((اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِرِضَاكَ مِنْ سَخَطِكَ، وَبِمُعَافَاتِكَ مِنْ عُقوبَتِكَ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْكَ، لاَ أُحْصِي ثَنَاءً عَلَيْكَ، أَنْتَ كَمَا أَثْنَيْتَ عَلَى نَفْسِكَ)).
47. (ऐ अल्लाह! मैं तेरे ग़ुस्से से तेरी रज़ा की पनाह चाहता हूं और तेरी सज़ा से तेरी माफ़ी की पनाह चाहता हूं। और मैं तुझसे तेरी पनाह चाहता हूं। मैं पूरी तरह़ तेरी तारीफ़ नहीं कर सकता। तू उसी तरह़ है, जिस तरह़ तूने ख़ुद अपनी तारीफ़ की है।) (1) .................. (1) मुस्लिमः1/352, हदीस संख्याः486
सुनें · आवाज़ Hamad al-Duraiham