((اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِرِضَاكَ مِنْ سَخَطِكَ، وَبِمُعَافَاتِكَ مِنْ عُقُوبَتِكَ، وَأَعُــــوذُ بِكَ مِنْكَ، لاَ أُحْصِي ثَنَاءً عَلَيْكَ، أَنْتَ كَمَا أَثْنَيْتَ عَلَى نَفْسِكَ)).
117. (ऐ अल्लाह! मैं तेरी नाराज़गी से भाग कर तेरी रज़ा की पनाह में आता हूं, तेरी सज़ा से तेरी माफ़ी की पनाह में आता हूं और तुझसे तेरी पनाह में आता हूं। तू उसी तरह़ है जिस तरह़ तूने ख़ुद अपनी तारीफ़ की है।) (1) .................................. (1) अबू-दाऊद ,हदीस संख्याः1427, तिर्मिज़ी, हदीस संख्याः3566, नसाई,हदीस संख्याः1746, इब्ने माजा हदीस संख्याः1179, अह़मद, हदीस संख्याः751, देखिएः सह़ीह तिर्मिज़ीः3/180 , सह़ीह इब्ने माजाः1/194 और अल्बानी की इरवाउल-ग़लीलः2/175
सुनें · आवाज़ Hamad al-Duraiham