((اللَّهُمَّ إِيَّاكَ نعْبُدُ، وَلَكَ نُصَلِّي وَنَسْجُدُ، وَإِلَيْكَ نَسْعَى وَنَحْفِدُ، نَرْجُو رَحْمَتَكَ، وَنَخْشَى عَذَابَكَ، إِنَّ عَذَابَكَ بِالكَافِرِينَ مُلْحَقٌ. اللَّهُمَّ إِنَّا نَسْتَعينُكَ، وَنَسْتَغْفِرُكَ، وَنُثْنِي عَلَيْكَ الْخَيْرَ، وَلاَ نَكْفُرُكَ، وَنُؤْمِنُ بِكَ، وَنَخْضَعُ لَكَ، وَنَخْلَعُ مَنْ يَكْفرُكَ)).
118. (ऐ अल्लाह! हम तेरी ही इबादत करते हैं। तेरे लिए ही नमाज़ पढ़ते हैं। तेरी तरफ़ ही कोशिश और जल्दी करते हैं। तेरी रह़मत की उम्मीद रखते हैं और तेरे अ़ज़ाब से डरते हैं। तेरा अ़ज़ाब काफ़िरों को मिलने वाला है। ऐ अल्लाह! हम तुझसे मदद मांगते हैं और तुझसे माफ़ी मांगते हैं। तेरी अच्छी तारीफ़ करते हैं। तेरी नाशुक्री नहीं करते। तुझपर ईमान रखते हैं। तेरे सामने झुकते हैं। जो तेरी नाशुक्री करे हम उससे अपना रिशता ख़त्म करते हैं।) (1) ........................... (1) बैहक़ी ने इसे 'सुन-ने-कुबरा' में रिवायत करके इसकी सनद को सह़ीह़ कहा है। 2/211 और शैख़ अल्बानी ने अपनी किताब इरवाउल-ग़लील में कहा हैः(( इसकी सनद सह़ीह़ है।)),2/170, और ये दुआ उमर रज़ियल्लाहु अन्हु के कथन से साबित है, रसूलुल्लाह से नहीं।
सुनें · आवाज़ Hamad al-Duraiham