((اللَّهُمَّ بِعِلْمِكَ الغَيْبَ وَقُدْرَتِكَ عَلَى الْخَلقِ أَحْيِنِي مَا عَلِمْتَ الْحَيَاةَ خَيْراً لِي، وَتَوَفَّنِي إِذَا عَلِمْتَ الْوَفَاةَ خَيْراً لِي، اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ خَشْيَتَكَ فِي الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ، وَأَسْأَلُكَ كَلِمَةَ الْحَقِّ فِي الرِّضَا وَالْغَضَبِ، وَأَسْأَلُكَ الْقَصْدَ فِي الْغِنَى وَالْفَقْرِ، وَأَسْأَلُكَ نَعِيماً لاَ يَنْفَدُ، وَأَسْأَلُكَ قُرَّةَ عَيْنٍ لاَ تَنْقَطِعُ، وَأَسْأَلُكَ الرِّضَا بَعْدَ الْقَضَاءِ، وَأَسْــــأَلُكَ بَرْدَ الْعَيْشِ بَعْدَ الْمَوْتِ، وَأَسْأَلُكَ لَذَّةَ النَّظَرِ إِلَى وَجْهِكَ، وَالشَّوْقَ إِلَى لِقائِكَ فِي غَيرِ ضَرَّاءَ مُضِرَّةٍ، وَلاَ فِتْنَةٍ مُضِلَّةٍ، اللَّهُمَّ زَيِّنَا بِزِينَةِ الإِيمَانِ، وَاجْعَلْنَا هُدَاةً مُهْتَدِينَ)).
62. (ऐ अल्लाह! मैं तेरे ग़ैब जानने और मख़्लूक़ पर क़ुदरत रखने के साथ सवाल करता हूं कि मुझे उस वक़्त तक ज़िन्दा रख, जब तक ज़िन्दगी मेरे लिए बेहतर जाने और मुझे उस वक़्त वफ़ात दे, जब वफ़ात मेरे लिए बेहतर जाने। ऐ अल्लाह! मैं ग़ायब और ह़ाज़िर होने की ह़ालत में तुझसे तेरे खौफ़ का सवाल करता हूं, रज़ा तथा नाराज़्गी हर ह़ालत में तुझसे ह़क़ बात कहने की तौफ़ीक़ मांगता हूं, अमीरी तथा ग़रीबी में बीच का रास्ता अपनाने की तौफ़ीक़ मांगता हूं, तूझसे ऐसी नेमत का सवाल करता हूं जो कभी ख़त्म न हो, आंखों की ऐसी ठंडक का सवाल करता हूं जो समाप्त न हो, तुझसे तेरे फ़ैस्ले पर राज़ी रहने का सवाल करता हूं, तुझसे मौत के बाद ख़ुश्गवार ज़िन्दगी का सवाल करता हूं और तुझसे तेरे चेहरे की तरफ़ देखने की लज़्ज़त और तेरी मुलाक़ात के शौक़ का सवाल करता हूं, बिना किसी कष्ट-दायक मुसीबत और गुमराह करने वाले फ़ितने के। ऐ अल्लाह! हमें ईमान की शोभा से सुशोभित फ़रमा और हमें हिदायत याफ़ता रहबर बना दे।) (1) ........................... (1) नसाईः3/54-55, ह़दीस संख्याः1304, अह़मदः4/364,ह़दीस संख्याः21666, इसे अल्बानी ने सह़ीह़ नसाईः1/281 में सह़ीह़ कहा है।
सुनें · आवाज़ Hamad al-Duraiham