يَقُولُ: ((اللَّهُمَّ رَبَّ هَذِهِ الدَّعْوَةِ التَّامَّةِ، وَالصَّلاَةِ الْقَائِمَةِ، آتِ مُحَمَّداً الْوَسِيلَةَ وَالْفَضِيلَةَ، وَابْعَثْهُ مَقَامَاً مَحمُوداً الَّذِي وَعَدْتَهُ، [إِنَّكَ لَا تُخْلِفُ الْمِيعَادَ])).
25. (ऐ अल्लाह! इस पूर्ण दावत और खड़ी होने वाली नमाज़ के रब! मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को वसीला और फ़ज़ीलत प्रदान कर और उन्हें उस मक़ामे मह़मूद पर पहुंचा दे, जिसका तूने उनसे वादा किया है। [बेशक तू वादा खिलाफ़ी नहीं करता।]) (1) ......................... (1) बुखारीः1/152, हदीस संख्याः614, दोनों कोष्ठों के बीच के शब्द बैहक़ी के हैं औऱ इसकी सनद को अल्लामा अब्दुल्-अज़ीज़ बिन बाज़ ने तोह़फ़तुल अख़्यार पृष्ठः38 में ह़सन कहा है।
सुनें · आवाज़ Hamad al-Duraiham