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तौबा व इस्तिगफार करना (अल्लाह से बख्शिश और माफी माँगना) — ज़िक्र 3

الاستغفار و التوبة · हिस्नुल मुस्लिम · 3 / 6

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وَقَالَ صلى الله عليه وسلم: ((مَنْ قَالَ أَسْتَغْفِرُ اللَّهَ الْعَظيمَ الَّذِي لاَ إِلَهَ إِلاَّ هُوَ الْحَيُّ القَيّوُمُ وَأَتُوبُ إِلَيهِ، غَفَرَ اللَّهُ لَهُ وَإِنْ كَانَ فَرَّ مِنَ الزَّحْفِ)).

250. आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः (जो आदमी यह दुआ पढ़ेः 'मैं अज़मत वाले अल्लाह से माफ़ी मांगता हूं, जिसके सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, वह हमेशा ज़िन्दा रहने वाला और सबको क़ायम रखने वाला है और मैं उसके सामने तौबा करता हूं', तो अल्लाह तआला उसे बख़्श देता है, चाहे वो लड़ाई के मैदान से भागा हुआ ही क्यों न हो।) (1) ........................... (1) अबू दाऊदः2/85, हदीस संख्याः1517, तिर्मिज़ीः5/569, हदीस संख्याः3577,ह़ाकिम ने इसे रिवायत करके सह़ीह़ कहा है और ज़ह्बी ने भी इस पर सहमति व्यक्त की है। 1/370, और शैख़ अल्बानी ने इसे सह़ीह़ कहा है। देखिए सह़ीह़ तिर्मिज़ीः3/182 और जामिउल-उसूलः4/389-390, तह़क़ीक़ अरनाऊत।

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