْأَرْضِ إِلاَّ بِإِذْنِهِ، مِنْ شَرِّ عَبْدِكَ فُلاَنٍ، وَجُنُودِهِ وَأَتْبَاعِهِ وَأَشْيَاعِهِ، مِنْ الْجِنِّ وَالإِنْسِ، اللَّهُمَّ كُنْ لِي جَاراً مِنْ شَرِّهِمْ، جَلَّ ثَنَاؤُكَ وَعَزَّ جَارُكَ، وَتَبَارَكَ اسْمُكَ، وَلاَ إِلَهَ غَيْرُكَ)) (ثلاثَ مرَّاتٍ).
130. (अल्लाह सबसे बड़ा है। अल्लाह अपनी मख़्लूक़ात से सबसे ज़्यादा ताक़त और ग़ल्बे वाला है। मैं जिस चीज़ से डरता और ख़ौफ़ खाता हूं अल्लाह उससे कहीं ज़्यादा ताक़तवर है। मैं उस अल्लाह की पनाह में आता हूं जिसके सिवा कोई भी इबादत के लायक़ नहीं, जो सातों आस्मानों को ज़मीन पर गिरने से थामे हुए है, लेकिन उसकी इजाज़त से (गिर सकते हैं), तेरे अमुक बन्दे के शर से और उसके लशकरों, चेलों, जिन्नातों और इन्सानों में से उसके जत्थों की बुराई से (तेरी पनाह में आता हूं।) ऐ अल्लाह, तू उनके शर से मेरे लिए मददगार बन जा। तेरी तारीफ़ बहुत बड़ी है, तेरी पनाह बहुत मज़बूत है औऱ तेरा नाम बहुत बरकत वाला है और तेरे सिवा कोई भी इबादत के लायक़ नहीं।) (तीन बार) (1) ................................ (1) बुखारी की अल-अदबुल- मुफ्रद हदीस संख्याः708 और शैख़ अल्बानी ने इसे सह़ीह़ कहा है। सह़ीह़ अदबुल- मुफ्रद हदीस संख्याः546
सुनें · आवाज़ Hamad al-Duraiham