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कुनूते वित्र की दुआ । — ज़िक्र 1

دعاء قنوت الوتر · हिस्नुल मुस्लिम · 1 / 3

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((اللَّهُمَّ اهْدِنِي فِيمَنْ هَدَيْتَ، وَعَافِنِي فِيمَنْ عَافَيْتَ، وَتَوَلَّنِي فِيمَنْ تَوَلَّيْتَ، وَبَارِكْ لِي فِيمَا أَعْطَيْتَ، وَقِنِي شَرَّ مَا قَضَيْتَ؛ فَإِنَّكَ تَقْضِي وَلاَ يُقْضَى عَلَيْكَ، إِنَّهُ لاَ يَذِلُّ مَنْ وَالَيْتَ، [وَلاَ يَعِزُّ مَنْ عَادَيْتَ]، تَبارَكْتَ رَبَّنا وَتَعَالَيْتَ)).

116. (ऐ अल्लाह! तूने जिन लोगों को हिदायत दी है, उन्हीं के साथ मुुझे भी हिदायत दे दे, जिन लोगों को तूने आफ़ियत दी है, उन्हीं के साथ मुुझे भी आफ़ियत दे दे, जिनका तू वाली बना है उन्हीं के साथ साथ मेरा भी वाली बन, तूने जो कुछ मुझे अ़ता किया है उस में मेरे लिए बरकत दे औऱ जो फ़ैसले तूने किए हैं उनकी बुराई से मुझे मह़फ़ूज़ रख। क्योंकि तू ही फ़ैसला करने वाला है और तेरे ख़िलाफ़ कोई फ़ैसला नहीं कर सकता। जिसका तू दोस्त बन जाए वो कभी रुस्वा नहीं हो सकता [और जिसका तू दुशमन बन जाए वो कभी इज़्जत वाला नहीं हो सकता।] ऐ हमारे रब! तू बहुत बरकत वाला और बुलन्द है।) (1) ................................ (1) अबू-दाऊद ,हदीस संख्याः1425, तिर्मिज़ी, हदीस संख्याः464, नसाई,हदीस संख्याः1744, इब्ने माजा हदीस संख्याः1178, अह़मद, हदीस संख्याः1718, दारिमी, हदीस संख्याः1592, ह़ाकिमः3/172, बैहक़ीः2/209, दोनों कोष्ठों के बीच का भाग बैहक़ी का है, देखिएः सह़ीह तिर्मिज़ीः1/144 , सह़ीह इब्ने माजाः1/194 और शैख़ अल्बानी की इरवाउल-ग़लीलः2/172

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