((اللَّهُمَّ لَكَ الْحَمْدُ، أَنْتَ نُورُ السَّمَوَاتِ وَالأَرْضِ وَمَنْ فِيهِنَّ، وَلَكَ الْحَمْدُ أَنْتَ قَيِّمُ السَّمَوَاتِ وَالأَرْضِ وَمَنْ فِيهِنَّ، [وَلَكَ الْحَمْدُ أَنْتَ رَبُّ السَّمَواتِ وَالأَرْضِ وَمَنْ فِيهِنَّ] [وَلَكَ الْحَمْدُ لَكَ مُلْكُ السَّمَوَاتِ وَالأَرْضِ وَمَنْ فِيهِنَّ] [وَلَكَ الْحَمْدُ أَنْتَ مَلِكُ السَّمَوَاتِ وَالأَرْضِ] [وَلَكَ الْحَمْدُ] [أَنْتَ الْحَقُّ، وَوَعْدُكَ الْحَقُّ، وَقَوْلُكَ الْحَقُّ، وَلِقاؤُكَ الْحَقُّ، وَالْجَنَّةُ حَقٌّ، وَالنَّارُ حَقٌّ، وَالنَّبِيُّونَ حَقٌّ، وَمحَمَّدٌ صلى الله عليه وسلم حَقٌّ، وَالسّاعَةُ حَقٌّ] [اللَّهُمَّ لَكَ أَسْلَمتُ، وَعَلَيْكَ تَوَكَّلْتُ، وَبِكَ آمَنْتُ، وَإِلَيْكَ أَنَبْتُ، وَبِكَ خاصَمْتُ، وَإِلَيْكَ حاكَمْتُ. فَاغْفِرْ لِي مَا قَدَّمْتُ، وَمَا أَخَّرْتُ، وَمَا أَسْرَرْتُ، وَمَا أَعْلَنْتُ] [وَمَا أَنْتَ أَعْلَمُ بِهِ مِنِّي] [أَنْتَ المُقَدِّمُ، وَأَنْتَ المُؤَخِّرُ لاَ إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ] [أَنْتَ إِلَهِي لاَ إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ] [وَلاَ حَوْلَ وَلاَ قُوَّةَ إِلاَّ بِاللَّهِ])).
32. (ऐ अल्लाह! तेरे लिए ही तारीफ़ है (1)। तू ही आस्मानों और ज़मीन और उनकी सारी चीज़ों का नूर है। तेरे ही लिए सब तारीफ़ है। तू ही आस्मानों और ज़मीन और उनकी सारी चीज़ों को क़ायम रखने वाला है। [और तेरे ही लिए हर प्रकार की तीरीफ़ है, तू ही आस्मानों और ज़मीन और उनकी सारी चीज़ों का रब है।] [और तेरे लिए ही तारीफ़ है। तेरे ही लिए आस्मानों तथा ज़मीन और उनकी सारी चीज़ों की बादशाही है।] [और तेरे ही लिए हर प्रकार की तीरीफ़ है। तू ही आस्मानों और ज़मीन का बादशाह है।] [और तेरे ही लिए हर प्रकार की तीरीफ़ है।] [तू ह़क़ है, तेरा वादा ह़क़ है, तेरी बात ह़क़ है, तुझसे मुलाक़ात ह़क़ है, जन्नत ह़क़ है औऱ जहन्नम ह़क़ है, सारे पैग़म्बर ह़क़ हैं, मुह़म्मद ह़क़ है और क़यामत ह़क़ है।] [ऐ अल्लाह! मैं तेरे लिए मुसलमान हुआ, तुझ पर मैंने भरोसा किया, तुझी पर मैं ईमान लाया, तेरी ही तरफ पलटा, तेरी मदद तथा तेरे भरोसे पर मैंने दुश्मन से झगड़ा किया और तुझको अपना ह़ाकिम माना। इस लिए मेरे वह गुनाह बख़्श दे , जो मैंने पहले किए और जो बाद में किए, जो छिपा कर किए और जो सबके सामने किए],[ और जिसे तू मुझसे अधिक जानता है।] [तू ही सबसे पहले था और तू ही बाद में भी रहेगा। तेरे सिवा कोई सच्चा माबूद नहीं।] [तू ही मेरा सच्चा माबूद है। तेरे सिवा कोई सच्चा माबूद नहीं।] [अल्लाह के बिना न नेकी की शक्ति है, न गुनाह से बचने की ताक़त।]) (1) ..................... (1) रसूलुल्लाह सल्ललाहु अलैहि व सल्लम जब रात को तहज्जुद के लिए उठते तो ये दुआ पढ़ते। (2) बुखारी फ़तह़ुल-बारी के साथः3/3,11/116,13/371,423,465, ह़दीस संख्याः1120,6317,7385,7442,7499, और मुस्लिम ने संक्षिप्त में इन्ही जैसे शब्दों में रिवायत किया है। 1/532, ह़दीस संख्याः769
सुनें · आवाज़ Hamad al-Duraiham